
प्रधानमंत्री मोदी अपने हरेक भाषण में अंतिम आदमी के विकसित भारत की बात करते हैं, बड़ी अर्थव्यवस्था की बात करते हैं। भले ही भारतीय मीडिया और संस्थान मोदी चालीसा के जाप में व्यस्त हों, देश में विकास की नदियां बहा रहे हों, पर समय-समय पर अंतरराष्ट्रीय मीडिया और संस्थान मोदी सरकार और मेनस्ट्रीम मीडिया के दावों को खोखला साबित करते रहते हैं। इन दावों को सत्ता पूरी निर्लज्जता से नकारती है, तो मीडिया इन दावों को समाचारों से गायब कर देता है।
प्रधानमंत्री मोदी बार-बार कतार के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने की बातें करते हैं, दूसरी तरफ पर्यावरण और सामाजिक विकास से संबंधित हरेक अन्तराष्ट्रीय इंडेक्स में मोदी जी का विकसित भारत कतार का अंतिम देश बन जाता है। साफ और जीवंत पर्यावरण पूरी आबादी के जीवन का आधार है, पर मोदी सरकार में देश के पर्यावरण को निर्ममता से रौंदा गया है। पर्यावरण को सौर ऊर्जा, चीतों और बाघों की संख्या में समेट कर रख दिया गया है, और मीडिया को भी बस इतना ही पर्यावरण नजर आता है।
पर्यावरण के मामलों में हम कहां हैं, इसका अंदाजा इस वर्ष प्रकाशित पर्यावरण से संबंधित दो वैश्विक इंडेक्स से लगाया जा सकता है– दोनों इंडेक्स में प्रधानमंत्री मोदी का विकसित भारत अंतिम देशों के साथ खड़ा है– यानि एक नहीं बल्कि दो इंडेक्स पर्यावरण का विनाश करने वाले भारत को ऐसा देश मानते हैं जो पर्यावरण का संहार कर रहा है। अमृत काल के स्वर्णिम अध्याय में इतना नीचे पहुंच जाना जाहिर तौर पर सत्ता और मीडिया के लिए एक अभूतपूर्व उपलब्धि होगी। दोनों इंडेक्स अलग-अलग देशों के संस्थानों ने अपने-अपने तरीके से तैयार किए हैं।
येल यूनिवर्सिटी ने पर्यावरण प्रदर्शन इंडेक्स 2026 तैयार किया है पर अभी इसे सार्वजनिक तौर पर प्रकाशित नहीं किया गया है। एक शर्मनाक तथ्य यह है कि इस इंडेक्स में भी शामिल कुल 177 देशों में भारत 176वें स्थान पर है, केवल लाओस ऐसा देश है जो भारत से भी पीछे है। इस इंडेक्स में भारत के प्रदर्शन का आलम यह है कि अफगानिस्तान, म्यांमार और पाकिस्तान जैसे देश भी हमसे आगे हैं, यानि पर्यावरण संरक्षण में हमसे बेहतर काम कर रहे हैं। लगातार बड़ी अर्थव्यवस्था का राग अलापते प्रधानमंत्री मोदी का विकसित भारत इस इंडेक्स में दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों में तो कहीं है ही नहीं, छोटी अर्थव्यवस्था वाले देशों से भी पीछे है।
सामाजिक सरोकारों, जिनमें पर्यावरण भी शामिल है, के बारे में हमारे देश के दरबारी मीडिया में खबरें नहीं होतीं, इस इंडेक्स की खबर भी सोशल मीडिया, प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया– हरेक जगह नदारद है। जाहिर है पर्यावरण संरक्षण जनता के बीच कोई मुद्दा नहीं है।
जिस तरह से बेरोजगारी की चर्चा होते ही प्रधानमंत्री मोदी गर्व से बताते हैं कि अब भारत का युवा रोजगार मांगता नहीं बल्कि दूसरों को रोजगार देता है, ठीक उसी तर्ज पर पर्यावरण की चर्चा करते हुए भी प्रधानमंत्री 5000 वर्षों की परंपरा का जिक्र करते हैं, बताते हैं कि पर्यावरण संरक्षण हमारी जीवन शैली में रचा-बसा है।
