विचार

सुधींद्र कुलकर्णी का लेख: यथा राजा तथा प्रजा और राजा कालस्य कारणम्

‘राजा कालस्य कारणम’ और ‘यथा राजा तथा प्रजा’- लोकतंत्र में भी प्रासंगिक हैं और अगर हम पंडित जवाहर लाल नेहरू और नरेंद्र मोदी के युगों पर नजर डालें, तो इसके औचित्य को आसानी से समझ सकते हैं।

फोटो सौजन्य : सोशल मीडिया
फोटो सौजन्य : सोशल मीडिया 

संस्कृत विवेक की भाषा है। इस भाषा में ऐसा भंडार है जो राजनीति और शासन समेत जीवन और समाज के तमाम पहलुओं को लेकर ऐसी बातें सामने रखती है जो समजा-शासन के लिए मिसाल बन जाएं। इस भाषा के दो मुहावरे ऐसे हैं जो इस लेख के विषय- मुस्लिम विरोधी नफरती भाषणों की भारत में हाल के दिनों में आई अमंगल सूचक बाढ़, के लिए प्रासंगिक हैं।

पहली कहावत यह हैः राजा कालस्यकारणम। महाभारत के शांति पर्व में गुरु भीष्म पांच पांडवों में सबसे अग्रज युद्धिष्ठिर के सामने ‘राज धर्म’ के अर्थ की व्याख्या करते हैंः

कालो वा कारणं राज्ञो राजा वा कालकारणम्।

इति ते संशयो मा भूद्राजा कालस्य कारणम्।।

(राजा काल को बनाता है या काल राजा को बनाता है- इसमें तुम कभी संशय मत करना। जान लो कि राजा ही काल को बनाता है। जैसा राजा होगा, वैसा ही अच्छा या बुरा समय।)

जो राज धर्म को जानता है और बिना भेदभाव अपने लोगों को समान रूप से बर्ताव करता है, वैसा न्याय परायण राजा सभी के लिए खुशहाली और प्रसन्नता लाता है जबकि बुरा राजा अपने और अपने राज को नष्ट करता है।

दूसरी कहावत है- यथा राजा तथा प्रजा... जो राज धर्म के अर्थ की व्याख्या करता है। अर्थशास्त्र में चाणक्य कहते हैंः

राज्ञि धर्मिणि धर्मिष्ठाः पापे पापाः समे समाः|

राजान मनुवर्तन्ते यथा राजा तथा प्रजाः||

(यदि राजा पुण्यात्मा है, तो प्रजा भी वैसी ही होती है। यदि राजा पापी है, तो प्रजा भी पापी। यदि वह सामान्य है, तो प्रजा सामान्य है। प्रजा के सामने राजा का उदाहरण होता है और वह उसका ही अनुसरण करती है।)

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आज का भारत राजाओं और सम्राटों के शासन में नहीं है। यहां लोकतंत्र है जिसमें लोग अपना शासक या अपनी सरकार का प्रमुख चुनते हैं। फिर भी, यहां अपूर्ण लोकतंत्र है- ऐसा जिसमें लोगों की भावनाओं या उनके विचार में संसद में बहुमत हासिल करने वाली राजनीतिक पार्टी का शासक या प्रमुख आसानी से हेरफेर कर सकता है। सत्ता हासिल करने और उसे बनाए रखने के लिए अपने आकर्षण का उपयोग कर और अपने पास उपलब्ध शक्ति का बलपूर्वक दुरुपयोग कर कोई षडयंत्रकारी और कुटिल राजनीतिज्ञ इस बात को प्रभावित कर सकता है कि उसके समर्थक किस तरह सोचें और व्यवहार करें। इसके विपरीत अगर कोई शासक ईमानदारीपूर्वक राज धर्म का पालन करता है और सदाचारी लोगों की रक्षा और गलत काम करने वालों को दंडित करने के लिए उसे उपलब्ध शक्ति का उपयोग करता है, तो वह अपने स्वभाव के अनुरूप समाज को मोड़ सकता है।

इस अर्थ में ये दो सूक्तियां- ‘राजा कालस्य कारणम’ और ‘यथा राजा तथा प्रजा’- लोकतंत्र में भी प्रासंगिक हैं और अगर हम पंडित जवाहर लाल नेहरू और नरेन्द्र मोदी के विपरीत युगों पर नजर डालें, तो इसके औचित्य को आसानी से समझ सकते हैं।

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जब भारत को आजादी मिली, हमारे पास एक ऐसे प्रधानमंत्री थे जो विभाजन की त्रासदी और इस वजह से बड़े पैमाने पर होने वाली सांप्रदायिक हत्याओं के बावजूद देश को शांति और एकता की दिशा में ले गए। पाकिस्तान का उदाहरण पेश कर नेहरू और उनके युग के कांग्रेस नेता संसदीय और विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की जीत के लिए धार्मिक कार्ड खेल सकते थे। इसकी जगह नेहरू और उनके सहयोगियों ने ऐसे संविधान की रचना की जिसने भारत को लोकतांत्रिक और समावेशी देश बनाने की घोषणा की। उन लोगों ने संसदीय लोकतंत्र की संस्थाओं के निर्माण की प्रक्रिया का नेतृत्व किया। नेहरू ने अपने व्यक्तित्व का पूरा जोर और अपने पद के पूरे अधिकार को विभाजन के घावों को भरने और देश को दोबारा एकसूत्र में पिरोने में लगा दिया।

