
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो 20 से 22 अक्तूबर के दौरान भारत में थे। लेकिन वह दिल्ली नहीं पहुंचे। साफ तौर पर अपने भारतीय समकक्ष विदेश मंत्री एस. जयशंकर या भारत सरकार के किसी भी नुमाइंदे से मुलाकात करना उनकी प्राथमिकता में नहीं था। उनके इस दौरे का मुख्य मकसद जामनगर जाकर रिलायंस इंडस्ट्रीज के मुकेश अंबानी से बातचीत करना था, जिनकी तेल रिफाइनरियों का मुख्यालय वहीं है।
स्थापित कूटनीतिक प्रोटोकॉल के बिल्कुल उलट, रुबियो के इस दौरे का ऐलान पहले अमेरिकी विदेश विभाग ने किया और भारतीय विदेश मंत्रालय ने काफी बाद में झिझकते हुए इसकी पुष्टि की। दूसरे शब्दों में कहें तो, ट्रंप प्रशासन ने अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों को साधने के लिए मोदी सरकार को पूरी तरह दरकिनार करते हुए निजी क्षेत्र के एक बड़े कारोबारी के साथ सीधी बातचीत का ताना-बाना बुना।
मुंबई पहुंचने के बाद ऐतिहासिक ताज महल पैलेस होटल की सीढ़ियों पर खड़े होकर रुबियो ने कहा: ‘आपके पास रिफाइनिंग की भारी क्षमता वाली एक कंपनी (रिलायंस) मौजूद है… मुझे लगता है कि मुझे जाकर उनसे बात करनी चाहिए, खासतौर पर तब जब मामला सरकारों के आपसी संबंधों और किसी दूसरे देश के तेल से जुड़ा हो…’
अमेरिका ने इस साल जनवरी में वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो का अपहरण कर उन्हें न्यूयॉर्क ले जाए जाने के बाद से उस देश के तेल उद्योग पर बेहद विवादास्पद ढंग से नियंत्रण कर रखा है। रिलायंस इंडस्ट्रीज के पास भारी कच्चे तेल को परिष्कृत करने की विशेषज्ञता है, इसलिए वह बड़ी मात्रा में वेनेजुएला के कच्चे तेल को प्रोसेस करने की अमेरिकी जरूरत को पूरा करने में सक्षम है।
मुकेश अंबानी और उनके बेटे अनंत अंबानी से मुलाकात के बाद रिलायंस ने एक बयान जारी कर कहा: ‘इस यात्रा के दौरान वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य और पारंपरिक एवं नए ऊर्जा क्षेत्रों में व्यावसायिक साझेदारी की संभावनाओं पर व्यापक चर्चा हुई।’ रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ‘अंबानी परिवार ने अमेरिकी कंपनियों के साथ सहयोग की संभावनाओं पर भी अपना नजरिया साझा किया।’ इस साल वेनेजुएला के उत्पादन में हुई क्रमिक बढ़ोतरी के साथ ही रिलायंस पहले से ही उस देश के कच्चे तेल का एक प्रमुख आयातक बन चुका है।
आनन-फानन मुंबई पहुंचे विदेश मंत्री जयशंकर से अपनी मुलाकात में रुबियो ने उम्मीद के मुताबिक भारत पर अमेरिका से ऊर्जा खरीद बढ़ाने का दबाव बनाया। अंबानी के साथ अपनी बातचीत में उन्होंने रिलायंस से वेनेजुएला में अमेरिकी बाजार की जरूरतों को पूरा करने के लिए रिफाइनिंग सुविधाएं स्थापित करने का कथित आग्रह किया। लेकिन इसमें भारत का क्या फायदा? फारस की खाड़ी के संकट के चलते वेनेजुएला से कच्चा तेल खरीदने का मतलब है भारी-भरकम ढुलाई खर्च उठाना, बशर्ते भारत रिलायंस के रिफाइनिंग सहयोग के बदले रियायतों पर मोलभाव न कर ले।
जापान के एनएचके के मुताबिक, रुबियो ने मुंबई में मीडिया से यह भी कहा कि अगला क्वाड शिखर सम्मेलन अगले महीने मनीला में होगा। ट्रंप की बेरुखी के चलते अमेरिका, जापान, भारत और ऑस्ट्रेलिया का यह क्वाड गठबंधन पिछले 22 महीनों से निष्प्रभावी पड़ा है। चारों देशों के शासनाध्यक्षों की बैठक पिछले साल भारत में होनी थी, लेकिन ट्रंप को इसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी। नवंबर में इस बैठक का यह अचानक और मनमाना आयोजन चीन के अपने आगामी दौरे से पहले उस पर दबाव बनाने की एक कमजोर कवायद भर है, लेकिन बीजिंग के इस किस्म की नौटंकी के झांसे में आने के आसार नहीं हैं।
रुबियो ने उद्योगपति गौतम अडानी से भी मुलाकात की, हालांकि दोनों के बीच हुई बातचीत का कोई ब्योरा सामने नहीं आया है। उनकी यह मुलाकात अमेरिका में विपक्षी डेमोक्रेट्स को बिल्कुल रास नहीं आएगी, जिन्होंने अमेरिकी न्याय विभाग से यह जवाब मांगा है कि इस साल की शुरुआत में अडानी के खिलाफ लगे भ्रष्टाचार के आरोप कैसे और क्यों हटा लिए गए। अमेरिका में कानूनी शिकंजे से अडानी के बचने की एक वजह कथित तौर पर अमेरिकी सौर ऊर्जा क्षेत्र में 10 अरब डॉलर के निवेश का उनका संकल्प रहा है।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ भारत सरकार के कड़े एक्शन पर जब पत्रकारों ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग (ओएचसीएचआर) के प्रतिवेदकों की तीखी आपत्तियों का हवाला दिया, तो रुबियो ने उन ‘यूएन विशेषज्ञों’ का उपहास उड़ाते हुए कहा कि यह शब्द ही अपने आप में एक ढकोसला है।
