
स्वतंत्रता के बाद भारत ने धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र की राह चुनी। लेकिन देश में कुछ ऐसी शक्तियां थीं जो इन मूल्यों के खिलाफ थीं और वे बार-बार यह दुहराती रहीं कि भारत केवल हिंदुओं का राष्ट्र है। ऐसे ही एक संगठन आरएसएस ने अपनी स्थापना के सौ वर्ष पूरे कर लिए हैं। अपने नैरेटिव को फैलाने के लिए उसने जबरदस्त काम किया। पिछले कुछ दशकों में उसका प्रभाव अपने चरम स्तर तक पहुंच गया है। अल्पसंख्यकों से नफरत करने की उसकी विचारधारा शुरू से ही मुसलमानों का दानवीकरण करती रही है और पिछले कुछ दशकों से ईसाईयों के मामले में भी यही किया जा रहा है।
इसका नतीजा है धार्मिक स्वतंत्रता में जबरदस्त गिरावट और धार्मिक अल्पसंख्यकों पर होने वाले अत्याचारों में कई गुना इजाफा। पिछले एक दशक से देश में हिन्दू राष्ट्रवादी पार्टी के सत्ता पर काबिज होने से नफरत का माहौल शिखर पर पहुंच गया है। इस विचारधारा को मानने वालों के हाथों में सत्ता होने के कारण कुटिल तत्वों को इस बात का भरोसा रहता है कि उन्हें उनकी हरकतों की सजा नहीं मिलेगी। बल्कि उनकी हिंसक वारदातों के लिए सरकार उन्हें पुरस्कृत करेगी।
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धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ प्रोपेगेंडा और नफरत फैलाने वालों के विशाल नेटवर्क के कारण समाज की जो सामान्य समझ बन गई है उसका मुकाबला करना बहुत कठिन है। इसी का नतीजा है कि हमें धार्मिक अल्पसंख्यकों का अधिकाधिक हाशियाकरण होता नजर आ रहा है। इसके साथ ही धार्मिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी, भूख आदि से संबंधित वैश्विक सूचंकाकों और सामाजिक व राजनैतिक स्वतंत्रता से संबंधित अधिकांश आकलनों में भारत की स्थिति में गिरावट आ रही है।
यह भारत में अल्पसंख्यकों के जीवन से संबंधित उन बहुत सी रपटों में समुचित रूप से प्रतिबिंबित होता है जो न केवल भारतीय बल्कि वैश्विक संस्थाओं द्वारा भी तैयार की गई हैं। ऐसी ही एक संस्था है यूएससीआईएफआर। यूएससीआईएफआर अमरीका की एक स्वतंत्र, संघीय संस्था है जिसकी स्थापना 1998 के ‘इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम एक्ट‘ के अंतर्गत पूरी दुनिया में धार्मिक या आस्था की स्वतंत्रता की स्थितियों पर नजर रखने, उनके उल्लंघनों की समीक्षा करने और नीतियों के संबंध में अमरीकी राष्ट्रपति, विदेश मंत्री और कांग्रेस को अनुशंसाएं करने के लिए की गई थी।
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यह हर वर्ष अपनी रपट जारी करती है जिसमें विभिन्न देशों में अल्पसंख्यकों के संबंध में विवरण रहता है। पिछले लगभग सात वर्षों से वह भारत को ‘विशिष्ट चिंता वाले राष्ट्र‘ की श्रेणी में रख रही है। इस वर्ष की उसकी रपट काफी चिंतित करने वाली है क्योंकि उसने न केवल भारत को विशिष्ट चिंता वाला राष्ट्र बताया है बल्कि इसके साथ ही आरएसएस और उसके अनुषांगिक संगठनों पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश भी की है।
रपट में कहा गया है कि बिगड़ते अंतरसामुदायिक रिश्तों और धार्मिक अल्पसंख्यकों को डराने-धमकाने एवं सताने के लिए एक संस्था बतौर आरएसएस जिम्मेदार है। रपट के मुताबिक, "राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर लक्षित प्रतिबंध लगाए जाने चाहिए क्योंकि भारत में धार्मिक स्वतंत्रता के हनन और हनन की घटनाओं को नजरअंदाज किए जाने के लिए आरएसएस जिम्मेदार है।"
इस संस्था ने डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन को अपनी सिफारिशें प्रस्तुत की हैं। सिफारिशों में आरएसएस की परिसंपत्तियों को जब्त करना और उसके नेताओं के अमेरिका में प्रवेश पर प्रतिबंध लगाना शामिल हो सकता है। भारत से संबंधित रपट में बताया गया है कि आरएसएस सत्तारूढ़ बीजेपी की पितृसंस्था है और इस ओर ध्यान दिलाया गया है कि "बीजेपी और आरएसएस के परस्पर संबंधों के चलते कई भेदभावपूर्ण कानूनों का निर्माण और उन्हें लागू किया जाना संभव हो सका है जिनका संबंध नागरिकता, धर्म परिवर्तन और गौवध से है‘‘।
