
नर्मदा, जिसे मध्य भारत की जीवनरेखा कहा जाता है, आज अपनी पवित्रता और अस्तित्व दोनों के लिए संघर्ष कर रही है। हाल ही में सीहोर जिले के भैरूंदा क्षेत्र के सातदेव गांव में महायज्ञ समापन के बाद नर्मदा नदी के अभिषेक के लिए टैंकरों से 11 हजार लीटर दूध नर्मदा में अर्पित करने पर देशभर में बहस हो रही हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सातदेव क्षेत्र को सप्त ऋषियों की तपोभूमि माना जाता है, जहां भगवान शिव पातालेश्वर महादेव के रूप में प्रकट हुए थे। यही कारण है कि इस क्षेत्र का धार्मिक महत्व काफी अधिक है और यहां बड़े स्तर पर अनुष्ठान आयोजित होते रहते हैं। बताया जा रहा है कि पूरे आयोजन के दौरान लगभग 41 टन हवन सामग्री, जड़ी-बूटियों के साथ सोना-चांदी की आहुतियां भी दी गईं। इसके अलावा श्रद्धालुओं ने बड़ी संख्या में नारियल अर्पित किए।
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यह आयोजन सातदेव स्थित पातालेश्वर महादेव मंदिर में 21 दिनों तक चले महायज्ञ के समापन पर किया गया, जिसमें हजारों श्रद्धालु शामिल हुए। जहां एक ओर लोग इसे आस्था से जोड़कर देख रहे हैं, वहीं इसके व्यावहारिक पक्ष के कहते बड़ी आबादी इसे उचित नहीं मान रही है । सबसे बड़ी बात मध्य प्रदेश के अमरकंटक से निकलने वाली नर्मदा नदी अपने ही मायके में अंधाधुंध बालू उत्खनन, इसके किनारों के गहने जंगल उजाड़ने और रास्ते के कारखानों से निकलने वाले रासायनिक कचरे के चलते अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है ।
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राजधानी भोपाल से बमुश्किल 40 किलोमीटर दूर सीहोर जिले में एक धार्मिक अनुष्ठान के दौरान 11 हजार लीटर दूध को नर्मदा की धारा में विसर्जित करने की घटना ने न केवल सामाजिक और नैतिक सवाल खड़े किए हैं, बल्कि इस नदी के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र पर मंडराते गहरे वैज्ञानिक खतरों को भी उजागर किया है। एक ऐसे देश में जहां 'ग्लोबल हंगर इंडेक्स' में भारत की स्थिति चिंताजनक है और लाखों बच्चे कुपोषण के कारण शारीरिक और मानसिक विकास की चुनौतियों से जूझ रहे हैं, वहां दूध जैसे पोषक तत्व का यह अपव्यय एक सामाजिक अपराध की श्रेणी में आता है। लेकिन इस सामाजिक पहलू से परे, इसका पर्यावरणीय प्रभाव कहीं अधिक विनाशकारी और दूरगामी है। वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो दूध का नदी में मिलना किसी 'जैविक जहर' के मिलने जैसा ही है।
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दूध एक जटिल जैविक पदार्थ है जिसमें प्रोटीन, वसा और शर्करा (लैक्टोज) की भारी मात्रा होती है। जब यह हजारों लीटर की मात्रा में नदी के सीमित जल क्षेत्र में छोड़ा जाता है, तो यह 'बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड' (बी ओ डी ) को अप्रत्याशित रूप से बढ़ा देता है। जल में मौजूद बैक्टीरिया जब इस भारी जैविक भार को अपघटित करना शुरू करते हैं, तो वे पानी में घुली हुई ऑक्सीजन का तेजी से उपभोग करते हैं। ऑक्सीजन की यह अचानक कमी नदी के जलीय जीवन के लिए 'हाइपोक्सिया' की स्थिति पैदा कर देती है, जिससे मछलियाँ और अन्य सूक्ष्म जीव कुछ ही घंटों में दम तोड़ने लगते हैं।
