
जब उम्मीदें धराशाई होने लगती हैं, नई उम्मीदें नई ज़मीन तैयार कर देती हैं। ऐसा ही कुछ हो रहा है। उस दिन के नज़ारे आक्रोश दिला रहे थे, यह नज़ारे भावुक कर रहे हैं। यह उस सच का बयान है कि सरकारें जब सुनना बंद कर देती हैं, जनता और ज्यादा मुखर हो जाती है। यह सब आश्वस्त करने वाला है कि इस देश को अपने लोकतंत्र की, अपने युवाओं के भविष्य की कितनी चिंता है। पाश ने ऐसे ही हालात के लिए कहा था, ‘सबसे ख़तरनाक होता है सपनों का मर जाना’ और जब चोट जब सीधे सपनों पर ही होने लगे, सपने ही लूट लिए जा रहे हों, तब चारा भी क्या रह जाता है।
लाठी चार्ज के जूते-चप्पल
बीस जुलाई (मंगलवार) की आधीरात की एक विडियो क्लिप सामने है, जिसमें एक युवा जंतर-मंतर पर जहां तहां बिखरे पड़े जूते-चप्पल इकट्ठे करते हुए उन्हें अलग-अलग झोलों में जैसे तैसे इकट्ठा कर रहा है। यह युवक भी कठिन हालात का शिकार है, कह रहा है- ‘ये जो देश के विभिन हिस्सों से आए प्रदर्शनकारी थे, जो आज आये थे अपनी बात कहने देश के विभिन्न हिस्सों से… जो अपने भविष्य के लिए लड़ने को आये थे, ये उनके जूते, चप्पल हैं। महिलाओं और पुरुषों दोनों के ही हैं। ये ऐसे ही तो नहीं छूट गए होंगे! ये अमित शाह की जो पुलिस है उसके लाठी चार्ज के जूते हैं… भयंकर बर्बर लाठी चार्ज हुआ है… ये उनके जूते-चप्पल हैं जो पास के लोहिया और अन्य अस्पतालों में भर्ती हैं… उनके हाथ-पैर टूटे हैं, सिर में गंभीर चोटें आयी हैं। ये उनके जूते हैं, उनके संघर्ष की दास्तान है… इसे हम ऐसे ही जाया नहीं होने देंगे…।’
वह पूछता है- ‘सवाल है कि यह सब करवाया किसने है… करवाया है अमित शाह ने, उनकी पुलिस ने… उन्होंने इन छात्रों के सपनों पर ही कुठाराघात नहीं किया है, सबकुछ छीन लेने की कोशिश की है… अघोषित आपातकाल लागू है यहां… अमित शाह को तत्काल इस्तीफ़ा दे देना चाहिए…हम इन्हें (जुटाए गए जूते-चप्पल) अमित शाह और नरेंद्र मोदी को भेजेंगे, उन्हें बताएंगे कि…।” युवक भावुक होकर चुप हो जाता है।
वीडियो बहुत सारे हैं। सब ऐसे संजो कर रख लेने वाले, कि जाने कब किसी को ख़्याल आए और सब के सब डिलीट कर दिए जाएं ताकि कोई सनद ही न रहे। लेकिन क्या वाक़ई ऐसा होगा। जब ऐसे युवा मौजूद हों, जो उन बच्चों की, युवाओं के इन पीछे छूट गए जूते-चप्पलों को भी समेट ही नहीं संजो भी रहे हों, तो मान लेना चाहिए कि कुछ भी खत्म नहीं हुआ है। सब कुछ कभी खत्म भी नहीं होता।
ऐसे समय में जब लगने लगा था कि देश के मुख्य न्यायाधीश की एक टिप्पणी से निकला नाम और उसकी पहल पर प्रतिकार में खड़ा होता दिखता एक आंदोलन बिखरकर खुद-ब-खुद अपनी न सिर्फ अपनी परिणति को प्राप्त कर लेगा बल्कि भविष्य के आंदोलनों के लिए ऐसे सवाल खड़े कर देगा, जिनके जवाब देना आसान नहीं होगा। हमारे चंद शुबहे भले ही अब भी क़ायम हों, लेकिन तमाम आशंकाओं को धता बताते हुए जंतर-मंतर ने जो एक राह दिखा दी है वह आश्वस्त कर रही है कि आज का युवा सचेत है और यह भी कि उसे अपने अधिकार की लड़ाई लड़ना आता है।
वह ‘घंटे-घड़ियाल’ की धुन में सब कुछ गंवाने को तैयार नहीं है। उसे पता है कि अपने किस अधिकार के लिए और कैसे लड़ना है। सुखद यह भी है कि उस युवा के साथ अब वे लोग भी खड़े हो रहे हैं, जो लम्बे समय तक एक खास तरह के नशे में रहे, लेकिन देर से ही सही उनका नशा टूटा है।
हमारे बच्चों के ही सपने तोड़ दिए
बेटी के साथ गोरखपुर से जंतर-मंतर पहुंची एक महिला का यह बयान बहुत कुछ कहता है- “ मेरी बहन भी तैयारी कर रही है। उसके साथ भी तो दिक्कत आयेगी, हम अब भी न निकले तो शायद देर हो जाएगी।” बक्सर से आईं मनोरमा कहती हैं- “हम सरकार के साथ थे, हमने भर-भर के वोट दिया लेकिन सरकार ने हमें क्या दिया। उसने तो हमारे भविष्य पर ही चोट कर दी। हमारे बच्चों के ही सपने तोड़ दिए।”
