
जब सरकारें ध्रुवीकरण और हिंसा की राजनीति मे लिप्त हो जाती हैं, सामाजिक सद्भावना और सौहार्द्र में दखलंदाजी करने लगती हैं, अपने ही समाज में फूट डालो और राज करो वाली राजनीति में लिप्त हो जाती हैं, मीडिया पूरी तरह सत्ता चालीसा में व्यस्त हो जाता है और सोशल मीडिया पूरी तरह अफवाह फैलाने का माध्यम बन जाता है- तब जनता पूरी तरह एकाकीपन और सामाजिक अलगाव की भावना से घिर जाती है। हमारे देश का यही हाल है। जैसे जैसे सत्ता द्वारा सामाजिक सौहार्द्र पर हमला बढ़ता जा रहा है, प्रधानमंत्री का 'सबका साथ' वाला खोखला नारा भी बुलंद होता जाता है। देश की मीडिया के लिए सबसे बड़ा और दिन भर चलाने वाला समाचार यह है कि नरेंद्र मोदी जी7 के फ़ोटो सेशन में पहली लाइन में खड़े थे या दूसरी लाइन में जबकि देश में 14 छात्रों ने नीट के पेपर लीक होने के बाद से आत्महत्या कर ली है।
देश में जनता किस हाल में है, इसका आकलन न तो सत्ता करती है और ना ही मीडिया। सत्ता और मीडिया तो देश की ऐसी छवि प्रस्तुत करते हैं जिससे 'रामराज्य' वाले राम भी शरमा जाएं। देश के विकास की छवि तो भभूत से रंगे त्रिशूल और डमरू धारी नरेंद्र मोदी में समा चुकी है। इस त्रिशूल और डमरू से परे, देश की सामान्य जनता दुख और एकाकीपन की नई परिभाषा गढ़ रही है, नई गहराइयों में डूब रही है। जून 2026 के शुरू में एक वैश्विक सर्वेक्षण के अनुसार जनता में एकाकीपन की अनुभूति के संदर्भ में भारत दुनिया में तुर्की के बाद दूसरे स्थान पर है। इसे आप प्रधानमंत्री के 12 वर्ष की सबसे बड़ी उपलब्धि भी मान सकते हैं। बीजेपी प्रवक्ता, आईटी सेल और मीडिया की नजर में निश्चित तौर पर यह प्रधानमंत्री मोदी की अभूतपूर्व, अद्वितीय और ऐतिहासिक उपलबद्धि होगी।
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इस सर्वेक्षण को जेबी.कॉम नामक एक डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म ने भारत समेत दुनिया के 36 देशों में किया है। इसके अनुसार 58 प्रतिशत भारतीय एकाकीपन का अनुभव करते हैं, 34 प्रतिशत भारतीयों को लगता है कि समाज उनसे कट गया है जबकि 37 प्रतिशत भारतीयों में दुख और अवसाद की अनुभूती है। इस सर्वेक्षण के निष्कर्षों के अनुसार दुख और अवसाद की अनुभूति के संदर्भ में हम वाकई विश्वगुरु हैं, यानि दुनिया में पहले स्थान पर हैं। इस इंडेक्स का आधार एकाकीपन, अलगाव, दुख और जीवन संतुष्टि के आधार पर तैयार किया गया “लोनेलिनेस स्कोर” है– यह 0 से 100 के बीच होता है। 100 अंक यानि सबसे एकाकी और दुखी तो दूसरी तरफ 0 अंक यानि एकाकीपन और दुख का समाज में कोई स्थान नहीं है। सबसे एकाकी देश तुर्की के 100 अंक हैं, जबकि भारत के 89 अंक हैं। भारत के बाद क्रम से ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण कोरिया, संयुक्त अरब एमीरत, यूनाइटेड किंगडम, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया का स्थान है। सबसे बेहतर देशों में उज्बेकिस्तान, नीदरलैंड, कनाडा और थायलैंड शामिल हैं।
इस अध्ययन के अनुसार भारत में एकाकीपन पुरानी धारणाएं पूरी तरह बदल देता है। हमारे देश में अभी तक संयुक्त परिवार हैं, सबके अनेक दोस्त हैं, लोगों को दोस्तों के साथ मिलने के लिए भरपूर समय है और तमाम उत्सवों और धार्मिक आयोजनों का ताना-बाना है। इन सबके बाद भी यदि हम भारतीय एकाकी महसूस कर रहे हैं तो निश्चित तौर पर शारीरिक जुड़ाव और भावनात्मक जुड़ाव में बहुत बड़ा अंतर है। हम सबके बीच रह कर भी अकेले हो चुके हैं और समाज ही खोखला हो चुका है। यह सब उस राजनीति का परिणाम है जिसे हम वर्ष 2014 से लगातार झेल रहे हैं।
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इससे पहले मार्च 2026 में ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी का वेलबीइंग रिसर्च सेंटर, संयुक्त राष्ट्र के सस्टेनेबल डेवलपमेंट सौल्युशंस नेटवर्क और गैलप के सहयोग से प्रकाशित वर्ल्ड हैप्पीनेस इंडेक्स के 2026 के संस्करण में विश्वगुरु मोदी जी का तथाकथित विकसित भारत कुल 147 देशों में 116वें स्थान पर है। वर्ल्ड हैप्पीनेस इंडेक्स पिछले चौदह वर्षों से प्रकाशित किया जा रहा है और भारत इस सूची में लगातार सबसे पिछले देशों के साथ ही खड़ा रहता है।