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विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने रपट को पक्षपातपूर्ण बताते हुए खारिज कर दिया। देश के मुख्य विपक्षी दल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने एक ट्वीट में कहा कि "अमेरिका को आरएसएस पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए। ट्रंप प्रशासन से यह सिफारिश यूएससीआईआरएफ ने की, जो अमरीकी सरकार की एक आधिकारिक संस्था है। यूएससीआईआरएफ ने आगाह किया है कि आरएसएस लोगों की धार्मिक स्वतंत्रता के लिए खतरा है। उसकी सिफारिशें स्पष्ट हैं कि आरएसएस पर तुरंत प्रतिबंध लगाया जाए, उसकी परिसंपत्तियों को जब्त किया जाए और उसके सदस्यों के अमेरिका में प्रवेश पर बंदिश लगाई जाए‘‘।
अमेरिका की ‘हिन्दूज फॉर ह्यूमन राईट्स‘ संस्था संघ परिवार की राजनीति का जमकर विरोध करती आ रही है। वे आयोग की अनुशंसाओं से सहमत हैं। रपट में यह स्पष्ट तौर पर बताया गया है कि बीजेपी की अधिकांश नीतियों से भारतीय अल्पसंख्यक उत्पीड़ित हुए हैं। हम जानते हैं कि इन वर्गों के खिलाफ होने वाली हिंसा व्यापक स्वरूप ग्रहण करती जा रही है। हालांकि गुजरात जैसी भयावह हिंसा नहीं हो रही है परंतु हम देख रहे हैं कि लिंचिंग या अन्य तरह की हिंसा अलग-अलग इलाकों में लगातार होती रहती है। ईसाईयों की प्रार्थना सभाओं पर हमले की घटनाएं भी बहु आम हैं। 2025 में क्रिसमस के अवसर पर बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने जो किया वह अत्यंत शर्मनाक था।
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रपट में केन्द्र सरकार द्वारा एनआरसी-सीएसए के माध्यम से मुसलमानों को मताधिकार से वंचित करने के प्रयासों का भी जिक्र किया गया है। रपट में बताया गया है कि 50 से अधिक रोहिंग्याओं को, जिनमें से करीब 14 ईसाई थे, गहरे समुद्र में बेसहारा छोड़ दिया गया था। उमर खालिद और शरजिल इमाम को बिना मुकदमा चलाए जेल में डालने की ओछी हरकत की गई और वे पांच साल से अधिक समय से नजरबंद हैं। यह मामला भारतीय न्याय व्यवस्था पर सवालिया निशान लगाता है। गाय, लव जिहाद और अन्य कई प्रकार के जिहाद मुस्लिम अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने के मुख्य हथियार बने हुए हैं।
करीब 11 राज्यों में धर्म स्वातंत्रय अधिनियम लागू किए गए हैं, जिनका वास्तविक उद्देश्य धर्म परिवर्तन के इच्छुक लोगों को ऐसा करने से रोकना है। अब महाराष्ट्र भी ऐसा कानून बनाने वाले राज्यों की सूची में शामिल होने वाला नया राज्य बन गया है। ये कानून जहां इस्लाम या ईसाई धर्म ग्रहण करने वालों को प्रताड़ित करने का बहाना बन जाते हैं वहीं धर्मपरिवर्तन कर हिंदू बनने का आह्वान खुलेआम किया जाता है और इसे ‘घर वापसी‘ का नाम दिया जाता है। यह दूसरे धर्मों के लोगों पर हिंदू धर्म लादने की एक कुटिल चाल है।
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यूएससीआईआरएफ ने सख्त कदम उठाए जाने को जरूरी बताया है। आरएसएस के खिलाफ सख्त कदम उठाना जरूरी है यह अहसास सबसे पहले जिसे हुआ और जिसने ऐसा किया भी, वे थे भारत के पहले गृहमंत्री और उप प्रधानमंत्री सरदार पटेल। आरएसएस पर प्रतिबंध की घोषणा करते हुए गृह मंत्रालय की एक विज्ञप्ति में कहा गया था ‘‘संघ की आपत्तिजनक और हानिकारक गतिविधियां बिना किसी गिरावट के लगातार जारी हैं और बहुत से लोग संघ की गतिविधियों से प्रेरित और उसके द्वारा प्रायोजित हिंसा की प्रवृत्ति के शिकार हुए हैं। इसके सबसे ताजे और मूल्यवान शिकार हैं स्वयं महात्मा गांधी‘‘।
1975 में आपातकाल के दौरान आरएसएस पर एक बार फिर इंदिरा गांधी द्वारा प्रतिबंध लगाया गया और इसके बाद 1992 में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद, जिसे बीजेपी ने कारसेवा बताया था। आज गुणात्मक एवं परिमाणत्मक दोनों पैमानों पर उसकी नफरत फैलाने वाली गतिविधियां कहीं ज्यादा बड़े स्तर पर जारी हैं। जहां देश में ज्यादातर लोग ऐसे माहौल की चुभन महसूस कर रहे हैं, जिसमें लोकतांत्रिक मूल्यों को दबाया जा रहा है, वहीं यूएससीआईआरएफ ने बिना लागलपेट के इस संगठन की गतिविधियों से पड़े असर पर प्रकाश डाला है। अपने अनेकानेक अनुषांगिक संगठनों के ज़रिये आरएसएस ने दुनिया के कई देशों में अपना जाल फैला लिया है। अब गेंद अमरीकी राष्ट्रपति के पाले में है। लेकिन उनकी अपनी अजीबोगरीब कार्यप्रणाली है।
(लेख का अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया द्वारा)
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