विचार

कंपनियों को मजदूर शोषण की खुली छूट देकर आग से खेलने वाले नए श्रम कानून

मोदी सरकार के नए श्रम कानून शोषण को कानूनी वैधता का जामा पहनाकर देश को आंतरिक विद्रोह की ओर धकेल रहे हैं। पहले 100 या उससे ज्यादा वर्कर वाली कंपनी को छंटनी या बंद करने से पहले सरकारी मंजूरी लेनी होती थी। अब ऐसा नहीं होगा।

देश के तमाम इलाकों में केंद्र सरकार द्वारा लाए गए चार श्रम कानूनों का विरोध हो रहा है
देश के तमाम इलाकों में केंद्र सरकार द्वारा लाए गए चार श्रम कानूनों का विरोध हो रहा है 

भारत के किसी भी बड़े एयरपोर्ट पर गौर कीजिएगा। जहां कभी सिक्योरिटी और स्क्रीनिंग पोस्ट पर सीआईएसएफ के लोग होते थे, अब उनमें से कई ड्यूटी निजी ठेकेदार के लोग कर रहे हैं। उनसे पूछिए कि वे हर महीने कितने पैसे घर ले जाते हैं। आपको शायद ही कभी 25,000 रुपये से ज्यादा सुनने को मिले, और अक्सर यह रकम 15,000 रुपये के आसपास ही होगी। हो सकता है कि कागज पर उनकी सैलरी ज्यादा हो, लेकिन उन्हें तैनात करने वाली आउटसोर्सिंग एजेंसियों का अपना हिसाब-किताब होता है, और हर तरह की कटौतियों की मार इन कर्मचारियों पर ही पड़ती है।

अगर देश की सबसे ज्यादा नजर में आने वाली सार्वजनिक जगहों में से एक की हकीकत यह है, तो सोचिए किसी छोटे शहर या आपके आस-पास के इंडस्ट्रियल एस्टेट की किसी मामूली फैक्ट्री में काम करने वाले किसी ब्लू-कॉलर वर्कर की हालत क्या होगी। इन्हीं कामगारों को सुरक्षा की सबसे ज्यादा जरूरत थी, लेकिन नरेन्द्र मोदी सरकार के चार नए श्रम कानूनों ने इन्हें ही सबसे ज्यादा असुरक्षित बना दिया है। नवंबर 2025 में लागू हुए नए श्रम कानूनों के लिए केन्द्र सरकार के नियम इसी महीने (8-9 मई को) अधिसूचित किए गए। यह कोई सरलीकरण नहीं, यह सुधार के बाने में शोषण को वैध बनाना है।

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29 श्रम कानूनों को चार कानूनों में एक साथ लाने को बड़ी कामयाबी के तौर पर पेश किया जा रहा है। लेकिन सच्चाई यह है कि एक-दूसरे में उलझे इन कानूनों ने असल में नियमों का पालन करने का बोझ खासकर छोटे बिजनेस पर डाल दिया है। इनमें से कुछ बदलाव- जैसे न्यूनतम वेतन, गिग वर्कर्स को औपचारिक पहचान, अनिवार्य नियुक्ति पत्र- अच्छे हैं लेकिन सुधारों को बताए गए इरादों से नहीं, बल्कि उनकी संरचना से आंका जाना चाहिए- और ये कोड बुनियादी तौर पर पूंजी और कॉरपोरेट हितों की तरफ झुके हैं। 

श्रम सुधारों के निष्पक्ष अध्ययन में उदारीकरण के बाद के तीन दशकों के अनुभवों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। 1990 के दशक के श्रम कानूनों से जुड़े बदलाव इस समझ पर आधारित थे कि श्रमिकों के पक्ष में कड़े नियमों के कारण पंजीकृत विनिर्माण में निवेश, रोजगार और उत्पादकता में कमी आई है। यह अच्छी तरह दस्तावेजीकृत पैटर्न था, जिसे 1958 और 1992 के बीच औद्योगिक विवाद अधिनियम के संशोधनों के बेस्ली-बर्गेस विश्लेषण के जरिये दिखाया गया था। यही शोध तब के सुधारों का बौद्धिक आधार बना।

