
भारत में कांवड़ यात्रा सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा है। श्रावण मास में लाखों शिवभक्त गंगाजल लाकर अपने-अपने क्षेत्रों के शिवालयों में जलाभिषेक करते हैं। इस यात्रा का मूल स्वर संयम, तप, अनुशासन और आस्था रहा है। कठिन पदयात्रा, व्रत, भजन और सामुदायिक सहयोग इसकी पहचान रहे हैं। किंतु पिछले एक दशक में कांवड़ यात्रा का स्वरूप तेजी से बदला है। धार्मिक अनुष्ठान के साथ शक्ति-प्रदर्शन, राजनीतिक संरक्षण, प्रशासनिक पक्षपात और सार्वजनिक अराजकता के अनेक दृश्य सामने आने लगे हैं। यह परिवर्तन केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था और विधि-राज के लिए भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
लोकतांत्रिक राज्य की पहली जिम्मेदारी कानून का समान रूप से पालन कराना है। संविधान किसी भी नागरिक या समूह को कानून से ऊपर नहीं मानता। किंतु अनेक स्थानों पर यह धारणा बनती जा रही है कि कांवड़ यात्रा के दौरान सामान्य नियम स्थगित हो जाते हैं। सड़कों का घंटों बंद रहना, यातायात का अव्यवस्थित होना, तेज ध्वनि विस्तारकों का उपयोग, सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुंचाना, वाहन तोड़ना, मारपीट या प्रशासन द्वारा अत्यधिक नरमी बरतना- ये घटनाएं समय-समय पर समाचारों का हिस्सा बनती रही हैं। यह कहना उचित नहीं होगा कि प्रत्येक कांवड़िया ऐसा करता है। अधिकांश श्रद्धालु शांतिपूर्ण ढंग से यात्रा पूरी करते हैं। समस्या उन संगठित समूहों की है जो धार्मिक पहचान के आवरण में हिंसक या उन्मादी व्यवहार करते हैं और जिन्हें प्रभावी राजनीतिक या प्रशासनिक संरक्षण मिलता हुआ दिखाई देता है।
यहीं से प्रश्न केवल धार्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक हो जाता है। जब सत्ता किसी विशेष धार्मिक आयोजन को अपनी वैचारिक या चुनावी परियोजना का हिस्सा बना लेती है, तब प्रशासन की निष्पक्षता प्रभावित होने लगती है। राजनीतिक दल धार्मिक आस्था को नागरिक अधिकारों और कानून से ऊपर स्थापित करने का जोखिम उठाते हैं। इससे यह संदेश जाता है कि कुछ समूहों के लिए नियम अलग हैं और बाकी नागरिकों के लिए अलग। ऐसी स्थिति लोकतांत्रिक समानता की भावना को कमजोर करती है।
कांवड़ यात्रा के दौरान राज्य सरकारों द्वारा व्यापक प्रशासनिक व्यवस्थाएं करना स्वाभाविक है। लाखों लोगों की सुरक्षा, चिकित्सा, जल, विश्राम और यातायात की व्यवस्था राज्य का दायित्व है। किंतु जब यह व्यवस्था विशेष राजनीतिक प्रदर्शन का माध्यम बनने लगे, सरकारी संसाधनों का उपयोग धार्मिक वैभव प्रदर्शित करने में होने लगे, और कानून के उल्लंघन पर भी कार्रवाई न की जाए, तब यह धार्मिक स्वतंत्रता नहीं बल्कि राजनीतिक पक्षधरता का प्रश्न बन जाता है।
इस पूरी प्रक्रिया में प्रशासन की भूमिका भी चिंताजनक है। अनेक बार स्थानीय अधिकारी टकराव से बचने या राजनीतिक दबाव के कारण कानून लागू करने में संकोच करते हैं। परिणामतः छोटी घटनाएं भीड़ के मनोबल को बढ़ाती हैं और दंडहीनता की संस्कृति विकसित होती है। यदि किसी समूह को यह विश्वास हो जाए कि उसके विरुद्ध कार्रवाई नहीं होगी, तो कानून का भय समाप्त हो जाता है। लोकतंत्र में यह अत्यंत खतरनाक स्थिति है।
इस राजनीति का दूसरा पक्ष सांप्रदायिक ध्रुवीकरण है। धार्मिक यात्राओं को सांस्कृतिक उत्सव के बजाय राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन में बदल देने से समाज में अविश्वास बढ़ता है। सार्वजनिक स्थानों पर धार्मिक प्रभुत्व का प्रदर्शन अन्य समुदायों में असुरक्षा की भावना उत्पन्न कर सकता है। धर्म का उद्देश्य सामाजिक समरसता होना चाहिए, न कि शक्ति और वर्चस्व का प्रदर्शन। जब धार्मिक आस्था चुनावी रणनीति का उपकरण बन जाती है, तब उसका आध्यात्मिक स्वरूप भी क्षीण होता है।
