
भारतीय राजनीति में राहुल गांधी का एक बड़ी नई उम्मीद के तौर पर उभरना अक्सर ‘एक नए राहुल गांधी’ के आगमन के तौर पर गलत तरह से पेश किया जाता है। यह सोच, विशाल हृदय वाले इस नेता का लगभग दो दशकों तक लगातार मज़ाक उड़ाए जाने को खासी अहमियत देती है। अगर इसे उनकी राजनीति और उनके संघर्ष के मकसद को समझने का एक अहम मोड़ माना जाए, तो इस देर से आई समझ को किसी नए नेता के उदय के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।
इसमें कोई शक नहीं कि राहुल गांधी की लोकप्रियता बढ़ी है। 12 अक्टूबर के ज़बरदस्त मार्च के बाद सोशल मीडिया पर नज़र डालें, तो उनके प्रति प्यार जताने वाले ऐसे तमाम नए युवा समर्थक भी नज़र आएंगे, जो बता रहे हैं कि पहले उन्हें उन पर भरोसा नहीं था, लेकिन अब वे समझ गए हैं कि राहुल असल में क्या हैं।
राहुल गांधी की राजनीति का मूल आधार- सामाजिक न्याय में उनका अटूट विश्वास, भारत के युवाओं और उनकी जायज़ मांगों का समर्थन, आरएसएस-बीजेपी के बहुसंख्यकवादी एजेंडे से संविधान को होने वाले खतरों के बारे में उनकी स्पष्ट और खरी बातें, और चुनावी हेरफेर के खिलाफ उनकी मुहिम- ये सारी बातें काफी पहले ही तय हो गई थीं। इसलिए, जो जानकार इस पल को ‘एक नए राहुल गांधी’ के उदय के तौर पर देख रहे हैं, उन्हें शायद अपनी देर से आई समझदारी का अहसास हो रहा है या फिर अतीत की अपनी शंकाओं को सही ठहराने की कोशिश कर रहे हैं।
दरअसल, जो बदल रहा है, वह है मोदी सरकार की तानाशाही वाली राजनीति, उसके (खराब) कामकाज का रिकॉर्ड, भारत के लोकतांत्रिक संस्थानों पर उसका क़ब्ज़ा, विपक्ष को परेशान करने के लिए जांच एजेंसियों का गलत इस्तेमाल, दल-बदल करवाकर चुनावी जनादेश कमज़ोर करने और सत्ता में बने रहने की उसकी बेताब कोशिशों के बारे में भारत का नज़रिया। राहुल गांधी यह सब बहुत पहले से कहते रहे हैं, तब से कि कई मीडिया पंडितों को शायद याद भी न हो; लेकिन अब बदलाव यह आया है कि लोग उनकी बात को ठहरकर सुनने लगे हैं।
चलिए, थोड़ा पीछे मुड़कर देखते हैं…। इससे पहले कि जंतर-मंतर 1.0 आंदोलन इतना उग्र हो जाता कि सरकार झुकती और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफ़ा देना पड़ता, राहुल गांधी पेपर लीक होने और उन छात्रों के साथ हुए धोखे की बात कर रहे थे, जिनके परिवार अपनी सारी जमा-पूंजी बच्चों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने में लगा देते हैं और ऐसे कर्ज में डूब जाते हैं जिन्हें चुकाना बहुत मुश्किल होता है।
राहुल गांधी इन घोटालों को भारत में रोज़गार के संकट से जोड़ देते हैं। सच तो यही है कि लाखों युवा भारतीयों और उनके परिवारों के लिए ये परीक्षाएं ही अनिश्चितता से बाहर निकलने का एकमात्र ज़रिया हैं, और एक ध्वस्त हो चुके धांधलीपूर्ण शिक्षा तंत्र ने उनके बाहर निकलने का यह एकमात्र रास्ता भी बंद कर दिया है।
‘इंडियन एक्सप्रेस’ की जांच में यह खुलासा होने से पहले कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने भी एसआईआर में गड़बड़ियों और खुलेआम गैर-कानूनी कामों की ओर इशारा किया था, स्वतंत्र मीडिया में कई खुलासों से वोटर लिस्ट में बड़े पैमाने पर हेर-फेर के तमाम सबूत सामने आ चुके थे। राहुल गांधी संसद और उसके बाहर यह मुद्दा तब से उठा रहे थे, जब विपक्ष के अन्य नेताओं को इसकी भनक तक नहीं थी। सरकार और उनके भाड़े के मीडिया सहयोगियों ने इसे ‘अंगूर खट्टे हैं’ (यानी हार की हताशा) की तर्ज पर पेश करने कोशिश की, लेकिन हालिया खुलासों के बाद यह तर्क भोथरा साबित होता दिखा।