लेकिन अगले 30 सालों में अनौपचारिक क्षेत्र का विस्तार हुआ। मजदूरी स्थिर रही, जबकि कॉरपोरेट मुनाफा तेजी से बढ़ा। इससे यह सबक मिला कि मजदूरों की सुरक्षा के उपाय अपने आप में उद्योग के लिए बुरे नहीं होते। बल्कि, यह खराब ढंग से बनाए गए और असंगत तरीके से लागू किए गए नियम-कानून होते हैं, जो गलत तरह के प्रोत्साहन पैदा करते हैं। 

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दूरगामी बदलाव

नए श्रम कानून की पोल-पट्टी खोलने वाला नियम है छंटनी सीमा को 100 कामगारों की सीमा से बढ़ाकर 300 कर देना। पुराने औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत, 100 या उससे ज्यादा वर्कर वाली किसी भी कंपनी को छंटनी, लेऑफ या बंद करने से पहले सरकारी मंजूरी लेनी होती थी। 300 की नई सीमा का मतलब है कि भारत की 80 फीसद से ज्यादा मैन्युफैक्चरिंग कंपनियां अब बिना किसी सरकारी निगरानी के लोगों को नौकरी से निकाल सकती हैं। वर्कर के लिए न कोई जवाबदेही, न सुरक्षा।

कानूनों के मुताबिक, हड़ताल से पहले मजदूरों को 60 दिन का नोटिस और 14 दिन का कूलिंग-ऑफ पीरियड भी देना होगा। यह उनके किसी भी अचानक ऐक्शन का अधिकार छीनता है। इसके अलावा, किसी भी मजदूर यूनियन को औपचारिक मान्यता पाने के लिए अब 51 फीसद सदस्यता होनी चाहिए, यह ऐसी सीमा है जो छोटी यूनियनों को हाशिये पर धकेलती है और अलग-अलग मजदूर समूहों के लिए प्रतिनिधित्व को कम करती है। काम के घंटे, छुट्टी और नौकरी से निकालने के नियम 300 से कम मजदूरों वाली जगहों पर लागू नहीं होंगे, जिससे भारत के ज्यादातर औद्योगिक इलाके इसके दायरे से बाहर हो जाएंगे।

छोटी फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूर सबसे ज्यादा असुरक्षित होंगे, क्योंकि इंडस्ट्रियल यूनिट तभी ‘फैक्ट्री’ कहलाएगी जब उसमें न्यूनतम 20 (बिजली वाली यूनिट के लिए) और 40 या उससे ज्यादा (बिना बिजली वाली यूनिट के लिए) कामगार होंगे। वेतन से जुड़े अपराधों को अब शुल्क देकर निपटाया जा सकता है, जिससे ऐसे अपराघों को बढ़ावा मिलेगा क्योंकि इसके उल्लंघन को देय शुल्क के बरक्स तौला जाएगा।

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उपेक्षित मुद्दे 

नए कानून ऐसे समय अधिसूचित किए गए हैं जब श्रम बाजार पहले से ही गहरे संकट में है। ग्रामीण भारत में वास्तविक मजदूरी 2014 से लगभग जीरो फीसद बढ़ी है। सरकार के ही आवधिक श्रम बल सर्वे के मुताबिक, नियमित मेहनताना वित्त वर्ष 22 और 24 के बीच घटा जबकि जीडीपी 6.7 फीसद की दर से बढ़ी। एक ओर तो सैलरी और मजदूरी स्थिर रहीं (भारत के लगभग 57 फीसद ब्लू-कॉलर वर्कर हर महीने 20,000 रुपये से कम कमाते हैं), दूसरी ओर 2020 और 2024 के बीच निफ्टी 500 कंपनियों का मुनाफा 34.5 फीसद की दर से बढ़ा।

