विचार

आकार पटेल : एसआईआर और जुल्म की सियासत

असम एनआरसी की खामियां हमारे सामने हैं, लेकिन हमने उससे कोई सबक नहीं सीखा, और उसी तरह की प्रक्रिया पूरे देश में एसआईआर के रूप में शुरु कर दी।

एसआईआर के खिलाफ तमाम राज्यों में लगातार विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं (फोटो : Getty Images)
एसआईआर के खिलाफ तमाम राज्यों में लगातार विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं (फोटो : Getty Images) Hindustan Times

कानून-व्यवस्था न मानने वाले देशों में एक आम बात यह होती है कि वहां मनमानी कार्रवाई को लेकर लोगों में बहुत ज़्यादा बेचैनी होती है। मध्याकाली पाठों से पता चलता है कि हमारे यहां हमेशा से ऐसा ही होता आया है। क्रूरता को एक प्रक्रिया का रूप दे दिया जाता है और लाखों लोगों को यातनाएं दी जाती हैं। पूरे भारत में 'स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न' (एसआईआर) फ़ॉर्म बांटे जा रहे हैं। भले ही पढ़ने वाला कितना भी पढ़ा-लिखा क्यों न हो, इस फ़ॉर्म को पहली बार पढ़ने पर यह समझना नामुमकिन है कि असल में क्या करना है, जबकि यह सिर्फ़ एक पन्ने का है।

कार्यपालिका और न्यायपालिका का कहना है कि हमें इस प्रक्रिया से गुज़ारना न सिर्फ़ उचित है, बल्कि ज़रूरी और आवश्यक भी है। निस्संदेह, हम पहले भी इस रास्ते से गुज़र चुके हैं।

1998 में, असम के राज्यपाल और सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी एस के सिन्हा ने तत्कालीन राष्ट्रपति के आर नारायणन को एक नोट भेजा था, जिसमें उन्होंने वहां के हालात को चिंताजनक बताते हुए कहा था: ‘कई दशकों से पूर्वी पाकिस्तान/बांग्लादेश से बड़े पैमाने पर हो रहे अवैध प्रवास ने इस राज्य की जनसांख्यिकीय बनावट को बदल दिया है। यह असमिया लोगों की पहचान और हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा, दोनों के लिए एक गंभीर खतरा है। केंद्र और राज्य में रही सरकारों ने इस चुनौती का ठीक से सामना नहीं किया है।’

सिन्हा ने उस गंभीर खतरे को टालने के लिए कार्रवाई की मांग की थी जो कुछ समय से बढ़ रहा था। उन्होंने लिखा ‘...अगर इसे प्रभावी ढंग से नहीं रोका गया, तो (बांग्लादेशी) असमिया लोगों पर हावी हो सकते हैं और पूर्वोत्तर के इलाके को भारत के बाकी हिस्सों से अलग कर सकते हैं। इसके रणनीतिक और आर्थिक रूप से विनाशकारी नतीजे होंगे।‘

सिन्हा ने यह माना था कि यह अनुमान किसी डेटा पर आधारित नहीं था। उन्होंने आगे कहा: 'दुर्भाग्य से, आज हमारे पास ऐसी कोई जनगणना रिपोर्ट नहीं है जिसके आधार पर हम सीमा पार आवाजाही के दायरे को ठीक-ठीक बता सकें। इसलिए, पूर्वी पाकिस्तान/बांग्लादेश से हुई अवैध घुसपैठ के पैमाने का पता लगाने के लिए हमें मोटे अनुमानों और अंदाज़ों पर निर्भर रहना पड़ता है।' संक्षेप में, इस थ्योरी को साबित करने के लिए उनके पास कोई सबूत नहीं था, फिर भी उन्हें इस बात पर इतना यकीन था कि उन्होंने इसे आधिकारिक तौर पर राष्ट्रपति के सामने उठाया।

2005 में, सर्बानंद सोनोवाल – जो बाद में असम में बीजेपी के मुख्यमंत्री बने – उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। वे चाहते थे कि ऐसे लोगों की पहचान से जुड़े कानूनों को और सख्त बनाया जाए जिन पर विदेशी होने के शक है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में एस के सिन्हा के अनुमान पर आधारित नोट के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि असम 'बाहरी हमले' का सामना कर रहा है, जिससे संवैधानिक व्यवस्था के टूटने का खतरा पैदा हो गया है।

यह एक तरह से एक चरमपंथी भाषा का गैर जिम्मेदार और गैर-ज़रूरी इस्तेमाल था, जो मुसलमानों के प्रति मौजूद पूर्वाग्रहों और कट्टरता को दर्शाता है। यह एक ऐसी सोच है जो भारत की सर्वोच्च अदालत में भी मौजूद है। न्यायपालिका ने असम के निवासियों पर ही यह ज़िम्मेदारी डाल दी कि वे साबित करें कि वे विदेशनी नहीं है। यह एक ऐसी बात है जिसे अदालत अक्सर मंज़ूरी देती रही है, जैसा कि हमने इस कॉलम में पहले भी देखा है। आम तौर पर, यह राज्य की ज़िम्मेदारी होती है कि वह गलत काम या आपराधिक गतिविधि को साबित करे और सज़ा देने के लिए ज़रूरी सबूत पेश करे। 'दोषी साबित होने तक निर्दोष' माने जाने का यही मतलब है। हालांकि, न्यायपालिका ने असम के लोगों पर ही यह साबित करने की ज़िम्मेदारी डाल दी कि वे विदेशी नहीं थे (और 1971 के बाद पैदा हुए लोगों के मामले में, कि उनके माता-पिता या दादा-दादी विदेशी नहीं थे)। जब तक वे खुद को निर्दोष साबित नहीं कर पाते, तब तक उन्हें दोषी ही माना जाता था।