अब पर्यावरण संरक्षण का पैमाना पर्यावरण की स्थिति नहीं बल्कि प्रधानमंत्री तय करते हैं। वह कहते हैं गंगा प्रदूषण-मुक्त है तो सब कहते हैं कि गंगा में प्रदूषण नहीं है; प्रधानमंत्री कहते हैं की वनों का क्षेत्र बढ़ रहा है तो सब यही कहते हैं; प्रधानमंत्री कहते हैं कि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में हमारा योगदान नगण्य है तो यही प्रचारित किया जाता है। अब, सामाजिक सरोकार के आंकड़े अध्ययन से नहीं बल्कि प्रधानमंत्री की जुबान से टपकते हैं। इन सबके बीच हमारे देश का पर्यावरण पूरी तरह उपेक्षित रह गया है और पूंजीवाद सरकारी मदद से इसे पूरी तरह लूटने की और अग्रसर है। पर्यावरण संरक्षण की आवाज उठाने वाले अब नक्सली, माओवादी, राष्ट्रद्रोही, विकास के विरोधी, सनातन विरोधी और आतंकवादी करार दिए जाते हैं।
पर्यावरण प्रदर्शन इंडेक्स हरेक 2 वर्षों के अंतराल पर प्रकाशित किया जाता है। इसके लिए पर्यावरण से संबंधित 47 सूचकों का आकलन कर हरेक देश के प्रदर्शन के आधार पर 0 से 100 के बीच अंक दिए जाते हैं और फिर अंकों के आधार पर एक इंडेक्स तैयार किया जाता है। भारत को कुल 23 अंक मिले हैं और इंडेक्स में 176वें स्थान पर है। पहले स्थान पर 75 अंकों के साथ एस्टोनिया है, जबकि अंतिम स्थान पर 22 अंकों के साथ लाओस है।
इस इंडेक्स में पर्यावरण संरक्षण में सबसे बेहतर प्रदर्शन वाले देश हैं– एस्टोनिया, लक्सेम्बर्ग, यूनाइटेड किंगडम, फ़िनलैंड, नीदरलैंड, जर्मनी, फ़्रांस, नॉर्वे, स्वीडन और ऑस्ट्रिया। इंडेक्स में लाओस सबसे अंतिम स्थान पर है, इससे पहले के देश हैं– भारत, बांग्लादेश, माली, वियतनाम, बुरुंडी, मालदीव, लाइबेरिया, मॉरिटानिया और इंडोनेशिया। भारत के पड़ोसी देशों में सबसे आगे भूटान 52वें स्थान पर है, श्रीलंका 94वें, नेपाल 128वें, चीन 129वें, अफगानिस्तान 135वें, पाकिस्तान 157वें, म्यांमार 159वें, मालदीव 171वें और बांग्लादेश 175वें स्थान पर है।
इंडेक्स में शुरू के 20 देशों में से 19 देश यूरोप के हैं, केवल जापान 16वें स्थान पर है। बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों में इटली 22वें, ऑस्ट्रेलिया 25वें, अमेरिका 27वें, कनाडा 29वें, दक्षिण कोरिया 37वें, इजरायल 39वें, संयुक्त अरब अमीरात 42वें, ब्राजील 50वें, मेक्सिको 58वें, अर्जेन्टीना 60वें, रूस 89वें, सऊदी अरब 105वें और दक्षिण अफ्रीका 111वें स्थान पर है। दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और स्वघोषित विश्वगुरु, भारत 176वें स्थान पर है जबकि लगातार युद्ध की विभीषिका झेल रहे देश– यूक्रेन 40वें, लेबनान 93वें और ईरान 107वें स्थान पर है।
येल यूनिवर्सिटी के पर्यावरण विशेषज्ञ डेनियल एस्टी के अनुसार भारत के सपने बड़ी अर्थव्यवस्था के हैं और ऐसे में इंडेक्स में सबसे खराब प्रदर्शन चौंकाता नहीं बल्कि डराता है। भारत का वनों के विनाश, कीटनाशकों के उपयोग और महासागरों के अवैज्ञानिक प्रबंधन के संदर्भ में ट्रैक रिकार्ड बहुत खराब है।
