विचार

“नए भारत में उम्मीद का आधार हैं राहुल गांधी”

<b>राहुल के सामने चुनौतियां बहुत हैं, और उन्हें 132 साल पुरानी कांग्रेस में नया उत्साह भरना है। नफरत की राजनीति के इस दौर में क्या देश और पार्टी को एकता और सौहार्द्र के धागे में पिरो पाएंगे वे?</b>

फोटो : Getty Images
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राहुल गांधी की ताजपोशी होने वाली है, जल्द ही उन्हें पार्टी का अध्यक्ष चुन लिया जाएगा, और हो सकता है यह काम अगले महीने ही हो जाए। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने स्वंय ही तमाम कयासों पर विराम लगाते हुए संकेत दिए हैं कि राहुल जल्द ही उस पार्टी की कमान संभालेंगे जिसकी चमक हाल के सालों में फीकी पड़ गई है और जो मौजूदा राजनीतिक हालात में खुद के बदलने की कोशिश कर रही है।

अगर ऐसा होता है तो राहुल गांधी कांग्रेस की कमान संभालने वाले छठे नेहरू-गांधी होंगे। अब तक नेहरू-गांधी परिवार से पांच लोग पार्टी की कमान संभाल चुके हैं। इनमें मोतीलाल नेहरू, जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी शामिल हैं। लेकिन इनमें से किसी ने भी ऐसे वक्त और हालात में पार्टी की कमान नहीं संभाली है, जैसी कि राहुल के वक्त में है।

कांग्रेस संकट में रही है। पार्टी दिशाहीन नजर आती रही है, इसकी उदार विचारधारा पर खतरा मंडरा रहा है। संख्या के हिसाब से कांग्रेस, संसद और विधानसभाओं में अपने सबसे कमजोर दौर में है। यहां तक कि जब 1977 में आपातकाल के बाद इंदिरा गांधी चुनाव हारी थीं, तब भी उसे 154 सीटें मिली थी, जो आज की 44 सीटों से करीब चार गुना ज्यादा थीं। यूं भी बात सिर्फ सीटों की संख्या की नहीं है, दरअसल चौतरफा निराशा के माहौल से घिरी रही है कांग्रेस

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इसमें कोई शक नहीं कि राहुल गांधी को जिस कांग्रेस की कमान सौंपी जाने वाली है, वह अपने 132 साल के इतिहास के सबसे खराब दौर में है। तो क्या राहुल, हर उस कांग्रेसी और गांधी परिवार पर भरोसा करने वालों की उम्मीद के मुताबिक, इस कांग्रेस को चुनाव जीतने वाली पार्टी बना पाएंगे? निश्चित रूप से यह एक चुनौतीपूर्ण काम है।

राहुल गांधी के सामने उनके सबसे बड़े विरोधी के रूप में नरेंद्र मोदी जैसा शख्स है। आप पसंद करें या खारिज करें, लेकिन यह तथ्य है कि गैर-कांग्रेसी दलों की तरफ से पेश अब तक के सबसे साहसी और रोब वाले नेता हैं। यह भी ध्यान रखना होगा कि नरेंद्र मोदी ने अपने दम पर बीजेपी को पूर्ण बहुमत दिलाया है। यह वह तथ्य है जो 1984 के बाद पिछले करीब तीस साल में नहीं हुआ था।

मोदी, संघ परिवार के पहले नेता हैं, जिनकी कथित लोकप्रियता पूरे देश में है। यहां तक कि उन्होंने राजनीतिक कद में अटल बिहारी वाजपेयी को भी पीछे छोड़ दिया है। राहुल गांधी के अपने ही शब्दों में, मोदी एक शानदार वक्ता भी हैं। उन्होंने 21वीं सदी की चुनावी राजनीति की जरूरतों के हिसाब से खुद को अब तक का सबसे टेक सैवी यानी तकनीक का इस्तेमाल करने वाला नेता भी साबित किया है।

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मोदी अपनी तो मार्केटिंग करते ही हैं, अपने सबसे खराब फैसलों और नोटबंदी जैसी अलोकप्रिय नीतियों का भी खूब बखान करते हैं। मोदी को न सिर्फ बीजेपी, बल्कि पूरे संघ परिवार का समर्थन और साथ हासिल है। इन दोनों के खतरनाक मिश्रण ने चुनाव राजनीति की नई मशीनरी तैयार कर दी है। और अब स्थिति यह है कि मोदी से लड़ने का मतलब है, बीजेपी और संघ से एक साथ युद्ध करना। आज के परिदृश्य में यह बेहद दुर्गम जान पड़ता है।

लेकिन, सिर्फ अकेली यही चुनौती नहीं है, जो अध्यक्ष के रूप में राहुल गांधी के सामने है। राहुल की सबसे बड़ी और गंभीर चुनौती है न्यू इंडिया, जिसे उन्हें कांग्रेस के लिए जीतना होगा। आज का भारत, महात्मा गांधी या जवाहर लाल नेहरू का भारत नहीं है। न ही यह इंदिरा, राजीव या सोनिया गांधी के दिनों का भारत है। चुनाव जीतने के लिए महज ‘गरीबी हटाओ’ या ‘आम आदमी का साथ’ के नारों से अब चुनाव नहीं जीते जाते। इंदिरा गांधी के दौर की गरीबों के हितों वाली राजनीतिक के भी दिन लद चुके हैं। आज का भारत, जबरदस्त आकांक्षाओं और अपेक्षाओं वाला भारत है। इस भारत को उससे भी ज्यादा चाहिए, जिसकी अपेक्षा और आकांक्षा बीसवीं सदी का भारत करता रहा है।

