विचार

मानव संसाधन पर मोदी सरकार की गहरी खामोशी, आखिर कैसे बनाएंगे विकसित भारत

आज जो युवा हैं उनके लिए तो मोदी-जाप ही उनका भविष्य है। ध्रुवीकरण इनके मस्तिष्क और कार्यशैली में समा गया है। लेकिन आज जो पैदा हो रहे हैं, जो शिशु हैं– वही भविष्य का मानव संसाधन हैं, वही विकसित भारत बनाएंगें- पर इनकी ओर किसी का ध्यान नहीं है।

मानव संसाधन पर मोदी सरकार की गहरी खामोशी, आखिर कैसे बनाएंगे विकसित भारत
मानव संसाधन पर मोदी सरकार की गहरी खामोशी, आखिर कैसे बनाएंगे विकसित भारत  फोटोः सोशल मीडिया

हमारे प्रधानमंत्री बड़ी अर्थव्यवस्था के बारे में बात करते हैं, युवाओं की आबादी की बात करते हैं, विकसित भारत की बात करते हैं, मन की बात हरेक महीने करते हैं और साल में एक बार परीक्षा पर चर्चा भी करते हैं, पर कभी मानव संसाधन की चर्चा नहीं करते। बिना मानव संसाधन का विकास किए कौन से विकसित भारत की बात सत्ता कर रही है- शायद पांच किलो मुफ़्त अनाज ही विकास है।

आज जो युवा हैं उनके लिए तो मोदी-जाप ही उनका भविष्य है। बेरोजगारी, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार के लिए उचित प्रशिक्षण से इन युवाओं का दूर-दूर तक नाता नहीं है। ध्रुवीकरण इनके विचारों में नहीं बल्कि मस्तिष्क और कार्यशैली में समा गया है। आज जो पैदा हो रहे हैं, जो शिशु हैं– वही भविष्य का मानव संसाधन हैं, वही विकसित भारत बनाएंगें- पर इनकी ओर किसी का ध्यान नहीं है।

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विश्व बैंक ने हाल में भारत समेत गरीब और मध्यम आय वर्ग के देशों के लिए एक चेतावनी जारी की है– इसके अनुसार ये देश स्वास्थ्य व्यवस्था, शिक्षा और रोजगार के लिए जरूरी प्रशिक्षण के क्षेत्र में लगातार पिछड़ते जा रहे हैं जिसका भयानक असर भविष्य में इनकी अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा और साथ ही समाज भी पिछड़ता जाएगा। “बिल्डिंग ह्यूमन कैपिटल व्हेयर इट मैटर्स” नामक रिपोर्ट के अनुसार, यदि गरीब देशों ने इन क्षेत्रों पर ध्यान नहीं दिया तो भविष्य में इनकी अर्थव्यवस्था में 51 प्रतिशत तक नुकसान होगा। रिपोर्ट में नीति निर्धारकों के लिए सुझाव है कि घर, पड़ोस और कार्यक्षेत्र के लिए ऐसी नीतियां तैयार करें जिनसे बच्चे, जो भविष्य के अर्थव्यवस्था की नीव हैं, को एक सुरक्षित और स्वस्थ्य माहौल मिल सके।

स्वास्थ्य के बारे में भारत की स्थिति यह है कि सत्ता की ही हरेक रिपोर्ट यह साबित कर जाती है कि देश की बड़ी आबादी कुपोषित है। भारत सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के वेबसाइट पर एक रिपोर्ट है, हेल्थ एंड फैमिली वेल्फेयर स्टेटिस्टिक्स इन इंडिया 2023। वेबसाइट पर यही इस शृंखला में सबसे नई रिपोर्ट है। इसके अनुसार देश में 6 से 59 सप्ताह तक के कुल बच्चों में से 67.1 प्रतिशत खून की कमी से ग्रस्त हैं। देश के 5 वर्ष से कम उम्र के कुल बच्चों में से 32.1 प्रतिशत का वजन सामान्य से कम है, 35.5 प्रतिशत बच्चों की लंबाई सामान्य से कम है। देश के 15 से 49 वर्ष तक की कुल महिलाओं में से 57 प्रतिशत खून की कमी का शिकार हैं, और गर्भवती महिलाओं में 52.2 प्रतिशत महिलाओं में खून की कमी है।

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हमारा देश संयुक्त राष्ट्र के मानव विकास इंडेक्स 2025 में कुल 193 देशों में 130वें स्थान पर था। इस बार के आर्थिक सर्वेक्षण 2025-2026 में बताया गया कि देश के लगभग सारे बच्चे अब स्कूलों में जाने लगे हैं पर शिक्षा के परिणाम और स्तर में हम पिछड़ते जा रहे हैं। अनेक सर्वेक्षण यह बताते रहे हैं कि पांचवी कक्षा के बच्चे दूसरी कक्षा की किताबें भी नहीं पढ़ पाते, या नौवीं कक्षा के बच्चे पांचवीं कक्षा के गणित को हल नहीं कर पाते। देश में रोजगार में महिलाओं की स्थिति बहुत खराब है। यहां प्रधानमंत्री मोदी बड़े तामझाम से चुनावों के आसपास कई योजनाओं का ऐलान करते हैं- कुछ समय पहले युवा कौशल विकास और प्रशिक्षण से संबंधित ऐसी ही योजना का ऐलान किया गया था। पर, उसका क्या प्रभाव है यह कोई नहीं जानता।

