
आईआईटी बॉम्बे में द्वितीय वर्ष के छात्र साहिल वाकोडे की हालिया आत्महत्या ने इस बड़े संस्थान में जातिगत भेदभाव के कथित आरोपों से जुड़े सवाल नए सिरे से खड़े कर दिए हैं। पुलिस उन परिस्थितियों की जांच कर रही है जिनके चलते 18 सितंबर को साहिल की मौत हुई। यह घटना परीक्षा के दौरान कथित रूप से अनुचित साधनों के इस्तेमाल से जुड़ी एक घटना के बाद सामने आई थी।
जहां साहिल का परिवार इसे जाति-आधारित उत्पीड़न मान रहा है जिससे वह खुदकुशी के लिए मजबूर हुआ, वहीं आईआईटी-बॉम्बे प्रशासन का कहना है कि छात्र ने कभी जातिगत भेदभाव की शिकायत दर्ज नहीं कराई थी। संस्थान के अधिकतर संकाय सदस्य संबंधित प्रोफेसर के पक्ष में खड़े दिखाई दिए हैं।
उम्मीद की जानी चाहिए कि मामले की निष्पक्ष जांच होगी। लेकिन साहिल की आत्महत्या एक और निराशाजनक हकीकत की ओर ध्यान खींचती है। वर्ष 2020-21 से 2024-25 के बीच केवल आईआईटी संस्थानों में (जिनकी संख्या अब 23 है) 45 छात्रों ने आत्महत्या की जबकि 2022-23 में छह, 2023-24 में 16 और 2024-25 में 13 ऐसे मामले दर्ज हुए थे। इन 45 छात्रों में से 28 एससी, एसटी और ओबीसी समुदायों से थे।
पूरे देश में आत्महत्या की घटनाएं युवाओं के बीच असामान्य रूप से अधिक हैं। वर्ष 2016 में ‘द लांसेट’ में प्रकाशित ‘ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज’ अध्ययन में पाया गया था कि 15 से 39 वर्ष की आयु के लोगों में मौत का सबसे बड़ा कारण आत्महत्या थी। आठ साल बाद, हालात और बदतर हो चुके हैं।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के ताजा आंकड़े इस समस्या की गंभीरता का एक और पैमाना पेश करते हैं। भारत में वर्ष 2024 के दौरान 14,488 छात्रों ने आत्महत्या की, जबकि 2014 में यह संख्या 8,068 थी-यानी एक दशक में करीब 80 फीसद वृद्धि। वर्ष 2024 में कुल दर्ज 1,70,746 आत्महत्याओं में छात्रों की हिस्सेदारी 8.5 फीसद थी, जो 2014 में 6.1 फीसद थी।
साल 2014 से 2024 के दशक के दौरान यह रुझान लगातार बढ़ता रहा, सिवाय 2022 के, जब सालाना आधार पर इसमें मामूली गिरावट दर्ज हुई थी। वर्ष 2024 में महाराष्ट्र में छात्रों की आत्महत्या के सबसे अधिक मामले (1,909) दर्ज किए गए, जिसके बाद उत्तर प्रदेश (1,585), मध्य प्रदेश (1,447) और तमिलनाडु (1,287) का स्थान रहा। ये चार राज्य ही भारत में कुल 43 फीसद छात्र आत्महत्याओं के लिए जिम्मेदार थे।
वैसे, मृत्यु के ये आंकड़े कहानी का केवल आधा हिस्सा बयां करते हैं। वर्ष 2024 में ‘इंडियन जर्नल ऑफ साइकोलॉजिकल मेडिसिन’ में प्रकाशित एक अध्ययन में नौ भारतीय राज्यों के 15 शहरों के 30 विश्वविद्यालयों के 8,542 कॉलेज छात्रों (औसत आयु: 20 वर्ष) का सर्वेक्षण किया गया। इसके नतीजे विचलित करने वाले थे। हर पांचवें छात्र (18.8 फीसद) ने माना कि उसके मन में कभी-न-कभी खुदकुशी का खयाल आया। हर आठवें (12.4 फीसद) ने पिछले वर्ष के दौरान आत्महत्या के विचार आने की बात कही, जबकि 6.7 फीसद ने कभी-न-कभी आत्महत्या के प्रयास की बात कही। दूसरे शब्दों में, आत्महत्या के आधिकारिक आंकड़े युवाओं की उस बड़ी संख्या को नहीं दिखाते जो खुद को गंभीर नुकसान पहुंचाने की मनोदशा से जूझ रहे हैं।
उसी शोध कार्यक्रम से जुड़े विश्लेषण में आत्महत्या के विचारों और प्रयासों के कारकों की पड़ताल की गई। इसमें पारिवारिक रिश्ते, तनाव, चिंता, नशीले पदार्थों का सेवन और खुद को चोट पहुंचाने की प्रवृत्ति जैसे तमाम पहलू शामिल हैं। यह प्रमाण है कि इस समस्या को केवल परीक्षा के तनाव या कैंपस में परामर्श सुविधाओं की मौजूदगी या कमी तक सीमित नहीं किया जा सकता।