भारत का पिछड़ना इसलिए भी आश्चर्य का विषय है क्योकि यहां प्रचंड बहुमत– जनमत या वोटों की चोरी में मतभेद हो सकता है- वाली ऐसी सरकार है जो लगातार जनता की हरेक समस्या सुलझाने का दावा करती रही है। सत्ता के अनुसार उसने पानी, फ्री अनाज, बिजली, कुकिंग गैस और इसी तरह की बुनियादी सुविधाएं हरेक घर में पहुंचा दी है, सबको रोजगार दे दिया है, गरीब तो इतिहास बन चुके हैं, पर इंडेक्स तो यही बताता है कि दुनिया के सबसे दुखी देशों में हम शामिल हैं। इंडेक्स में तो हम चीन, पाकिस्तान और लगातार अशांत रहे नेपाल से भी पीछे हैं। भारत के पड़ोसी देशों में सबसे अच्छे स्थान पर चीन है, यह इंडेक्स में 65वें स्थान पर है। नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका और अफगानिस्तान इस इंडेक्स में क्रमशः 99, 104, 127, 129, 134 और 147वें स्थान पर हैं।
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अपने नागरिकों को मौलिक अधिकारों से वंचित रखने वाले, युद्ध और गृहयुद्ध की विभीषिका झेलते और लम्बे आन्दोलनों को झेलते देश के नागरिक भी हमसे अधिक खुश हैं। हंगरी इंडेक्स में 74वें स्थान पर और फिलिस्तीन 109वें स्थान पर है। वर्ष 2006 से 2010 की तुलना में वर्ष 2024 के इंडेक्स में जिन देशों की खुशी सबसे कम हो गयी थी, उनमें मोदी जी के गारंटी और संकल्प का विकसित भारत भी शुमार है। सामाजिक असमानता में भारत 118वें स्थान पर, सामाजिक सपोर्ट में 123वें स्थान पर और निगेटिव ईमोशन्स में हम 117वें स्थान पर हैं।
स्वघोषित विश्वगुरु के देश की जनता के दुखों का आलम यह है कि लगातार गृहयुद्ध, युद्ध और आतंकवाद की मार झेलते मध्य-पूर्व के अधिकतर देश भी हमसे अधिक खुश हैं। इजरायल इंडेक्स में 9वें स्थान पर है, यूनाइटेड अरब अमीरात 21वें, सऊदी अरब 22वें, कुवैत 42वें, बहरीन 55वें, ओमान 58वें, लिबिया 81वें, इराक 95वें, ईरान 97वें, फिलिस्तीन 109वें, इजिप्ट 139वें और लेबेनान 141वें स्थान पर है।
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हैप्पीनेस इंडेक्स के लिए खुशी का आकलन देशों के प्रति व्यक्ति जीडीपी, स्वास्थ्य अनुमानित आयु, लागों से बातचीत, सामाजिक तानाबाना, अपने निर्णयों की आजादी, समाज में भ्रष्टाचार जैसे मानदंडों से किया जाता है। हैप्पीनेस इंडेक्स में देशों के क्रम से स्पष्ट है की जीवंत लोकतंत्र वाले देशों के नागरिक सबसे अधिक खुश हैं, पर हमारे देश में तो लोकतंत्र का जनाजा निकल चुका है।
दरअसल वर्ष 2014 के बाद से देश में लोकतंत्र की परिभाषा ही बदल दी गई है। सत्ताधारी और उनके समर्थक कुछ भी करने को आजाद हैं– वे अफवाह फैला सकते हैं, हिंसा फैला सकते हैं, बलात्कार कर सकते हैं, हत्या कर सकते हैं और दंगें भी करा सकते हैं। दूसरी तरफ, सरकारी नीतियों का विरोध करने वाले चुटकियों में देशद्रोही ठहराए जा सकते हैं, जेल में बंद किये जा सकते हैं या फिर मारे जा सकते हैं। मीडिया, संवैधानिक संस्थाएं और अधिकतर न्यायालय सरकार के विरोध की हर आवाज को कुचलने में व्यस्त हैं।
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लोकतंत्र की सीढ़ियों पर फिसलने की भारत की आदत पड़ चुकी है, फ्रीडमहाउस के इंडेक्स में भी हमारा देश स्वतंत्र देशों की सूची से बाहर हो चुका है और आंशिक स्वतंत्र देशों के साथ शामिल हो चुका है। भारत दुनिया का अकेला तथाकथित लोकतंत्र है, जहां सत्ता, अपराधी, आतंकवादी, प्रशासन, सरकार, न्याय तंत्र, मीडिया और पुलिस का चेहरा एक ही हो गया है। अब किसी के चहरे पर नकाब नहीं है और यह पता करना कठिन है कि इनमें से सबसे दुर्दांत या खतरनाक कौन है।
इस इंडेक्स से इतना तो स्पष्ट है की हमारे देश के लोग सरकार पर भले ही भरोसा करते लगते हों पर संतुष्ट नहीं हैं, खुश नहीं हैं। पिछले कुछ वर्षों के दौरान जिस तरह से किसानों की समस्याएं, बेरोजगारी, महिलाओं की सुरक्षा, नौकरी से छंटनी, अभिव्यक्ति की आजादी, अल्पसंख्यकों का दमन, सामाजिक ध्रुवीकरण, आपसी वैमनस्व और असहिष्णुता जैसी समस्याएं विकराल स्वरुप में उभरीं हैं उसने पूरे समाज को प्रभावित किया है और समस्याओं से घिरा समाज कभी खुश नहीं रह सकता, भले ही सत्ता कितने भी दावे कर ले। प्रधानमंत्री मोदी “सबका साथ” की बातें करते हैं और जनता एकाकीपन से त्रस्त है, अपने आप को समाज से कटा हुआ समझ रही है। ऐसे में साहिर लुधियानवी का फिल्म प्यासा के लिए लिखा गाना ध्यान आता है, जिन्हें नाज है हिन्द पर वो कहाँ हैं।
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