विडंबना यह है कि भारतीय धार्मिक परंपराएं संयम और आत्मानुशासन पर आधारित रही हैं। शिव स्वयं वैराग्य, तप और आत्मसंयम के प्रतीक हैं। यदि उनके नाम पर यात्रा हिंसा, आक्रामकता, अभद्रता और सार्वजनिक अव्यवस्था का माध्यम बनने लगे, तो यह धार्मिक मूल्यों का भी अपमान है। आस्था का अर्थ दूसरों के अधिकारों का अतिक्रमण नहीं हो सकता।
इस संदर्भ में मीडिया की भूमिका भी विचारणीय है। एक ओर कुछ समाचार माध्यम ऐसी घटनाओं को सनसनीखेज बनाकर प्रस्तुत करते हैं, दूसरी ओर कुछ माध्यम राजनीतिक कारणों से गंभीर घटनाओं की उपेक्षा करते हैं। दोनों स्थितियां समाज के लिए हानिकारक हैं। आवश्यकता संतुलित रिपोर्टिंग की है, जिसमें न तो पूरे समुदाय को अपराधी घोषित किया जाए और न ही हिंसक घटनाओं पर पर्दा डाला जाए।
न्यायपालिका ने अनेक अवसरों पर यह स्पष्ट किया है कि धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य की सीमाओं के अधीन है। संविधान किसी भी धार्मिक गतिविधि को कानून से ऊपर नहीं रखता। इसलिए राज्य का दायित्व है कि वह सभी धार्मिक आयोजनों के लिए समान मानदंड अपनाए। यदि किसी अन्य समूह द्वारा सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने पर कठोर कार्रवाई होती है, तो कांवड़ यात्रा के दौरान भी वही सिद्धांत लागू होना चाहिए। कानून का सम्मान तभी स्थापित होगा जब उसका प्रयोग निष्पक्ष और समान रूप से किया जाए।
राजनीतिक दलों को भी यह समझना होगा कि अल्पकालिक चुनावी लाभ के लिए धार्मिक भावनाओं का राजनीतिक उपयोग अंततः लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करता है। भीड़-राज किसी भी समाज के लिए शुभ संकेत नहीं है। आज यदि किसी एक समूह को विशेष छूट दी जाती है, तो कल अन्य समूह भी वैसी ही अपेक्षा करेंगे। परिणामस्वरूप विधि-राज के स्थान पर भीड़ का शासन स्थापित होने लगेगा।
इसे भी पढ़ेंः इस्तीफ़ा, स्तुतिगान और राजनीतिक नैतिकता का नया आख्यान
समाधान धार्मिक परंपराओं के विरोध में नहीं, बल्कि उन्हें उनके मूल स्वरूप में पुनर्स्थापित करने में है। प्रशासन को निष्पक्ष रहना चाहिए, राजनीतिक नेतृत्व को उन्माद के बजाय अनुशासन का संदेश देना चाहिए, धार्मिक संगठनों को स्वयं हिंसक और अराजक तत्वों से दूरी बनानी चाहिए तथा नागरिक समाज को भी यह स्पष्ट करना चाहिए कि आस्था और अराजकता एक-दूसरे के पर्याय नहीं हैं।
भारत की लोकतांत्रिक शक्ति उसकी धार्मिक विविधता और संवैधानिक समानता में निहित है। यदि सत्ता धार्मिक आयोजनों को राजनीतिक संरक्षण देकर कानून के शासन को कमजोर करती है, तो उसका दुष्परिणाम केवल प्रशासनिक अव्यवस्था तक सीमित नहीं रहता; वह लोकतंत्र की आत्मा को भी क्षति पहुंचाता है। कांवड़ यात्रा जैसी प्राचीन परंपराएँ तभी सम्मानित रह सकती हैं जब वे श्रद्धा, अनुशासन और सामाजिक उत्तरदायित्व का उदाहरण बनें, न कि राजनीतिक संरक्षण प्राप्त अराजकता का। राज्य का धर्म किसी विशेष आस्था का विस्तार करना नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक के अधिकारों और कानून की समान प्रतिष्ठा सुनिश्चित करना है। यही संवैधानिक लोकतंत्र की कसौटी है और यही भारत के भविष्य की भी अनिवार्य शर्त है।
इसे भी पढ़ेंः नेतृत्व की विश्वसनीयता और लोकतंत्र की परीक्षा
प्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम (Telegram) चैनल @navjivanindia से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए