विचार

कहीं उलटी न पड़ जाएं चीन-रूस से बढ़ती गलबहियां!

भारत नए समीकरण बनाने में जुटा है, लेकिन लगता नहीं कि प्रधानमंत्री मोदी का तियानजिन में एससीओ शिखर सम्मेलन में भाग लेना इस संबंध में कुछ खास कर पाएगा

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Getty Images ALEXANDER ZEMLIANICHENKO

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन (31 अगस्त - 1 सितंबर) में भाग लेना एक बड़ा घटनाक्रम है। सात साल में उनका यह पहला चीन दौरा है। वहीं, तियानजिन सम्मेलन में 20 से ज्यादा नेताओं और 10 अंतरराष्ट्रीय संगठनों के शामिल होने की वजह से चीन के लिए इतिहास का यह सबसे बड़ा एससीओ सम्मेलन अपनी वैश्विक ताकत दिखाने का मौका है। 

हालांकि, मोदी के लिए यह समय इससे ज्यादा शर्मनाक नहीं हो सकता था। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के साथ उनके रिश्ते खराब हो गए हैं, भारत को कड़े अमेरिकी टैरिफ का सामना करना पड़ रहा है, और उसके आस-पड़ोस में तनाव बढ़ रहा है- शत्रुतापूर्ण पाकिस्तान और अस्थिर बांग्लादेश से लेकर सीमाओं पर आक्रामक चीन तक।

मोदी की तियानजिन यात्रा को नई दिल्ली भारत के बहुपक्षीय सहयोग के संकेत के रूप में पेश कर रही है, लेकिन इससे चीन और रूस से कोई रणनीतिक लाभ मिलने की संभावना नहीं है और न ही ट्रंप की आक्रामकता से कोई राहत मिलने वाली। इसके उलट, यह भारत को और अलग-थलग कर सकता है, वाशिंगटन के गुस्से और बीजिंग के अविश्वास के बीच उसे फंसा सकता है।

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2001 में छह यूरेशियाई देशों - चीन, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, रूस, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान- द्वारा स्थापित एससीओ मुख्यतः चीन की पहल है, जिसकी दिशा तय करने में बीजिंग की अग्रणी भूमिका होती है। एससीओ को चीन ने आर्थिक विस्तार के इंजन और सुरक्षा सहयोग के तंत्र के रूप में इस्तेमाल किया है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व में एससीओ का दायरा और आकार बढ़ा है। 2017 में भारत और पाकिस्तान इसके पूर्ण सदस्य बने; 2023 में ईरान शामिल हुआ; और बेलारूस 2024 में। आज एससीओ दुनिया की लगभग आधी आबादी और वैश्विक जीडीपी के लगभग एक-चौथाई का प्रतिनिधित्व करता है। यह क्षेत्रीय सुरक्षा क्लब न होकर अंतरमहाद्वीपीय संगठन बन गया है।

चीन के लिए इस विस्तार का दोहरा फायदा है। एक, मध्य एशिया में अपना प्रभाव मजबूत करना और दूसरा, एससीओ को एक मंच के रूप में इस्तेमाल कर खुद को वैश्विक दक्षिण के चैंपियन और पश्चिमी नेतृत्व वाली संस्थाओं के विकल्प के रूप में पेश करना।

वर्षों से मोदी ने अपनी विदेश नीति भारत की वाशिंगटन से निकटता के इर्द-गिर्द गढ़ी। खास तौर पर उन्होंने ट्रंप के साथ अपनी कथित निजी केमिस्ट्री को रणनीतिक लाभ की गारंटी के तौर पर प्रचारित किया। कुछ समय के लिए, अमेरिका भारत को हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में चीन के खिलाफ संतुलनकारी ताकत के रूप में देखता भी रहा। लेकिन ट्रंप ने रुख बदल लिया है।