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नर्मदा का पारिस्थितिकी तंत्र अपनी विशिष्ट जैव-विविधता के लिए जाना जाता है, जिसमें लुप्तप्राय प्रजातियां भी शामिल हैं। दूध के सड़ने से पानी का पीएच (pH) स्तर असंतुलित हो जाता है, जिससे पानी अम्लीय होने लगता है। यह अम्लता जल-जीवों के प्रजनन चक्र को स्थायी रूप से बाधित कर सकती है। इसके अतिरिक्त, दूध में मौजूद वसा पानी की सतह पर एक अभेद्य फिल्म या परत बना लेती है, जो वायुमंडल और जल के बीच ऑक्सीजन के प्राकृतिक विनिमय को रोक देती है।
दूध में फॉस्फोरस और नाइट्रोजन जैसे पोषक तत्व होते हैं। ये तत्व नदी में शैवाल की वृद्धि को असामान्य रूप से बढ़ा देते हैं। इसे 'एल्गल ब्लूम' कहते हैं।यह शैवाल नदी की सतह को ढक लेता है, जिससे सूरज की रोशनी पानी के नीचे नहीं जा पाती।
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रोशनी के बिना जलमग्न पौधे प्रकाश संश्लेषण नहीं कर पाते, जिससे जलीय चक्र पूरी तरह बिगड़ जाता है। दूध के कारण पानी में रोगाणुओं (पैथोजेंन) की संख्या बढ़ सकती है। यह न केवल मछलियों के लिए, बल्कि दूध में मौजूद वसा पानी की सतह पर एक सूक्ष्म परत बना सकती है, जो हवा से ऑक्सीजन के पानी में घुलने की प्रक्रिया को बाधित करती है।
समझना होगा कि नदियाँ स्वयं को साफ करने की क्षमता रखती हैं, लेकिन जब उनमें भारी मात्रा में ऐसी चीजें डाली जाती हैं जिन्हें वे पचा नहीं सकतीं, तो वे 'मृत' होने लगती हैं। जल जीवन की रक्षा के लिए प्रतीकात्मक रूप से केवल कुछ बूंदें या जल का अर्पण करना पर्यावरण के अनुकूल विकल्प है।
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मध्य भारत में नर्मदा पहले से ही बड़े बांधों के कारण प्रवाह में कमी और गाद की समस्या से जूझ रही है। प्रवाह कम होने के कारण नदी की 'सेल्फ-प्यूरीफिकेशन' (स्वयं को साफ करने की क्षमता) कम हो गई है। ऐसे में 11 हजार लीटर दूध का विसर्जन नदी के तलहटी में मौजूद उन जीवों को भी नष्ट कर देता है जो नदी के स्वास्थ्य को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सड़ते हुए दूध से पैदा होने वाली गंध और हानिकारक बैक्टीरिया ( ई कोली आदि) न केवल जल की गुणवत्ता को समाप्त करते हैं, बल्कि नदी के किनारे बसे उन समुदायों के लिए भी स्वास्थ्य संकट पैदा करते हैं जो अपनी दैनिक जरूरतों के लिए इसी जल पर निर्भर हैं।
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भारतीय संस्कृति में नर्मदा को 'रेवा' कहा गया है, जिसका अर्थ है 'उछलने वाली' या 'गतिशील'। इस गतिशीलता को प्रदूषण की गाद से रोकना किसी भी धार्मिक तर्क से उचित नहीं ठहराया जा सकता। शास्त्रों में 'परमार्थ' और 'भूत दया' को सर्वोपरि माना गया है। यदि श्रद्धा का अर्थ केवल संसाधनों का विनाश है, तो यह धर्म नहीं बल्कि विवेकहीनता है। वैसे भी सनातन परंपरा में नदी में पानी के साथ दूध मिल कर एक लोटे में प्रवाहित करने के संस्कार का तो उल्लेख है लेकिन 11 हजार लीटर दूध जिसने की किलोमीटर तक नदी का रंग ही बदल दिया हो , कि कोई मान्यता है नहीं ।