पर्यावरण से संबंधित दूसरे इंडेक्स, नेचर कन्जर्वेशन इंडेक्स 2025, में कुल 180 देशों में भारत 172वें स्थान पर है– केवल लेबनान, बांग्लादेश, बहरीन, टोगो, माइक्रोनेशिया, इराक, तुर्की और किरिबाती ही हमसे भी फिसड्डी हैं। यह इंडेक्स भूमि प्रबंधन, जैव-विविधता पर खतरे, क्षमता और विनाश, जैव-विविधता संरक्षण से संबंधित नीतियां और भविष्य में संरक्षण के रणनीति के आधार पर तैयार किया जाता है। इस इंडेक्स को इजरायल स्थित बेन गुरियन यूनिवर्सिटी और जैव-विविधता पर काम करने वाली संस्था बायो डीबी ने संयुक्त तौर पर तैयार किया है।
कुल 100 अंकों वाले इस इंडेक्स में भारत को महज 46.5 अंक ही दिए गए हैं। इस इंडेक्स में भारत में अकुशल भूमि प्रबंधन और जैव विविधता पर बढ़ते खतरे पर चर्चा की गई है। देश में वनों की रिकार्ड स्तर पर की जा रही कटाई के कारण एक तरफ तापमान वृद्धि में तेजी आ रही है तो दूसरी तरफ संवेदनशील पारिस्थितिकि तन्त्र का विनाश हो रहा है। इस रिपोर्ट के अनुसार भारत अवैध वन्यजीव का चौथा सबसे बड़ा बाजार है।
इस इंडेक्स में अग्रणी 10 देश क्रम से हैं– एस्टोनिया, डेनमार्क, लक्ज़मबर्ग, ऑस्ट्रेलिया, फ़िनलैंड, कोस्टारिका, यूनाइटेड किंगडम, जिम्बॉब्वे, न्यूजीलैंड और स्विटजरलैंड। पर्यावरण संरक्षण के संदभ में भारत से भी बदतर केवल आठ देश हैं– जाहिर है बांग्लादेश को छोड़कर हमारे सारे पड़ोसी देश कम से कम इस संदर्भ में हमसे बेहतर स्थिति में हैं। इस इंडेक्स में भूटान 16वें, नेपाल 76वें, श्रीलंका 85वें, पाकिस्तान 149वें, चीन 162वें, म्यांमार 165वें, अफगानिस्तान 167वें, और बांग्लादेश मालदीव 171वें स्थान पर है। बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में ऑस्ट्रेलिया चौथे, युनाइटेड किंगडम 7वें, फ्रांस 13वें, जर्मनी 14वें, ब्राजील 22वें, साउथ अफ्रीका 30वें, मेक्सिको 33वें, कनाडा 45वें, अमेरिका 51वें, जापान 67वें, इटली 71वें, सऊदी अरब 95वें, अर्जेन्टीना 106वें, और यूनाइटेड अरब अमीरात 108वें स्थान पर है।
जैव-विविधता पर खतरों के संदर्भ में भारत 175वें, राजनैतिक स्थिरता के संदर्भ में 137वें, भूमि पर संरक्षित क्षेत्रों के संदर्भ में 173वें और पुराने पर्यावरण के संदर्भ में 171वें स्थान पर है। जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने के क्षेत्र में भले ही प्रधानमंत्री मोदी स्वयं को विश्वगुरु समझते हों, पर इस इंडेक्स में इस संदर्भ में भारत 133वें स्थान पर है। इन दोनों इंडेक्स से इतना तो स्पष्ट है कि स्वघोषित विश्वगुरु का डंका पीटते-पीटते हम पर्यावरण संरक्षण समेत सभी सामाजिक सरोकारों में दुनिया के सबसे पिछड़े देशों के साथ खड़े हैं और निहायत ही बेशर्मी से विकसित भारत का नारा बुलंद कर रहे हैं।
हमारे देश में पर्यावरण मंत्रालय और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड जैसे संस्थान पर्यावरण संरक्षण नहीं करते बल्कि पूंजीपतियों के लिए पर्यावरण विनाश का मार्ग प्रशस्त करते हैं। ऐसे में हरेक इंडेक्स भले ही भारत को अंतिम स्थान पर रखें, सत्ता को कभी शर्म नहीं आती। मोदी राज में तो बेशर्मी से बिना पढ़े किसी भी इंडेक्स या रिपोर्ट को खारिज करने की एक लंबी परंपरा है– यहां हरेक राष्ट्रीय शर्म सनातन का विरोध करार दी जाती है– यही तथाकथित विकसित भारत का आधार है।