तन्मय कह रहा कि ‘कल नहीं आ पाया था, यह मेरी जिंदगी का सबसे दुर्भग्यपूर्ण दिन रहा। आज आया हूं… ट्रेजडी है कि हमें खबरें चैनलों से नहीं, मुख्यधारा मीडिया से नहीं, फीड से मिल रही… सरकार ने खबरें भी रोक दी हैं..!’ वह आगे कहता है- “अगर हर कोई डरने लग जायेगा, स्टैंडअप कौन करेगा। हम डरे होते तो आज कैसे आते। हमने डरना नहीं है…। व्हील चेयर पर आए एक सज्जन कहते हैं- ‘रात में यहीं रुकना है… रुकना तो पड़ेगा ही, तभी ‘सुबह’ होगी…।’
‘प्रिंसिपल’ को बदलना ही होगा
एक बच्ची एक पत्रकार के माइक पर कह रही है - “उन्हें हमारी पढ़ाई, हमारे भविष्य की चिंता नहीं… यह प्रोटेस्ट अब रुकने वाला नहीं…।” एक अन्य लड़की कहती है- “प्रिंसपल स्कूल हैंडल न कर पाये तो उसे बदलना ही पड़ता है। प्रिंसिपल बदलते ही बहुत कुछ ठीक हो जाता है। ‘प्रिंसिपल’ को बदलना ही होगा…हर एक्शन में एक संदेश होता है…” अपनी बात स्पष्ट करते हुए कहती है- ‘प्रिंसिपल धर्मेंद्र प्रधान नहीं, मोदी है…उसे बदलना होगा’।
ग्रेजुएशन कर रही नताशा मेरठ से आई हैं, कहती हैं- “24-25 साल के युवकों को इसलिए आना पड़ा रहा है क्योंकि 12 साल की सरकार ने कुछ भी सुनना बंद कर दिया है।” उसके साथ की लड़की बोल पड़ती है- ‘लड़कियां बहुत मुश्किल से पढ़ाई जाती हैँ…तमाम चुनौती से जूझती हैँ… ऊपर से ये सब… हम इतनी मेहनत और मुश्किल से पढ़ते हैँ, आप पेपर लीक कर देते हैँ… जवाबदेही भी नहीं लेते… आख़िर कब तक।’
और देश इस तरह शामिल हो रहा है
कल तक लोग प्रदर्शन स्थल पर पानी की बोतलें भेज रहे थे। कुछ अपने साथ खाने-पीने की चीजें लेकर आ रहे थे, लेकिन अब नजारा बदल चुका है। जंतर-मंतर का प्रतिरोध अब बड़े आंदोलन में तब्दील हो चुका है। ऐसा आंदोलन जिसमें पूरा देश शामिल दिख रहा। कल तक लोग दुआयें और शुभकामनायें भेज रहे थे, सोमवार को चली लाठियों और अश्रु गैस के बाद लोग अब जहां, जिस शहर में हैं वहीं से सीधे जुड़ गए हैं। उन्होंने सहयोग के नए नए रास्ते निकाल लिए हैं। वे फ़ूड पैकेट भेज रहे हैं।
कोई पुणे से है, कोई बेंगलुरु, हैदराबाद या मुंबई से। जयपुर, कोलकाता और लखनऊ से…वे जोमेटो और स्विगी ही नहीं फ़्लिपकार्ट और अमेजन जैसे डिलीवरी आउट्लेट का इस्तेमाल करके आंदोलन में अपना अंश, अपना हिस्सा भेज रहे हैं। कोई बल्क में बर्गर भेज रहा है, कोई छोले भटूरे के पैकेट। कहीं से बिरयानी के पैकेट आ रहे हैं, और वेज पुलाव भी। हर ऑर्डर इस संदेश के साथ कि इसे जंतर मंतर पर धरना-प्रदर्शन कर रहे युवाओं में वितरित कर दें। इन भेजने वालों ने अपना नाम न बताने की भी शर्त रखी है, इसलिए नहीं कि वे सामने नहीं आना चाहते, इसलिए कि इसकी जरूरत नहीं समझते। बेंगलुरु में बैठा मोहित कर रहा है, कि जरूरत इसकी नहीं कि किसने भेजा, जरूरत यह जानने की है कि लोग खुद को किस तरह आंदोलन से जोड़ रहे हैं।
वरना सरकार इसे भी बंद करा देगी
वे अपनी पहचान नहीं बताना चाह रहे। अपने यूट्यब चैनल पर कवर कर रहे पत्रकार अजीत अंजुम ने जब ऑर्डर देने वाली एक महिला से डिलीवरी बॉय के जरिए बात करनी चाही तो उन्होंने फोन काट दिया। एक अन्य यूट्यबर से एक महिला ने कहा- अब ये सब तो न ही दिखाइए, वरना यह सरकार स्विगी-जोमेटो से बल्क ऑर्डर लेने पर भी रोक लगा देगी, यह सरकार कुछ भी कर सकती है। लेकिन वह यह भी जोड़ती हैं… अब इनके रोके कुछ नहीं रुकने वाला।
रघुवीर सहाय की कविता ‘आपकी हंसी’ की पंक्ति ‘लोकतंत्र का अंतिम क्षण है…’ याद आ रही है, लेकिन अब आश्वस्त हुआ जा सकता है कि ऐसे क्षण में जो होना चाहिए, उसकी शुरुआत हो चुकी है…। इस आश्वस्ति में एक बड़ी चुनौती और चेतावनी भी है, पूरे समाज और संपूर्ण विपक्ष के लिए कि वह युवाओं के सपनों की इस उड़ान को विराम नहीं लगने देगा।
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