विचार

अंतरराष्ट्रीय संधि और नया बिल: दोनों की मार किसान ही झेलेंगे

आईटीपीजीआरईए में प्रस्तावित बदलाव और नया बिल, दोनों मिलकर हमारी समृद्ध जेनेटिक विरासत की ‘बायोपाइरेसी’ को कानूनी जामा पहनाने जा रहे हैं।

26 नवंबर, 2025 को फ़ूड एंड एग्रीकल्चर के लिए प्लांट जेनेटिक रिसोर्स पर इंटरनेशनल ट्रीटी (ITPGRFA) की गवर्निंग बॉडी के 11वें सेशन में डेलीगेट्स। (फ़ोटो क्रेडिट: X/@planttreaty)
26 नवंबर, 2025 को फ़ूड एंड एग्रीकल्चर के लिए प्लांट जेनेटिक रिसोर्स पर इंटरनेशनल ट्रीटी (ITPGRFA) की गवर्निंग बॉडी के 11वें सेशन में डेलीगेट्स। (फ़ोटो क्रेडिट: X/@planttreaty) 

भारत के 15 करोड़ किसानों के सामने खेती की जेनेटिक संपदा पर अधिकार खोने का खतरा है। ग्लोबल साउथ (विकासशील, कम विकसित और अविकसित) का कोई दूसरा देश भारत की फसल विविधता का मुकाबला नहीं कर सकता। तकरीबन 60 लाख किस्मों की फसलों वाला भारत दुनिया का अकेला ऐसा देश भी है जो दो लाख तरह के तो केवल चावल उपजाता है।

लेकिन यह जल्दी ही बदल जाने वाला है। पेरू में इंटरनेशनल ट्रीटी ऑन प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेज फॉर फूड एंड एग्रीकल्चर (आईआईटीपीजीआरएफए) के 11वें सत्र (24-29 नवंबर 2025) में बीज ट्रीटी में बड़े बदलाव हो रहे हैं जिससे किसानों के अधिकारों को बड़ा खतरा होने वाला है। ग्लोबल नॉर्थ (विकसित) देशों के पास पौधों के जेनेटिक रिसोर्स बहुत कम हैं और उनकी शह पर यह ट्रीटी ग्लोबल साउथ की पैदावार को एक मल्टीलेटरल सिस्टम (एमएलएस) के तहत लाना चाहती है, जिसमें पहुंच और लाभ की साझेदारी होगी, और इसका नियंत्रण बहुराष्ट्रीय बीज निगमों को सौंप दिया जाएगा। ऐसा करने पर क्या और कितना मुआवजा मिलेगा, इसपर कोई स्पष्टता नहीं है। 

हैरानी की बात यह है कि इसमें भारत का प्रतिनिधित्व सिर्फ एक वार्ताकार डॉ. सुनील अर्चक ने किया जो जर्मप्लाज्म एक्सचेंज (नेशनल ब्यूरो ऑफ प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेज) के प्रभारी अधिकारी हैं। उनका दावा है कि संधि पर दस्तखत करने के बाद भी भारत को यह चुनने की आजादी रहेगी कि वह कौन से प्लांट जेनेटिक को तैयार करे, लेकिन जेनेटिक्स विशेषज्ञों ने इसका खंडन किया है। विशेषज्ञ आगाह करते हैं कि यह अंतरराष्ट्रीय करार वैधानिक तौर पर बाध्यकारी होगा और यह इसपर दस्तखत करने वालों को अपने सभी प्लांट जेनेटिक रिसोर्स उपलब्ध कराने के लिए मजबूर करता है, जिससे उन पर नियंत्रण का किस्म असल में अंतरराष्ट्रीय हो जाता है।

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एक्टिविस्ट्स ने डॉ. अर्चक के इतने संवेदनशील पद पर नियुक्ति में इस आधार पर हितों के टकराव का मुद्दा भी उठाया है कि उनके बीज उद्योग पोषित संस्थान के अध्यक्ष होने पर भी विवाद है। हैरानी की बात है कि पिछली समीक्षा बैठकों में आईआईटीपीजीआरएफए के खिलाफ सबसे ज्यादा विरोध दक्षिण एशिया या लैटिन अमेरिका से नहीं, बल्कि अफ्रीकी देशों से हुआ था।

फोरम ऑफ साइंटिस्ट्स फॉर डाइवर्सिटी के अध्यक्ष डॉ. सरथ बाबू बलिजेपल्ली कहते हैं: ‘अगर भारत समझौता कर लेता है, तो यह तकनीक संपन्न ग्लोबल नॉर्थ को ग्लोबल साउथ की जेनेटिक संपत्ति थाली में परोसकर देने जैसा होगा। हमें न तो आर्थिक मुआवजा मिलेगा और न ही तकनीक हस्तांतरण जैसा गैर-मौद्रिक लाभ और न ही हम अपने ही हमारे ज्ञान और  जेनेटिक संपदा पर बौद्धिक संपदा अधिकार का ही दावा कर पाएंगे।’

ऐसी संधि सीधे तौर पर भारत के राष्ट्रीय कानूनों, खास तौर पर प्रोटेक्शन ऑफ प्लांट वैरायटीज एंड फार्मर्स राइट्स एक्ट, 2001 और बायोलॉजिकल डायवर्सिटी एक्ट, 2002 के खिलाफ होगी क्योंकि ये कानून जेनेटिक संपदा पर भारत के सार्वभौम नियंत्रण की बात करते हैं और किसानों को इसका संरक्षक बनाते हैं। क्या नरेन्द्र मोदी सरकार इन बातचीत में अमेरिका और दूसरे पश्चिमी देशों के दबाव में झुक रही है?

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अर्चक का दावा है कि एमएलएस का दायरा बढ़ने से भारत की सोयाबीन, टमाटर, मूंगफली और ऑयल पाम जैसी फसलों तक पहुंच हो सकेगी। लेकिन वैज्ञानिकों, सिविल सोसाइटी संगठन और किसान समूहों का तर्क है कि कुछ फसलों के सीमित फायदे के लिए भारत का जेनेटिक संपदा आधार पर अपने सार्वभौम अधिकार को छोड़ना वाजिब नहीं हो जाता। 

जीन कैंपेन की अध्यक्ष डॉ. सुमन सहाय बताती हैं कि पहले ग्लोबल साउथ ने एमएलएस के तहत अपनी मर्जी की 64 फसलों तक पहुंच की इजाजत दी थी। वह कहती हैं, ‘बायोटेक्नोलॉजी एक बड़ी तकनीक बनकर उभरी है और इससे काफी पैसा कमाया जा रहा है। इनमें से ज्यादातर तकनीक अमेरिका में विकसित और पेटेंट की गई हैं, लिहाजा उसे ही सबसे ज्यादा फायदा होने वाला है। इससे बड़े कृषि बिजनेस और बहुराष्ट्रीय बीज कंपनियों को बिना किसी जवाबदेही या पारदर्शिता के भारत की जेनेटिक संपदा तक पहुंच मिल जाएगी।’ अमेरिका के बड़े चावल उत्पादक के तौर पर उभरने का जिक्र करते हुए वह कहती हैं, ‘भारत 49,000 करोड़ रुपये का बासमती निर्यात करता है। एक बार जब उन्हें हमारे बीज मिल जाएंगे, तो वे हमारे बाजार को हथिया लेंगे।’

रिकॉर्ड बताते हैं कि भारत पहले ही बहुस्तरीय साझा आधार पर चार लाख से ज्यादा सैंपल दे चुका है। भारत सरकार की अधिसूचना के मुताबिक इसमें किसानों की भी किस्में शामिल हैं। किसान समूहों ने सरकार को लिखा है कि भारत के पास पहले से ही फसलों की काफी किस्में हैं और द्विपक्षीय संधियों के जरिये उसे अतिरिक्त किस्में मिल सकती हैं जिससे उसे अपनी सार्वभौमिकता छोड़ने की भी जरूरत नहीं पड़ेगी।

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लोगों को दोहरी मार पड़ने वाली है। एक तो बीज अधिनियम 1966 और बीज नियंत्रण आदेश 1983 की जगह मसौदा बीज विधेयक 2025 कानून बनने वाला है। इस विधेयक की भी आम किसानों, खासकर पारंपरिक, रसायन-मुक्त खेती पर निर्भर लोगों की जगह बीज कंपनियों और एग्रीबिजनेस के हितों को ध्यान में रखने के लिए कड़ी आलोचना हुई है।

नए बिल में छोटे-मोटे अपराधों, जैसे घटिया बीज बेचने या साथी पोर्टल को अपडेट न करने, पर एक लाख रुपये का जुर्माने और नकली या बिना रजिस्ट्रेशन वाले बीज बेचने जैसे बड़े उल्लंघनों पर 30 लाख तक के जुर्माने और तीन साल तक की जेल का प्रावधान है। किसान अधिकारों से जुड़ी एक्टिविस्ट कविता कुरुगंती इस बात से हैरान हैं कि बिल में मुआवजे का कोई क्लॉज नहीं है। उन्होंने कहा, ‘अगर खराब बीज की वजह से फसल खराब होती है, तो मुआवजे के लिए किसान को कोर्ट जाना होगा, जहां फैसला होने में सालों लग सकते हैं।’

जहां अकेले किसानों को बीज बचाने और साझा करने की इजाजत होगी, वहीं समूहों, महिलाओं के बीज समूह और पारंपरिक बीज बचाने वाले नेटवर्क को कमर्शियल एंटिटी के तौर पर वर्गीकृत किया जाएगा और ये बड़ी कंपनियों की तरह ही डिजिटल कम्प्लायंस के अधीन होंगे। सीमित इंटरनेट सेवा वाले छोटे ग्रामीण किसानों के लिए डिजिटल रिपोर्टिंग, क्यूआर कोड, ऑनलाइन जमा करना और लगातार ट्रैकिंग बड़ी चुनौती होगी।

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इस किसान-विरोधी बिल की सबसे खतरनाक बात यह है कि यह केन्द्र कंपनियों को मान्यता देने का अधिकार देता है। एक बार मान्यता मिलने के बाद राज्य सरकारें उनका रजिस्ट्रेशन रद्द नहीं कर सकतीं। कुरुगंती मोनसेंटो केस का जिक्र करती हैं, जहां आंध्र प्रदेश ने खराब बीटी कॉटन बीज बेचने के लिए कंपनी पर बैन लगा दिया था। हालांकि, नए कानून के तहत, कोई भी राज्य सरकार केन्द्र से मान्यता प्राप्त किसी भी कंपनी को ब्लैकलिस्ट नहीं कर सकती।

कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा का मानना ​​है कि इससे संघवाद को बड़ा झटका लगेगा। उन्होंने कहा, ‘उदाहरण के लिए, दिल्ली सरकार ने बेयर्स के राउंड अप पेस्टिसाइड को इजाजत दिया, लेकिन पंजाब ने इस पर बैन लगा दिया। राज्यों को नए बीजों का परीक्षण करने और यह तय करने की आजादी होनी चाहिए कि उनके वातावरण के हिसाब से क्या बेहतर है।’ 

नया बीज विधेयक बीज आयात को उदार बनाने का दावा करता है जिससे किसानों की वैश्विक बीजों और तकनीकों तक पहुंच हो। हालांकि, किसान और एक्टिविस्ट इसे विवादित जीएम फसलों को रास्ता देना मान रहे हैं। शर्मा कहते हैं, ‘कोई भी देश अपने उत्कृष्ट बीज नहीं देगा। बेरोकटोक आयात से कई बाहरी, आक्रामक किस्मों के आने का खतरा है।’

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विशेषज्ञों का मानना है कि इससे हरित क्रांति से मिले सारे फायदे जाया हो जाएंगे। पहले किसानों तक पहुंचने से पहले आयातित बीजों का इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च परीक्षण करता था। उदाहरण के लिए, मैक्सिको से भारत में लाल गेहूं की किस्म लाई गई थी। चूंकि भारतीय लाल गेहूं नहीं खाते, इसलिए आईसीएआर के वैज्ञानिकों ने इसका भारतीय किस्म के साथ क्रॉसब्रीड किया और इससे दो बेहद लोकप्रिय किस्में बनीं- कल्याण सोना और सोनालिका।

अफसोस है कि यह बिल किसानों के अधिकारों और सदियों में विकसित हुए पारंपरिक बीजों को बचाने की जरूरत नहीं समझता है और इसके बजाय कॉरपोरेट हितों पर ध्यान देता है। किसान मजदूर परिषद के अफलातून साफ कहते हैं कि यह कानून भारत के बीज क्षेत्र को कॉरपोरेट बनाने और कॉरपोरेट एकाधिकार से कीमत तय करने की व्यवस्था लादने की एक चाल है। भारत बीज स्वराज मंच के सदस्य और बीज विशेषज्ञ भारत मनसता आगाह करते हैं कि ‘बीज बिल और आईटीपीजीआरईए में प्रस्तावित बदलाव मिलकर हमारी समृद्ध जेनेटिक विरासत की बायोपाइरेसी को कानूनी जामा पहनाने जा रहे हैं।’ 

पिछले कृषि कानूनों के खिलाफ उनके ऐतिहासिक विरोध की पांचवीं सालगिरह पर किसान संगठनों ने 26 नवंबर को इस मसौदा विधेयक के खिलाफ राज्यव्यापी आंदोलन किए। अलायंस फॉर सस्टेनेबल एंड होलिस्टिक एग्रीकल्चर ने भारत सरकार से अंतरराष्ट्रीय संधि में प्रस्तावित बदलावों को खारिज करने और प्रस्तावित बीज बिल 2025 पर बड़ी बहस की इजाजत देने की अपील की है। उन्होंने 15 नवंबर 2025 को कृषि और पर्यावरण मंत्री को इस संबंध में पत्र भी लिखा है और जवाब का इंतजार कर रहे हैं।

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