मध्य और निम्न आय वर्ग के कुल 129 देशों में से 86 देशों में स्वास्थ्य, शिक्षा और प्रशिक्षण के संदर्भ में वर्ष 2010 की तुलना में 2025 में गिरावट दर्ज की गई है। यदि इस ओर सरकारों ने तुरंत ध्यान नहीं दिया तो आज के बच्चे जब वयस्क होंगें तो उनकी आय सामान्य की तुलना में 51 प्रतिशत कम होगी। विश्व बैंक की वाइस-प्रेसीडेंट ममता मूर्ति के अनुसार, गरीब और मध्यम आय वर्ग के देशों की आर्थिक समृद्धि मानव संसाधन के विकास के लिए किए गए निवेश पर निर्भर करेगी। दुनिया के अधिकतर देश पोषण, शिक्षा और प्रशिक्षण के क्षेत्र में पिछड़ रहे हैं, जिससे भविष्य में रोजगार की गुणवत्ता और उत्पादकता पर असर पड़ेगा।

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सबसे बुरी स्थिति में सहारा-अफ्रीका के देश हैं। इन देशों में पोषण का यह हाल है कि पिछले 25 वर्षों से वयस्कों की औसत ऊंचाई घटती जा रही है और शिक्षा में बच्चे पिछड़ते जा रहे हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार, परिवार के अंदर बच्चों के उचित पालन-पोषण का असर बच्चों पर जीवन भर रहता है। चीन में करोड़ों बच्चे ऐसे हैं जो दूसरे लोगों के यहां या फिर सरकारी आश्रय केंद्रों में रहते हैं, जिनके अभिभावक रोजगार के लिए दूसरे शहरों में रह रहे हैं। दूसरे लोगों के यहां या फिर आश्रयों में इन बच्चों को अपने घरों से बेहतर सुविधाएं मिलती हैं। पर, इन्हें भी अपने अभिभावकों से दूरी खलती है और ये लगातार मानसिक तनाव में रहते हैं। ऐसे बच्चे सामान्य बच्चों की तुलना में गणित, विज्ञान और भाषा में कमजोर होते हैं और अवसाद-ग्रस्त रहते हैं।

अधिकतर देश इस दौर में गृह-युद्ध, युद्ध और माफियाओं या विद्रोहियों के संकट से जूझ रहे हैं, इसका असर बच्चों के सामान्य पोषण, शिक्षा और मानसिक विकास पर पड़ता है। सैन  साल्वाडोर में विद्रोही गुटों के इलाके में लगातार हिंसा होती है और इस माहौल में जो परिवार हैं वे अर्थव्यवस्था और शिक्षा में निर्धन होते जा रहे हैं। इसका प्रभाव बच्चों पर भी पड़ रहा है। दुनिया भर में 40 प्रतिशत महिलायें रोजगार से दूर हैं, इसका असर उनके घर और उन पर आश्रितों पर भी पड़ता है। गरीब देशों में जो रोजगार में हैं भी उनमें से 70 प्रतिशत से अधिक कृषि, स्वरोजगार या फिर बिना सुविधाओं वाले उद्योगों में कार्यरत हैं। छोटे पैमाने की कृषि पूरी दुनिया में बदहाल है। इस रिपोर्ट के अनुसार, इस गरीबी के बीच भी केन्या, जमैका, वियतनाम और किर्गिस्तान जैसे देश भी हैं जो मानव संसाधन के विकास पर पूरा ध्यान दे रहे हैं और इसके बेहतर परिणाम भी सामने आ रहे हैं।

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एक अध्ययन के अनुसार, जलवायु परिवर्तन, युद्ध, पलायन और डगमगाती वैश्विक अर्थव्यवस्था सम्मिलित तौर पर गरीब देशों पर गहरा प्रभाव डाल रही है। इससे दुनियाभर में गरीबी बढ़ती जा रही है। वैश्विक स्तर पर भूखे लोगों की संख्या अप्रत्याशित तौर पर बढ़ रही है। वर्ष 2011 में भूखे लोगों की संख्या 5 करोड़ आंकी गई थी, वर्ष 2020 तक यह संख्या 15 करोड़ तक पहुंच गई और वर्ष 2025 में भूखे लोगों की संख्या 29.5 करोड़ तक पहुंच गई। इस अध्ययन के अनुसार यदि दुनिया के हालात ऐसे ही रहे तो वर्ष 2100 तक भूखे लोगों की संख्या 1.6 अरब तक पहुंच जाएगी। जाहिर है, भूखी दुनिया में स्वास्थ्य, शिक्षा और प्रशिक्षण पर ध्यान देना कठिन होगा।

विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार, साउथ अफ्रीका और नाइजीरिया जैसे बड़े देशों समेत लगभग एक-चौथाई देशों की अर्थव्यवस्था वर्ष 2019 के मुकाबले गरीब हो गई है। इन देशों में जीडीपी के आंकड़े भले ही बढ़ रहे हों पर सामान्य आबादी में गरीबी बढ़ रही है। अधिकतर देशों में बढ़ती जीडीपी की दर से भी तेज अरबपतियों की आय बढ़ती जा रही है, जबकि दूसरी तरफ सामान्य आबादी संसाधन-विहीन हो रही है। सामान्य आबादी के संदर्भ में वैश्विक विकास दर लगातार गिरती जा रही है, और यह गरीबी हटाने के दावों के बिल्कुल विपरीत है। हमारे देश में भी अमीर लगातार अमीर हो रहे हैं और गरीब पहले से अधिक गरीब। युवाओं को ध्रुवीकरण के चक्रव्यूह में इस तरह उलझा दिया गया कि अब उन पर अफीम से भी गहरा नशा छा गया है। यही युवा तथाकथित विकसित भारत के मानसिक और शारीरिक तौर पर बीमार मानव संसाधन है।

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