उत्पादकता मापने के लिए आईएलओ से मान्यता प्राप्त केएलईएमएस फ्रेमवर्क में पूंजी, श्रम, बिजली, सामग्री, और सेवा को आउटपुट तय करने वाले कारक माना गया है। इसके लिए जरूरी है कि श्रम को सिर्फ मात्रात्मक तरीके से नहीं, बल्कि गुणवत्ता यानी शिक्षा, हुनर, कार्य प्रोफाइल के लिहाज से भी मापा जाए । इस फ्रेमवर्क में, एक ऐसी अर्थव्यवस्था जो श्रम को सस्ता करती है, वह अलग-अलग फर्मों के लिए अल्पकालिक लागत लाभ पैदा कर सकती है, लेकिन हुनर और मांग कम होने से उत्पादकता भी घटती है। 

नए कानून इन बातों पर ध्यान नहीं देते। मोदी सरकार न तो श्वेत पत्र लेकर आई और न ही इस संबंध में कोई अन्य दस्तावेज ही जारी किया जो श्रम कानूनों, वेतन और उत्पादकता के परस्पर रिश्तों की समीक्षा करता। कोई पारदर्शी, सबूत आधारित नीतिगत विचार-विमर्श नहीं हुआ। जब सरकार का ही आर्थिक सर्वे 2024-25 कम रोजगार की बात मानता हो तो यह एक बड़ी विफलता बन जाती है।

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आईटी, गिग वर्कर और अनिश्चितता

54 लाख कर्मचारी और सालाना 250 अरब डॉलर का निर्यात करने वाले भारत के आईटी सेक्टर में श्रम कानून न के बराबर हैं। पहले 2023 और फिर एआई की वजह से 2025-26 में बड़े पैमाने पर छंटनी हुई और इसमें सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं रहा। इस सेक्टर में कोई असरदार ट्रेड यूनियन नहीं है। नॉन-कम्पीट क्लॉज, ‘वेरिएबल पे’ और फौरन नौकरी से निकालने के नियम आम हैं। नए श्रम कानून इनमें से कुछ भी तो नहीं बदलते!

भारत की 1.2 करोड़ की विशाल ‘गिग वर्कफोर्स’ के 2030 तक बढ़कर 2.35 करोड़ तक पहुंचने का अंदाजा है। कानूनी तौर पर इसे औपचारिक मान्यता मिलना सकारात्मक कदम है, लेकिन एग्रीगेटरों द्वारा इस कार्य बल के लिए कल्याण कोष में अपने टर्नओवर का सिर्फ 1-2 फीसद योगदान करना और ऐसी दरें तय करना कि गुजारे भर कमाने के लिए 14-16 घंटे काम करना पड़े- चिंताजनक है। इसे ‘सामाजिक सुरक्षा’ नहीं कहा जा सकता, यह तो छलावा है।

इनसे जुड़े कानूनों के लाभ के लिए प्रस्तावित 90-दिन की पात्रता अवधि की वजह से लाखों वैसे लोग इससे बाहर रह जाएंगे जो कई प्लेटफॉर्म पर काम करते हैं या मौसमी कर्मचारी हैं। एल्गोरिद्मिक डी बोर्डिंग- जिसका मतलब है किसी कर्मचारी को बिना किसी सूचना या इंसानी समीक्षा के किसी ऐप से ब्लॉक कर देना और इसके लिए चारों संहिताओं में कहीं भी कोई कानूनी राहत नहीं है। ये संहिताएं खुदरा, वित्तीय सेवाओं, आतिथ्य और मीडिया जैसे क्षेत्रों में अनिश्चित ‘व्हाइट-कॉलर’ नौकरियों में कार्यरत बड़ी संख्या में कर्मचारियों की भी उपेक्षा करती हैं; जहां कर्मचारियों को बिना किसी ओवरटाइम के लंबे समय तक काम करना पड़ता है, और उन्हें मिलने वाला ‘प्रदर्शन-आधारित’ वेतन अक्सर उनके साथ हकमारी करता है। इन लोगों के पास अपनी बात रखने के लिए न तो कोई यूनियन है, और न ही उनके हितों की रक्षा के लिए कोई संस्थागत आवाज। 