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जुलाई के अंत में, ट्रंप ने भारतीय उत्पादों पर 25 फीसद टैरिफ लगाया और फिर इसे भारत द्वारा बड़े पैमाने पर रूसी तेल खरीदने का हवाला देते हुए 50 फीसद कर दिया। उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच युद्धविराम कराने का बार-बार दावा किया है, जो मोदी के लिए गहरी शर्मिंदगी का कारण बना। साफ है कि ट्रंप संकेत दे रहे हैं कि भारत ‘विशेष साझेदार’ से ‘विशेष समस्या’ बन गया है। इसके जवाब में मोदी की प्रतिक्रिया मास्को के साथ पुराने रिश्तों में जान फूंकने और बीजिंग के साथ बातचीत शुरू करने की कोशिश रही है।

चीनी विदेश मंत्री वांग यी की हालिया नई दिल्ली यात्रा को रिश्तों में आई नरमी के सबूत के तौर पर पेश किया गया। 2020 के सीमा संघर्षों के बाद उच्च-स्तरीय संपर्क में आई ठंडक, द्विपक्षीय संबंधों में गहरा ठंडापन और दशकों में विश्वास के सबसे निचले स्तर पर पहुंच जाने के बाद यह नरमी जरूरी थी। अब सीधी उड़ानें फिर से शुरू होने वाली हैं, कुछ सीमावर्ती व्यापार चौकियां फिर से खुलेंगी और चीन ने महत्वपूर्ण दुर्लभ खनिजों और उर्वरकों के निर्यात को मंजूरी दे दी है।

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इस बीच, रूसी अधिकारियों ने तेल और सैन्य उपकरणों की आपूर्ति जारी रखने का वादा किया है और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के इस साल के अंत में नई दिल्ली आने की उम्मीद है। पहली नजर में, एससीओ शिखर सम्मेलन में भाग लेने का मोदी का फैसला इस पुनर्संतुलन में फिट बैठता है, जो रिश्तों को संतुलित करने और रणनीतिक स्वायत्तता को प्रभावित करने का एक प्रयास है।

लेकिन तियानजिन मंच भारत के विकल्पों को बढ़ाने के बजाय उसकी सीमाओं को उजागर करेगा। एससीओ नई दिल्ली के लिए कभी भी एक तटस्थ मंच नहीं रहा। 2017 में भारत और पाकिस्तान के इस समूह में शामिल होने के बाद से यह विरोधाभासों में घिरा रहा है। जून में भारत ने ईरान पर इजराइली हमलों की निंदा करने वाले एससीओ में शामिल होने से इनकार कर दिया था। इस साल के शुरू में भारत ने एससीओ के रक्षा मंत्रियों के एक बयान पर हस्ताक्षर करने से भी इनकार कर दिया था जिसमें बलूचिस्तान का उल्लेख था, लेकिन पहलगाम आतंकी हमले को नजरअंदाज कर दिया गया था जिसमें 26 भारतीय मारे गए थे। चीन ने भारतीय चिंताओं को दरकिनार करते हुए पाकिस्तान की आवाज को बुलंद करने के लिए इस संगठन का इस्तेमाल किया है।

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शी जिनपिंग और शहबाज शरीफ के साथ मोदी की मौजूदगी भले ही दिलचस्प लग रही हो, लेकिन इससे भारत के लिए अनुकूल परिणाम निकलने की संभावना कम है। बीजिंग कश्मीर पर अपना रुख बदलने, पाकिस्तान को अपना समर्थन कम करने, या 2020 में भारत के कब्जाए इलाकों से पीछे हटने वाला नहीं है। तिब्बत से निकलने वाली नदियों को लेकर जल-वैज्ञानिक विवाद अब भी अनसुलझे हैं, और भारत की आपत्तियों के बावजूद चीन ब्रह्मपुत्र पर अपनी विशाल जलविद्युत परियोजना को आगे बढ़ा रहा है। 

