
राजनीति में नेता आत्मा और सिद्धांतों का सौदा करके पद तो प्राप्त कर सकता है। यह भी संभव है कि वह लंबे समय तक सफल भी रहे। परंतु एक दिन ऐसा आता है जब उसका समय एवं खेल समाप्त हो जाता है और स्वयं उसकी आत्मा उससे प्रश्न पूछना आरंभ कर देती है। यह वह स्थिति होती है जब यकायक पद और सम्मान हाथ से जाते दिखाई पड़ते हैं और छटपटाहट में नेता ऊल-जलूल बातें करने लगता है। बिहार के एक समय के ‘सुशासन बाबू’ और पंद्रह वर्षों से बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का इस समय यही हाल है।
बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम 10 नवंबर को आने हैं और अगला मुख्यमंत्री कौन होगा, यह जनता निर्धारित करेगी। परंतु नीतीश बाबू जिस तरह से अनाप-शनाप बोल रहे हैं उससे तो यह आभास हो रहा है कि स्वयं उनको अपनी हार दिखाई पड़ रही है। जब नीतीश जी की रैली में लोग ‘नीतीश मुर्दाबाद’ और ‘लालू जिंदाबाद’ के नारे लगाएं तो केवल घबराहट ही नहीं, हार का भी आभास होना स्वाभाविक है। नीतीश कुमार इस समय उसी हार फोबिया से ग्रस्त हैं और छटपटाहट में बिहार के युवा को उसके ‘मां-बाप’ की याद दिला रहे हैं।
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समय तो इस वक्त स्वयं नीतीश कुमार के लिए अपने माता-पिता को याद करने का है क्योंकि इस चुनाव में केवल उनकी नीतियों पर ही नहीं बल्कि उनके संस्कारों पर भी प्रश्न उठ रहे हैं। आज बिहार उनसे यह प्रश्न कर रहा है कि उन्होंने सत्ता की खातिर सामाजिक न्याय की पीठ पर छुरा क्यों घोंपा था। वह लालू प्रसाद यादव जो युवा राजनीतिक दौर से उनके घनिष्ठ मित्र थे, उन्हीं की पीठ पर नीतीश कुमार ने 1990 के दशक में छुरा घोंप कर एक अलग पार्टी का गठन किया।
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उस समय नीतीश कुमार जॉर्ज फर्नांडिस की छत्र-छाया में थे। अटल बिहारी वाजपेयी और संघ के इशारों पर यह फैसला हो चुका था कि मंडल राजनीति के बिहारी नायक लालू प्रसाद यादव को ‘ठीक’ किए बिना बिहार से पिछड़ों की राजनीति का सैलाब रोका नहीं जा सकता है। यह प्लान तभी संभव हो सकता था जब स्वयं पिछड़ों की एकता में सेंध लगाई जा सके। और इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए संघ और भाजपा को बिहार में कल्याण सिंह-जैसा एक पिछड़ा नेता चाहिए था जो लालू प्रसाद-जैसे संघ विरोधी के खिलाफ ताल ठोक सके। वाजपेयी जी और लालू से खफा जॉर्ज फर्नांडिस ने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए नीतीश कुमार को चुना जिनको स्वयं मेरी आंखों के सामने मधुलिमये ने प्रोत्साहन दिया था और अति पिछड़ों की मसीहाई के लिए नीतीश को उकसाया।