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अंतर्निहित संदेश

इस बहस का एक ऐसा आयाम भी है जो अर्थशास्त्र से परे है। ऐतिहासिक रूप से मजदूर संगठन और छात्र आंदोलन भारत के लोकतांत्रिक नेतृत्व की पौधशाला रहे हैं। पिछले तीन दशकों में, इन दोनों को व्यवस्थित रूप से हाशिये पर धकेल दिया गया है। भारत के लोकतंत्र को फिर से स्वस्थ बनाने के लिए, इन संस्थाओं को पुनर्जीवित किया जाना चाहिए। भाजपा कभी भी इसका समर्थन नहीं करेगी। ठीक इसी वजह से कांग्रेस और विपक्ष को श्रम अधिकारों की बहाली के लिए लड़ना चाहिए- एक संवैधानिक अधिकार के रूप में, और एक वैकल्पिक राजनीतिक दृष्टिकोण के मुख्य केन्द्र के रूप में। 

क्या बदलना जरूरी 

कानूनों में आमूल-चूल बदलाव की जरूरत है। छंटनी की सीमा को वापस 100 कर्मचारियों पर लाना होगा, या फिर उसकी जगह अलग-अलग स्तरों वाली, लागू की जा सकने वाली सुरक्षा व्यवस्था लानी होगी। यूनियन को मान्यता देने के लिए 51 फीसद की सीमा को हटाकर उसकी जगह आनुपातिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था लानी होगी। 60 दिन पहले हड़ताल का नोटिस देने की शर्त को भी खत्म करना होगा; यह असंवैधानिक है।

अनूप सतपथी समिति की सिफारिश के अनुरूप, 2019 की कीमतों पर 375 रुपये प्रति दिन का एक सार्थक राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन, जो मुद्रास्फीति से समायोजित हो, लागू किया जाना चाहिए। एक एल्गोरिथम जवाबदेही अधिनियम के तहत प्लेटफार्मों को स्वचालित कार्य आवंटन, मूल्य निर्धारण और अनुशासनात्मक निर्णयों के पीछे के तर्क का खुलासा करना अनिवार्य होना चाहिए। एक सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा कोष हो जिसमें गिग काम, प्लेटफॉर्म काम, ठेके वाले काम और अनौपचारिक काम समेत सभी तरह के रोजगार शामिल हों। और किसी भी अन्य विधायी बदलाव से पहले, भारत में उत्पादकता अंतर के कारणों पर सार्वजनिक श्वेत पत्र तैयार करने के लिए एक स्वतंत्र राष्ट्रीय श्रम उत्पादकता आयोग का गठन किया जाना चाहिए।

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नोएडा, सूरत, हल्द्वानी, मानेसर, गुरुग्राम, फरीदाबाद, भिवंडी में हुए हालिया श्रमिक आंदोलन स्थानीय शिकायतें नहीं थीं; वे एक देशव्यापी विद्रोह के पूर्व संकेत (चेतावनी) थे। श्रमिक बता रहे थे कि उस स्थिति में हमें क्या उम्मीद करनी चाहिए जब एक दशक तक वेतन को स्थिर रखा जाता है, जब सुरक्षा कवच छीन लिए जाते हैं, और संगठित होने के अधिकार को व्यवस्थित रूप से कमजोर कर दिया जाता है। सरकार ने तब अनसुना कर दिया था। नए श्रम कानून संकेत दे रहे हैं कि अगर सरकार अब भी इस ओर ध्यान नहीं देती है, तो वह एक जन-विद्रोह के लिए जमीन तैयार कर रही है। 

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