लेकिन, कांग्रेस क एक और समस्या है। और, वह यह कि इसकी जड़े अब भी 20वीं सदी के राजनीतिक आदर्शों पर टिकी हुई हैं। मंडल और हिंदुत्व के उद्भव के बाद कांग्रेस ने खुद को बदलने के लिए कोई विशेष प्रयास नहीं किए, और न ही किसी सोशल इंजीनियरिंग में रुचि दिखाई। नर्म हिंदुत्व के साथ इसका प्रयोग 1989 में बुरी तरह नाकाम हुआ था और राजीव गांधी ‘रामराज्य’ के नारे के बाद भी हार गए थे। आज के मोदी, एर्दगन और ट्रम्प के नए दक्षिणपंथी दौर में, कट्टर धर्म निरपेक्षता भी लोगों को नहीं भाती है।

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यह वह नया दौर है जब साम्यवाद पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है और बाजारू अर्थव्यवस्था ने महज एक फीसदी लोगों को दुनिया की 50 फीसदी दौलत पर कब्जे का मौका दे दिया है। नकली बुद्धिमत्ता यानी आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस और रोबोट्स के चलते नौकरियों की ऐसी किल्लत शुरु हो गई है, जैसी कभी किसी ने सोची भी नहीं थी। देखते देखते बेरजोगार युवाओं की पूरी फौज सामने आ खड़ी हुई है जो जरा से इशारे पर हिंसक भीड़ में बदल सकती है।

राहुल एक चुनौतीपूर्ण राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी दुनिया में कदम रख रहे हैं। अतीत की विचारधारा और अतीत के नारे या विरासत का गौरव, कुछ भी काम नहीं आने वाला। आज गुस्से का वह विश्व हमारे सामने है जिसे हर समय किसी काल्पनिक ‘अन्य’ का डर सता रहा है और इस असुरक्षित विश्व में सिर्फ और सिर्फ ‘नफरत’ के ही खरीदार दिख रहे हैं।

इसमें रत्ती भर भी शक नहीं कि विविध संस्कृतिओं, भाषाओं, विश्वासों और धर्मों वाले देश का अस्तित्व तभी बच सकता है, जब यह उस भारत के विचार को आत्मसात करे जहां मतभेदों से पूर्ण अपेक्षाएं और आकांक्षाएं, सौहार्द्र के साथ एक दूसरे के साथ मिलकर एक ऊर्जावान समाज मौजूद हो।

सवाल यह है कि आज के नफरत और काल्पनिक ‘अन्य’ के मुकाबले इस भारत के लिए लोगों को कैसे विश्वास दिलाया जाए?

दरअसल किसी को इसकी हवा भी नहीं है कि गुस्साए भारत को समझाया कैसे जाए। संघ के प्रशिक्षण से घृणा की राजनीति में पारंगत मोदी पिछले कई सालों से न सिर्फ कामयाब साबित हुए हैं, बल्कि पार्टी और यहां तक कि संघ में भी सब पर भारी पड़ते रहे हैं। लेकिन अब, नफरत की राजनीति की भी अब खत्म होने की शुरुआत हो चुकी है। इस राजनीति वेदी पर अर्थव्यवस्था की बलि चढ़ चुकी है और देश की तरक्की की रफ्तार 8 फीसदी से लुढ़क कर 5.7 फीसदी पर पहुंच गई है। बीजेपी के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा की नजर में असली विकास दर मात्र 3.2 फीसदी ही है।

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अब, निश्चित तौर पर मोदीमय दौर का अंत खत्म हो रहा है। लेकिन, क्या बीमार पड़े कांग्रेस संगठन और कुछ हद तक आपसी मतभेदों की शिकार कांग्रेस को राहुल गांधी इस मौके का फायदा उठा पाएंगे? मुश्किल सवाल है, और वक्त ही इसका जवाब देगा।

पर, इतना तय है कि राहुल गांधी ने अपने आप को बहुत बदला है। वह अब एक ‘संकोची या हिचकते राजनीतिज्ञ’ नहीं रहे। उन्होंने अपना एक अलग स्टाइल विकसित किया है, जो मोदी की तरह, महज बड़बोलेपन और नारेबाजी पर आधारित नहीं है। उनकी टिप्पणियां अब तीखी और तार्किक होती हैं जो मोदी के कानफाड़ू भाषणों से उकता चुके आम लोगों को आकर्षित कर रही हैं।

अब राहुल की चुनौती है, 21वीं सदी के दृष्टिकोण और नजरिए को निखारना। इसके लिए उन्हें ऐसी सोशल इंजीनियरिंग करनी पड़ेगी जिसमें समाज के सभी तबकों को उम्मीद नजर आए। लेकिन इससे पहले उन्हें अपनी ही पार्टी के लोगों में नया उत्साह भरना होगा। ऐसा उत्साह जो मोदी को खुलकर चुनौती देने के लिए मैदान में सामने आए और डटकर मुकाबला करे।

राहुल, इंदिरा गांधी नहीं हैं, जो कांग्रेस को दो-दो बार विभाजित कर और पुराने लोगों को दरकिनार करने के बाद भी कामयाब हो सकें। उनकी कामयाबी इस बात पर निर्भर करेगी कि वह नए और पुराने लोगों के बीच कैसे मतभेदों को हवा देने के बजाए सामंजस्य स्थापित करें।

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