धार्मिक दृष्टिकोण से भी देखें, तो क्या कोई भी ईश्वरीय सत्ता संसाधनों की बर्बादी को स्वीकार कर सकती है? भारतीय दर्शन में 'अन्न' को ब्रह्म माना गया है और 'नर सेवा ही नारायण सेवा' का आदर्श सर्वोपरि रखा गया है। प्राचीन समय में जब संसाधन प्रचुर थे और आबादी कम, तब अभिषेक और अर्पण की परंपराएँ प्रतीकात्मक थीं। लेकिन आज के समय में, जहाँ नदियाँ पहले से ही प्रदूषण और घटते जलस्तर से जूझ रही हैं, वहाँ श्रद्धा को विज्ञान और मानवता के साथ जोड़ना अनिवार्य है। स्वामी विवेकानंद अक्सर कहा करते थे कि भूखे को रोटी देना ही सबसे बड़ी पूजा है। यदि वही 11 हजार लीटर दूध किसी बस्ती के कुपोषित बच्चों या अनाथालयों में वितरित किया जाता, तो वह उस ईश्वर की अधिक सच्ची आराधना होती, जिसकी प्रसन्नता के लिए यह आयोजन किया गया।
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नदियों को आज के दौर में केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि एक 'जीवित इकाई' माना जाता है। उनमें इस प्रकार का विसर्जन उनके अस्तित्व पर प्रहार है। दूध के फटने और सड़ने से पानी में अमोनिया और अन्य हानिकारक गैसों का स्तर बढ़ जाता है, जो दूरगामी रूप से नदी के पूरे फूड-चेन को दूषित कर देता है। यह प्रदूषित जल जब सिंचाई के माध्यम से खेतों तक पहुँचता है, तो मिट्टी की संरचना को भी प्रभावित करता है। अंततः, हमें यह समझना होगा कि परंपराएँ समाज को जोड़ने और जीवन की रक्षा के लिए बनाई गई थीं, न कि उसे संकट में डालने के लिए। वक्त आ गया है कि हम 'प्रतीकात्मक पूजा' की ओर लौटें, जहाँ अभिषेक के लिए केवल कुछ बूंदों का उपयोग हो और शेष दूध किसी बच्चे की भूख मिटाने के काम आए। हमारी आस्था का मार्ग नदी के विनाश से नहीं, बल्कि मानवता के उत्थान से होकर गुजरना चाहिए। जब तक हम धर्म को तर्क और विज्ञान के चश्मे से नहीं देखेंगे, तब तक हम अपनी नदियों और अपनी आने वाली पीढ़ियों, दोनों के साथ अन्याय करते रहेंगे।
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मध्य भारत के इस प्रमुख जल स्रोत को बचाने के लिए अब केवल प्रतीकात्मक विरोध पर्याप्त नहीं है। हमें यह समझना होगा कि नदी की सच्ची सेवा उसे प्रदूषण मुक्त रखने में है। आस्था को तर्क और विज्ञान के साथ जोड़ना आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। 11 हजार लीटर दूध किसी कुपोषित बच्चे की रगों में जीवन का संचार कर सकता था, लेकिन इसे नदी में बहाकर हमने न केवल पोषण का गला घोंटा है, बल्कि उस जीवनरेखा को भी बीमार कर दिया है जो खुद जीवन देती है। वक्त आ गया है कि हमारी पूजा और परंपराएं 'प्रकृति-अनुकूल' हों, ताकि आने वाली पीढ़ियों को हम सिर्फ कहानियों में नहीं, बल्कि वास्तव में कल-कल बहती नर्मदा सौंप सकें। मध्य प्रदेश नें नर्मदा के इस मामले को एनजीटी को स्वयं संज्ञान में लेना चाहिए।
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