दूसरा ‘नीट’
भारत के आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) 2025 के अनुसार, 15 से 29 वर्ष के युवाओं में ऐसे लोगों का अनुपात 25 फीसद है जो न तो किसी रोजगार में हैं, न शिक्षा में और न ही किसी व्यावसायिक प्रशिक्षण में। यानी हर चौथा युवा भारतीय इस स्थिति में है।
मान सकते हैं कि एक बेरोजगार युवा नौकरी खोज रहा होगा। लेकिन ‘नीट’ श्रेणी वाला युवा न तो पढ़ाई कर रहा होता है, न काम कर रहा होता है, न प्रशिक्षण ले रहा होता है और न रोजगार तलाश रहा होता है। इस श्रेणी में कई अलग-अलग परिस्थितियां शामिल हैं और इसे सीधे बेरोजगारी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। भारत के युवा संकट को समझने के लिए इस बारीक अंतर को समझना जरूरी है।
इस दावे का पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं कि व्यवस्था से अलगाव ही आत्महत्या की वजह बनता है। लेकिन हमारे पास यह सवाल उठाने के पर्याप्त आधार हैं कि क्या कुंठित आकांक्षाएं, आर्थिक अनिश्चितता, सामाजिक अकेलापन और मुख्यधारा से लंबे समय तक कटाव उस व्यापक परिदृश्य का हिस्सा हैं? ताजा पीएलएफएस आंकड़े (सितंबर 2026) 15 से 29 वर्ष के ‘नीट’ युवाओं के अनुपात में राज्य स्तर पर पर्याप्त भिन्नता दिखाते हैं।
जहां राष्ट्रीय औसत 25 फीसद (हर चौथा) है, वहीं बिहार में यह 32.1 फीसद, पश्चिम बंगाल में 29.9, उत्तर प्रदेश में 29.1, त्रिपुरा में 28.1, पंजाब में 27.7, हरियाणा में 27.2, तमिलनाडु में 23.1, महाराष्ट्र में 21.9, कर्नाटक में 20.8 और केरल में 21.5 फीसद है।
पीएलएफएस 2025 में, 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग में महिला श्रम बल भागीदारी दर पुरुषों के 60.2 फीसद के बनिस्पत केवल 26.8 फीसद थी, जबकि इसी वर्ग में श्रमिक जनसंख्या अनुपात महिलाओं के लिए 24.4 फीसद और पुरुषों के लिए 58 फीसद दर्ज किया गया। ‘नीट’ युवाओं में भी महिलाएं अधिक है: इस वर्ग की करीब 40 फीसद युवतियां ‘नीट’ के दायरे में हैं, जबकि युवकों में यह 10 फीसद है। शिक्षा और श्रम बाजार से इस तरह बाहर होने में लैंगिक विषमता युवा भारतीय वयस्कों की इस स्थिति का एक और चिंताजनक पहलू है।
हालांकि, ‘नीट’ युवाओं की संख्या से मापे गए इस अलगाव और आत्महत्या के आंकड़ों के बीच कोई सीधा संबंध नहीं दिखता। महाराष्ट्र की ‘नीट’ दर राष्ट्रीय औसत से कम है, लेकिन यहां वर्ष 2024 में आत्महत्याओं की सर्वाधिक संख्या (22,174) दर्ज की गई। ऐसे ही केरला में यह दर औसत से कम होने के बावजूद आत्महत्या की दर काफी अधिक है। शिक्षा, रोजगार और प्रशिक्षण के दायरे से बाहर इन युवाओं के साथ आखिर हो क्या रहा है?
आईआईटी जैसे शीर्ष संस्थानों में आत्महत्याओं पर ध्यान जाता है, लेकिन ‘नीट’ श्रेणी के युवाओं के बड़े हिस्से में बेहिसाब तनाव को कम रिपोर्ट किया जाता है और नतीजतन, इसका कमतर आकलन होता है। इस दायरे से बाहर, साधारण कॉलेजों और निजी कोचिंग केंद्रों में पढ़ने वाले ऐसे युवा छात्र भी हैं जो श्रम बाजार में जगह बनाने की जद्दोजहद में हैं। इनमें से कई रेलवे, बैंक, पुलिस और अर्धसैनिक बलों में सरकारी नौकरियों की हसरत रखते हैं क्योंकि वे सुरक्षा का एक भरोसा देती हैं। लेकिन इससे जुड़ी अनिश्चितता और उसके साथ आने वाला तनाव अब सहनशीलता की आखिरी सीमा पर पहुंच चुका है।
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