रूस भी मोदी को तेल और हथियारों की निरंतर बिक्री की बयानबाजी से ज्यादा कुछ देने वाला नहीं। मास्को के पास एससीओ में भारत की ओर झुककर बीजिंग के साथ अपने गहरे होते रिश्तों को खतरे में डालने की कोई वजह नहीं। वह भारत को पश्चिमी प्रतिबंधों से बचने और वैश्विक मंचों पर अपनी जगह को वैध बनाने के एक जरिया के रूप में देखता है। क्रेमलिन की मीडिया शाखाएं, आरटी और स्पुतनिक, भारत सहित वैश्विक दक्षिण में आक्रामक रूप से विस्तार कर रही हैं, जहां वे नए ब्यूरो बना रही हैं। मोदी इसका पश्चिमी नैरेटिव के प्रतिकार के रूप में स्वागत कर सकते हैं, लेकिन यह केवल इस बात को बताता है कि रूस कैसे अपने रणनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ा रहा है। पुतिन के लिए भारत सुविधा का साझेदार है, प्राथमिकता का नहीं।

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मोदी के लिए असली समस्या यह है कि तियानजिन में उनकी उपस्थिति को वाशिंगटन में कैसे देखा जाएगा। इस सप्ताहांत मोदी को शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन के बगल में बैठे देखना चिड़चिड़े ट्रंप को और भड़का सकता है, और वाशिंगटन इसे इस संकेत के रूप में देख सकता है कि भारत चीन के खेमे में शामिल हो रहा है। व्हाइट हाउस में, जहां ट्रंप के प्रति वफादारी सबसे अहम है, इस तरह के प्रतीकात्मक रुख के भी भारी नुकसान हो सकते हैं। मोदी का मानना ​​हो सकता है कि वह दोनों पक्षों को साध सकते हैं, लेकिन ट्रंप ने बार-बार दिखाया है कि वह अस्पष्टता बर्दाश्त नहीं करते।

न ही चीन मोदी को कोई वास्तविक रियायत देने वाला है। बीजिंग भारत के प्रस्तावों को अवसरवाद मानता है, जो हताशा से प्रेरित है। चीनी रणनीतिकार भारत को हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में एक प्रतिद्वंद्वी और बीजिंग की दक्षिण एशिया महत्वाकांक्षाओं में बाधा के रूप में देखते हैं। वे अमेरिका के साथ भारत के गहरे रिश्तों, फिलीपींस और वियतनाम के साथ उसके हथियार सहयोग और ताईवान तक उसकी पहुंच को शत्रुता के प्रमाण के रूप में देखते हैं। सद्भावना के सीमित संकेत- फिर से शुरू हुई उड़ानें, कुछ खनिज निर्यात, सीमा वार्ता - रणनीतिक नहीं, बल्कि सामरिक हैं। जो कुछ सामने है, वह ज्यादा से ज्यादा एक ‘ठंडी शांति’ है- दूसरे शब्दों में न कोई बड़ा संघर्ष, न ही स्थायी सुलह। 

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विडंबना बहुत बड़ी है। एक समय था जब मोदी ने भारत की ‘ऐतिहासिक झिझक’ को छोड़कर साहसिक, वैश्विक भूमिका अपनाने पर गर्व किया था। आज की हकीकत यह है कि भारत रूसी हथियारों पर इतना निर्भर है कि मास्को को छोड़ नहीं सकता, चीन को लेकर इतना चौकस है कि बीजिंग पर भरोसा नहीं कर सकता और अमेरिकी बाजारों और सत्ता केन्द्रों के सामने इतना खुला है कि वाशिंगटन को नाराज नहीं कर सकता। मोदी का दांव यह है कि तियानजिन जाकर वह तीनों रिश्तों को बचा सकेंगे। लेकिन ज्यादा संभावना है कि वह किसी को भी संतुष्ट तो नहीं ही कर पाएंगे, जिस पर अब तक भरोसा किया था, उससे और दूर हो जाएंगे।

-अशोक स्वैन स्वीडन के उप्सला विश्वविद्यालय में पीस एंड कॉन्फ्लिक्ट रिसर्च के प्रोफेसर हैं।

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