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बस, क्या था, जॉर्ज फर्नांडिस के नेतृत्व में समता पार्टी का गठन हो गया जिसका संपूर्ण उद्देश्य एवं शक्ति लालू प्रसाद यादव को सबक सिखाकर सामाजिक न्याय की राजनीति को खोखला करना था। जॉर्ज तो केवल एक कद्दावर नाम था, असल में नीतीश ही उस समता पार्टी के बिहार में सर्वेसर्वा थे। संपूर्ण संघ और बिहार की ऊंची जातियों का सहयोग नीतीश कुमार के साथ था जो 1998 में केंद्र में तत्कालीन वाजपेयी सरकार में रेल मंत्री बने। और देखते-देखते वह बिहार के मुख्यमंत्री ही नहीं बल्कि ‘अति पिछड़ों’ के ‘मसीहा’ भी बन गए। संघ का काम भी बन गया। लालू प्रसाद की सामाजिक न्याय की राजनीति को धक्का लग गया। बिहार की ऊंची जाति भूमिहार नीतीश से हाथ मिलाकर सत्ता में आ गई और एक समीकरण बना जो लालू प्रसाद को सत्ता से बाहर रखने में अभी तक सफल रहा।
महत्वाकांक्षी और चतुर नीतीश यह समझते थे कि वह भूमिहारों और उच्च जातीय व्यवस्था की मजबूरी हैं। अतः वह उनके कांधों पर सवार होकर मीडिया की सहायता से ‘सुशासन बाबू’ की छवि बनाकर अपनी सत्ता चमकाते रहे। लेकिन सत्ता के लिए किसी की भी पीठ पर छुरा घोंपना नीतीश कुमार का स्वभाव है। अतः सबसे पहले नीतीश ने सन 2003 में जॉर्ज का साथ छोड़कर स्वयं अपनी पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) का गठन किया और अपना कद बड़ा किया। फिर, सन 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश ने और तो और, संघ के प्रिय स्वयं नरेंद्र मोदी से हाथ खींच लिया। और पुनः लालू प्रसाद से हाथ मिलाकर फिर सत्ता पर कब्जा किया। पर मोदी ठहरे सत्ता की राजनीति के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी। कहते हैं कि मोदी ने नीतीश बाबू की कुछ फाइलों से गर्दा साफ किया और बस, नीतीश बाबू मोदी एवं संघ की शरण में वापस पहुंच गए।
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पिछड़ों की राजनीति में सेंध लगाने और लालू-जैसे संघ तथा जातीय व्यवस्था विरोधी को ‘ठीक’ रखने के बदले में नीतीश बिहारी व्यवस्था के कांधों पर सवार होकर दो दशकों से अधिक समय तक कभी केंद्र तो कभी राज्य की सत्ता के मजे लूटते रहे हैं। परंतु अब नीतीश कुमार की कहानी समाप्त होती दिखाई पड़ती है। चुनाव के परिणाम जो भी आएं, नीतीश बाबू की साख तो गई। नीतीश कुमार के इस पतन का मुख्य कारण उनकी मोदी विरोधी राजनीति है। उसके पीछे भी कोई सिद्धांत नहीं बल्कि स्वयं उनकी महत्वाकांक्षा और सत्ता की लालसा थी जिसने उनको मोदी के खिलाफ उकसाया।
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सन 2014 के लोकसभा चुनाव के समय नीतीश को यह आभास हुआ कि सेक्युलर खेमे में जगह खाली है। यूपीए की हार के बाद गांधी परिवार कमजोर पड़ चुका है तो क्यों न वहां का नेतृत्व कब्जा कर उस खेमे से प्रधानमंत्री बन जाएं। बिल्ली के ख्वाब में छिछड़े! संघ और उच्च जातीय व्यवस्था के कांधों पर सवार नीतीश अपनी हैसियत से कुछ ज्यादा ही ऊंचे सपने देखने लगे। बस, नरेंद्र मोदी ने पहले तो नीतीश कुमार के कान पकड़कर उनको फाइलों के रास्ते वापस एनडीए में खींचा। फिर केंद्र से मिलने वाली बिहार की लगभग संपूर्ण आर्थिक सहायता पर ताला लगा दिया। वह नीतीश जो उस सहायता से कुछ सड़कें चमका कर ‘सुशासन बाबू’ की पदवी लिए अकड़ते थे, वही नीतीश ‘कुशासन बाबू’ हो गए।
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