ऐसे देश में जहां ज़्यादातर लोग गरीब हैं और पूरी तरह पढ़े-लिखे नहीं हैं, जहां कागज़ी कार्रवाई कमज़ोर है, और ऐसे राज्य में जहां बाढ़ आना आम बात है और संपत्ति का पूरा नुकसान होना भी अक्सर होता रहता है, वहां इतने अहम मामले में सबूत पेश करने की ज़िम्मेदारी का उलट जाना क्रूरता थी। राज्य ने एक और काम यह किया कि सुरक्षा के लगभग कोई उपाय नहीं किए।

विदेशियों के लिए बने ट्रिब्यूनल यह तय करते थे कि किसी को आज़ाद किया जाए या जेल भेजा जाए। इन ट्रिब्यूनल में काम करने वाले लोगों को सिर्फ़ चार दिन की ट्रेनिंग दी गई थी। ये वकील और रिटायर हो चुके सरकारी अधिकारी थे जिन्हें दो साल के कॉन्ट्रैक्ट पर रखा गया था। लोगों को इन्हीं के सामने अपना पक्ष रखना होता था। बीजेपी की असम सरकार ने ट्रिब्यूनल के सदस्यों को यह बता दिया कि वह उनसे क्या करवाना चाहती है; सरकार ने उन सदस्यों के कॉन्ट्रैक्ट आगे नहीं बढ़ाए जो लोगों को विदेशी घोषित करने में कम सफल रहे थे।

यह बात उस हलफ़नामे से सामने आई जो सरकार ने खुद गुवाहाटी हाई कोर्ट में जमा किया था, जब ट्रिब्यूनल के कुछ सदस्यों ने कोर्ट में यह कहते हुए याचिका दायर की थी कि उन्हें बिना किसी वजह के नौकरी से निकाल दिया गया था।

सरकार ने कहा कि ऐसा नहीं था और दावा किया कि ट्रिब्यूनल के सभी सदस्यों के काम का मूल्यांकन किया गया था। 2017 में, सरकार ने एक नोट सौंपा जिसमें उन लोगों के नाम थे, साथ ही एक कॉलम में ‘विदेशियों के तौर पर घोषित लोगों का प्रतिशत’, ‘सदस्य के बारे में सरकार की आम राय’ और ‘क्या उन्हें आगे बनाए रखने पर विचार किया जा सकता है या उन्हें हटाया जा सकता है’ आदि जानकारियां दी गई थीं।

जिन अधिकारियों ने अपने ट्रिब्यूनल में आने वाले कुल लोगों में से 10 प्रतिशत से कम लोगों को विदेशी घोषित किया था, उनके काम को 'संतोषजनक नहीं' माना गया और उन्हें 'हटा दिया' गया। राज्य सरकार असल में अपने ट्रिब्यूनल अधिकारियों को ज़्यादा लोगों को विदेशी घोषित करने के लिए प्रोत्साहित कर रही थी और जो अधिकारी ऐसा नहीं कर रहे थे, उन्हें सज़ा दे रही थी। इस तरह के अन्याय पर न तो राष्ट्रीय और न ही वैश्विक स्तर पर ज़्यादा ध्यान दिया गया और यह मामला असम की मीडिया तक ही सीमित रहा।

समस्या तब और गंभीर हो गई जब एक असमिया रंजन गोगोई को सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया। बीजेपी शासित असम ने 40 लाख से अधिक लोगों को छोड़कर पहली सूची तैयार की और फिर उन लोगों की अंतिम सूची बनाई, जिनसे वह संतुष्ट था कि वे उसके द्वारा निर्धारित मानदंडों को पूरा करते थे। यह तथाकथित राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर-एनआरसी था।

इस लिस्ट से 19 लाख लोगों को बाहर रखा गया, जिन्हें अब अपने कागज़ात के साथ 'फ़ॉरेनर्स ट्रिब्यूनल' (विदेशियों के लिए बने ट्रिब्यूनल) के सामने पेश होना होगा और अपनी नागरिकता साबित करनी होगी। इन 19 लाख लोगों में ज़्यादातर हिंदू थे। यह बात उम्मीद के उलट थी क्योंकि बीजेपी ने अपनी ही बात और गवर्नर सिन्हा की उस थ्योरी पर भरोसा किया था कि राज्य अवैध प्रवासियों से भर गया है, जबकि ऐसा होने का कोई सबूत नहीं था।

इसके बाद बीजेपी सरकार ने असम एनआरसी को खत्म करने का फ़ैसला किया, जिस पर काफी मेहनत हुई थी और बहुत से संसाधन भी लगे थे।

हम एक बार फिर वैसी ही प्रक्रिया से गुज़र रहे हैं, लेकिन इस बार यह पूरे देश में हो रही है। ऐसी खबरें आ रही हैं कि हक़ वाले फ़ायदे खत्म किए जा रहे हैं, पासपोर्ट देने से मना किया जा रहा है और फ़ॉर्म बहुत उलझाने वाले हैं। लोग मनमानी और उस सरकार की बेरहमी को लेकर परेशान हैं जो अपने कामों को ‘मिनिमम गवर्नमेंट’ के तौर पर पेश करती है।

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