ऐसा नहीं है कि आजादी के आरंभिक दशकों में अपने समाज में सांप्रदायिक विद्वेष और पूर्वाग्रह पूरी तरह अनुपस्थित थे। लेकिन क्या नेहरू के शासन में झूठे साधुओं और साध्वियों को मुसलमानों के नरसंहारों की अपील करने वाले आग लगाऊ भाषण देने की अनुमति दी जाती जैसी हाल में हरिद्वार में दुनिया ने दहशत के साथ देखी? नहीं।

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क्या नेहरू के समय में सत्ताधारी पार्टी से संबद्ध कोई मुख्यमंत्री किसी खास समुदाय को निशाना बनाते हुए पक्षपातपूर्ण ढंग से बोलते या काम करते थे जैसा आज उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ नियमित ढंग से करते हैं? नहीं।

क्या मीडिया का बड़ा हिस्सा सांप्रदायिक जहर का लगातार वमन कर रहा था जैसा आज बिना शर्म या देश के कानून के तहत दंडित किए जाने के भय के बिना कर रहा है? नहीं।

क्या तब कोई भी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को अपशब्द कहने और उनकी हत्या के लिए नाथूराम गोडसे की प्रशंसा करने का साहस कर सकता था? निश्चित तौर पर नहीं।

यह सब नेहरू युग में कोई सोच भी नहीं सकता था। वह युग संपूर्ण नहीं था। फिर भी, यह प्राथमिक तौर पर आशा, आदर्शवाद और देशभक्तिपूर्ण एकता का समय था क्योंकि नेहरू थे। चाणक्य ने सही कहा थाः जैसा राजा, वैसी प्रजा।

इसकी मोदी के युग से तुलना करें। भारत आज जैसा है क्योंकि प्रधानमंत्री इस तरह के हैं। 2014 के बाद से नरेन्द्र मोदी अपने सैद्धांतिक ढांचे में भारत को ढालने का प्रयास कर रहे हैं। उनका अपना अघोषित लक्ष्य- और उनके सैद्धांतिक परिवार का घोषित लक्ष्य- भारत को हिन्दू राष्ट्र में बदलना है। इसे हासिल करने का वैचारिक हथियार हिन्दुत्व है जो भारतीय जनता पार्टी को हमेशा सत्ता में बनाए रखने के लिए पर्याप्त तरीके से बड़े हिन्दू वोट बैंक की राजनीतिक लामबंदी करता है। यह हथियार तब ही काम कर सकता है जब लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर होती जाएं; हिन्दू विजयी और गौरवशाली महसूस करें और मुसलमान असुरक्षित, अधिकारहीन और अधीनस्थ महसूस करें। मोदी अपनी नीतियों (उदाहरणः सीएए/एनआरसी), भाषणों (उदाहरणः ‘जो हिंसा कर रहे हैं, उन्हें उनके कपड़ों के जरिये पहचाना जा सकता है’) और नाटकीय अदाकारी (उदाहरणः काशी की उनकी हाल की यात्रा) के जरिये यही कर रहे हैं।

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इस तरह चाणक्य मोदी युग में भी सही हैंः जैसा राजा, वैसे लोग। यथा मोदी, वैसे उनके लोग।

फिर भी, अब और भीष्म तथा चाणक्य के समयों में एक महत्वपूर्ण अंतर है। सच है कि लोकतंत्र अपूर्ण है लेकिन यह मृत नहीं है। प्रजा अपनी लोकतांत्रिक शक्ति का प्रदर्शन कर राजा को अब भी बदल सकती है। लोकतंत्र में शक्ति एकता में निहित होती है- संख्यात्मक एकता और विचारात्मक एकता। मोदी के समर्थक भारतीय समाज के बहुमत नहीं हैं। यहां तक कि जब 2019 में भाजपा ने अपनी स्थापना के बाद लोकसभा की सबसे अधिक सीटें जीतीं, इसका वोट शेयर 37.36 प्रतिशत था। मोदी की शक्ति इस बात में है कि उनके समर्थकों में एकता है और वे मुखर हैं। इसके विपरीत, गैर भाजपा पार्टियों की कमजोरी इस बात में है कि हालांकि उनके समर्थक संख्यात्मक तौर पर बहुमत में हैं लेकिन वे बिखरे हुए हैं और उनके नेता परस्पर विरोधी और असंगत बातें बोलते हैं। फिर भी, गैर भाजपा राजनीतिक दलों को ऐसे वृहत्तर मोर्चे के लिए एकजुट होना ही पर्याप्त नहीं है जो धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र और संविधान के मूलभूत आदर्शों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हों। नए जागरण और लोगों के बीच नई एकता की ज्यादा जरूरत है जिसके बिना भेदभाव की भटकी हुई राजनीति को परास्त नहीं किया जा सकता।

जनता की यह एकता आपसी समझ, आपसी आदर और आपसी सहयोग के बंधन को मजबूत कर बिल्कुल नीचे से तैयार करनी होगी जो हर भारतीय में आम राष्ट्रीय परिवार से होने के भाव को विकसित करने के लिए जरूरी है। भारत को पुनः सही पथ पर वापस लाने का यही एकमात्र तरीका है।

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