हालिया विरोध-प्रदर्शनों से यह स्पष्ट है कि अब हर भारतीय, यहां तक कि मोदी सरकार का बचाव करने वाले भी, समझने लगे हैं कि मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और उनके पूर्ववर्ती राजीव कुमार के कार्यकाल में चुनाव आयोग ने गड़बड़ियां की थीं। राहुल गांधी इस आंदोलन पर अकेले अपना हक़ नहीं जता रहे, जिसकी अगुआई कई लोग कर रहे हैं; लेकिन याद रखना ज़रूरी है कि एक महीने से भी कम समय पहले, जब शेष विपक्ष या आम नागरिक समाज उनकी बात का समर्थन करने को तैयार नहीं था, एसआईआर पर सवाल उठाने के लिए उनका मज़ाक उड़ रहा था।
इसका मतलब यह भी नहीं कि राहुल गांधी एक पूरी तरह परिपक्व राजनेता के तौर पर आए थे। वक्त, अनुभव और लोगों से लगातार जुड़ने से उनका आत्मविश्वास बढ़ा है। मीडिया को साथ लेकर चलने और उन्हें चुनौती देने, किसी भी आकार की जनसभा को संबोधित करने, शासन-प्रशासन के जटिल मामलों को आम लोगों के लिए सहज भाषा में समझाने और संसद व सड़क पर लोगों का ध्यान खींचने की उनकी क्षमता समय के साथ बढ़ी है। युवाओं और बुजुर्गों, सभी के साथ उनकी सहजता और बिना किसी खास तैयारी के जुड़ जाने की उनकी काबिलियत, उस ‘सुप्रीम लीडर’ से बिल्कुल अलग और विपरीत है, जिनका टेलीप्रॉम्प्टर के बिना न बोल पाने के कारण मज़ाक उड़ता है। यह अलग बात है कि जो व्यक्ति बिना प्रॉम्प्टर के बोल नहीं सकता, वही उस भीड़ का नेतृत्व कर रहा था जो राहुल गांधी पर ताने कस रही थी, और उनके करीबी लोगों के नियंत्रण वाला मीडिया भी खुशी-खुशी इस खेल में शामिल था।
राहुल गांधी की वह कई दूरदर्शी चेतावनियां भी शायद ही किसी को याद हों, जब वह 2020 के कुख्यात लॉकडाउन के बारे में या 2016 की नोटबंदी के बारे में या तब, जब वह सबसे पहले मोदी की ‘सूट-बूट की सरकार’ और उसके करीबी उद्योगपतियों के गठजोड़ पर हमला कर रहे थे।
12 फरवरी 2020 को, जब भारत में कोरोनावायरस के महज़ तीन मामले सामने आए थे, तब ही राहुल ने सार्वजनिक स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था को लेकर गंभीर खतरे की चेतावनी दे दी थी। उन्होंने समय रहते कदम उठाने की अपील की, जबकि तत्कालीन केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने उनकी विश्वसनीयता को ही कठघरे में खड़ा कर दिया और वह ज़ोर देकर कहते दिखे कि सारे ज़रूरी एहतियात पहले ही बरते जा चुके हैं। मोदी के अचानक देशव्यापी लॉकडाउन लगाने से एक हफ़्ते पहले, राहुल गांधी लाखों लोगों पर असर डालने वाली ‘आर्थिक सुनामी’ की चेतावनी दे चुके थे। इसके कुछ ही समय बाद आए शुरुआती आधिकारिक अनुमानों से पता चला कि जीडीपी में साल-दर-साल 24 प्रतिशत की गिरावट आई है।
कृषि कानूनों ने एक और बड़ी परीक्षा ली। राहुल गांधी ने 14 जनवरी 2021 को ही कह दिया था कि सरकार इन्हें वापस लेने को मजबूर होगी, और आखिरकार 19 नवंबर को ऐसा ही हुआ। जीत किसानों की हुई, लेकिन मोदी सरकार के उलट, जो मान बैठे थे कि विरोध धीरे-धीरे कमजोर पड़ेगा, राहुल नतीजा पहले ही भांप चुके थे।
हाल के विरोध-प्रदर्शनों का भव्य नज़ारा आसानी से उस शांत राजनीतिक काम को छिपा सकता है जो इस आंदोलन की नींव है।
मोदी सरकार अभी भले ही डांवाडोल और मुश्किल में दिख रही हो, लेकिन वह सत्ता में है और उसे हमला करने के हर अगले मौके का इंतज़ार है। वह आसानी से हार नहीं मानने वाली। लेकिन सड़कों पर दिखते पोस्टर और नारे, सोशल मीडिया पर छाए मीम्स और हज़ारों विद्रोही युवाओं के चेहरे अगर कोई संकेत हैं, तो इसका अंत भी ज़्यादा दूर नहीं है।
अब इसमें तो कोई शक नहीं कि राहुल गांधी विविधता और सामाजिक न्याय पर आधारित राजनीतिक विकल्प का चेहरा बन चुके हैं। वे तब ही सोच-समझकर काम करने वाले और सहानुभूति रखने वाले नेता नहीं बन गए थे, जब लोगों ने उनकी बात सुननी शुरू की थी। अगर आज ज़्यादा लोग उनको सुन रहे हैं, तो इसकी वजह यह है कि जिस राजनीति से तमाम लोगों को उम्मीदें थीं, वह अपने वादे के मुताबिक़ मौके देने में नाकाम रही है।
(अशोक स्वैन स्वीडन की उप्सला यूनिवर्सिटी में पीस एंड कॉन्फ्लिक्ट रिसर्च के प्रोफेसर हैं।)
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