ओएचसीएचआर के करीब 25 प्रतिवेदकों के एक समूह ने कहा था, ‘शांतिपूर्ण जमावड़े पर किसी भी तरह की पाबंदी कानूनसम्मत होनी चाहिए, उसका मकसद जायज होना चाहिए, और वह जरूरी व अनुपातिक होनी चाहिए।’ युवाओं, पत्रकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की 7,000 से अधिक गिरफ्तारियों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा, ‘ये कार्रवाइयां शांतिपूर्ण जमावड़े की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी, व्यक्तिगत सुरक्षा और मानवाधिकारों की रक्षा के अधिकार सहित भारत के बुनियादी अंतरराष्ट्रीय कानूनी दायित्वों का उल्लंघन करती हैं।’
ओएचसीएचआर के विशेषज्ञों ने विभिन्न जगहों, विशेषकर दिल्ली में हुए इस दमन को भारतीय हुकूमत के उस ‘गहरे चिंताजनक रवैये’ का हिस्सा बताया, जिसके तहत ‘शांतिपूर्ण सभाओं पर गैर-जरूरी पाबंदियां, अत्यधिक बल प्रयोग, मनमानी गिरफ्तारियां, जबरन गुमशुदगी और छात्र कार्यकर्ताओं को निशाना बनाने’ की रणनीति अपनाई जा रही है। प्रतिवेदकों ने संबंधित कानून प्रवर्तन एजेंसियों और उनसे जुड़े बलों की गतिविधियों की ‘बिना किसी देरी के स्वतंत्र, निष्पक्ष और गहन जांच’ की मांग की।
इस साल सितंबर में, अमेरिकी कांग्रेस ने एक ऐसा कानून पारित किया जो अमेरिकी राष्ट्रपति को रूसी कच्चा तेल खरीदने वाले देशों के निर्यात पर अपनी मर्जी से 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने का अधिकार देता है। हाल के वर्षों में भारत द्वारा रूसी कच्चे तेल की भारी खरीद को देखते हुए, ट्रंप प्रशासन ने इस कानूनी प्रावधान को भारत के गले पर लटकी तलवार की तरह इस्तेमाल किया है, और इसमें कोई दो राय नहीं कि वह मोदी से अपने हक में एकतरफा व्यापार समझौता हासिल करने के लिए इसका पूरा फायदा उठाएगा। हालांकि ट्रंप ने मध्यावधि चुनावों से पहले अंतरराष्ट्रीय कीमतों को थामने के लिए नए कानून को लागू करने पर 60 दिनों की रोक का संकेत दिया है, लेकिन यह खतरा अभी टला नहीं है।
अपने दौरे पर रुबियो ने बड़े संरक्षकीय अंदाज में कहा: ‘भारत ने अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की इच्छा बार-बार जताई है (जो कि अमेरिका या अमेरिका द्वारा रोके गए वेनेजुएलाई उत्पादन से तेल एवं गैस खरीदने का कूटनीतिक संकेत है) … मुझे लगता है कि उन्होंने इस दिशा में खासी प्रगति की है, और हमें यह देखकर खुशी हो रही है।’ किसी भी सूरत में, खासकर बढ़ते व्यापार घाटे और कमजोर होते रुपये के दौर में, मॉस्को से मिलने वाले प्रतिस्पर्धी सौदे की तुलना में महंगे कच्चे तेल का विकल्प चुनना भारत के राष्ट्रीय हित में कतई नहीं।
न्यूयॉर्क टाइम्स ने जहां रुबियो के इस दौरे को ‘तनावपूर्ण रिश्तों के बीच आर्थिक संबंधों को मजबूत करने’ की कोशिश के तौर पर पेश किया, वहीं ब्रिटेन से अमेरिकी आजादी के 250 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित एक स्वागत समारोह में अमेरिकी विदेश मंत्री अपने भाषण में जयशंकर का नाम लेना, उनकी मौजूदगी दर्ज करना या द्विपक्षीय संबंधों का जिक्र करना तक भूल गए।
दूसरी ओर, जयशंकर ने कहा कि उसी दिन रुबियो के साथ हुई उनकी चर्चा ‘बेहद अहम’ थी और उन्होंने ‘भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाने के लिए भारत की निरंतर प्रतिबद्धता’ को दोहराया।
रुबियो-जयशंकर मुलाकात पर अमेरिकी विदेश विभाग के आधिकारिक बयान में कहा गया: ‘विदेश मंत्री ने दोहराया कि अमेरिका के साथ बढ़ता ऊर्जा व्यापार अपनी विशाल उपभोक्ता मांग को पूरा करते हुए भारत की आपूर्ति श्रृंखलाओं में विविधता लाने में परिवर्तनकारी भूमिका निभा सकता है … और उन्होंने अमेरिकी प्रौद्योगिकियों व प्रणालियों की खरीद बढ़ाने की वकालत की।’
यह साफ तौर पर एकतरफा व्यापार समझौते को मनवाने के लिए वाशिंगटन द्वारा की जा रही सख्त सौदेबाजी जैसा सुनाई देता है। भारत के लिए यही बेहतर होगा कि वह दबाव के आगे घुटने न टेके, जैसा कि दूसरे अधिक साहसी देशों ने करके दिखाया है।
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