विचार

SIR में करोड़ों नाम घटे, लेकिन कितने घुसपैठिये मिले? अमित शाह के आरोप पर आंकड़ों से उठते सवाल

अमित शाह का आरोप है कि राहुल गांधी SIR के बहाने घुसपैठियों को बचाना चाहते हैं, लेकिन पहले दो चरणों के 13 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की अंतिम मतदाता सूचियों में 5.84 करोड़ की शुद्ध कमी के आंकड़े इस बहस की एक अलग तस्वीर सामने रखते हैं।

फोटो: सोशल मीडिया
फोटो: सोशल मीडिया 

  • SIR के बाद 13 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में मतदाताओं की संख्या करीब 5.84 करोड़ घटी।

  • उत्तर प्रदेश में 2.04 करोड़ और पश्चिम बंगाल में करीब 88.9 लाख की शुद्ध कमी दर्ज हुई।

  • मतदाता सूची से नाम हटना घुसपैठिया होने का प्रमाण नहीं है।

  • हटाए गए नामों में कितने विदेशी नागरिक थे, इसका कुल आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और SIR के खिलाफ INDIA ब्लॉक द्वारा 12 अक्टूबर के जरबरदस्त और सफल मार्च, उसमे शामिल जनसैलाब की तस्वीरों और वीडियो के सामने आने के बाद अब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने आरोपों के जवाब देने के बजाय राहुल गांधी पर ही आरोप मढ़ दिए।

अमित शाह का आरोप है कि राहुल गांधी और विपक्ष SIR यानी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण का विरोध करके घुसपैठियों को बचाना चाहते हैं। सरकार का तर्क है कि विदेशी नागरिकों को भारत में मतदान का अधिकार नहीं है और मतदाता सूची से अपात्र लोगों के नाम हटाए जाने चाहिए।

लेकिन इस बहस में सबसे अहम सवाल है कि SIR के दौरान वास्तव में कितने विदेशी नागरिकों की पहचान हुई? इसका जवाब राजनीतिक आरोपों से नहीं, चुनाव आयोग के प्रमाणित आंकड़ों से मिलना चाहिए।

बिजनेस स्टैंडर्ड की 20 जुलाई 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, पहले दो चरणों में SIR पूरा कर चुके 13 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की अंतिम मतदाता सूचियों में शुरुआती सूची के मुकाबले करीब 5.84 करोड़ की शुद्ध कमी दर्ज हुई। यह नाम हटने और नए नाम जुड़ने के बाद का अंतर है, न कि कुल हटाए गए नामों की संख्या।

इसके बाद तीसरे चरण में भी कुछ राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की अंतिम सूचियां जारी हुईं। उत्तराखंड के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के मुताबिक, राज्य की अंतिम सूची में 71,58,949 मतदाता रहे, जबकि SIR शुरू होने से पहले यह संख्या 79,60,762 थी। यानी करीब 8.02 लाख की शुद्ध कमी हुई।

पंजाब की 12 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित अंतिम सूची में करीब 2.01 करोड़ मतदाता रहे, जबकि पुनरीक्षण से पहले संख्या करीब 2.14 करोड़ थी। वहां लगभग 13.60 लाख की शुद्ध कमी दर्ज हुई।

चंडीगढ़ में स्थिति अलग रही। वहां ड्राफ्ट सूची में 4,50,282 मतदाता थे, जबकि अंतिम सूची में संख्या बढ़कर 4,60,209 हो गई। यानी दावे-आपत्तियों के बाद ड्राफ्ट के मुकाबले 9,927 मतदाता बढ़े।

अमित शाह के आरोप पर आंकड़ों से क्या पता चलता है?

अगर सरकार का दावा है कि SIR के जरिए घुसपैठियों की पहचान की गई है, तो गृह मंत्रालय और चुनाव आयोग को राज्यवार प्रमाणित आंकड़े सार्वजनिक करने चाहिए। इनमें स्पष्ट होना चाहिए कि कितने नाम हटाए गए, कितने मामलों में विदेशी नागरिकता की पुष्टि हुई और कितने लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की गई।

राहुल गांधी और कांग्रेस का SIR का विरोध करना अपने आप में इस बात का प्रमाण नहीं है कि वे घुसपैठियों को बचाना चाहते हैं। इसी तरह, मतदाता सूची में करोड़ों की शुद्ध कमी होना भी इस आरोप को साबित नहीं करता।

उपलब्ध आंकड़े मतदाता सूचियों में बड़े बदलाव की पुष्टि करते हैं, लेकिन हटाए गए नामों में कितने घुसपैठिये थे, इसका प्रमाणित समेकित आंकड़ा नहीं देते। जब तक सरकार इस सवाल का राज्यवार जवाब नहीं देती, तब तक हटाए गए मतदाताओं को घुसपैठियों की संख्या के बराबर मानना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा। जाहिर है इस सवाल का जवाब मोदी सरकार को ही देना होगा। इस सवाल का जवाब के बजाय अमित शाह आरोप मढ़ रहे हैं।

राहुल गांधी और कांग्रेस SIR का विरोध क्यों कर रहे हैं?

राहुल गांधी और कांग्रेस का विरोध इस बात को लेकर है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के नाम पर कहीं बड़ी संख्या में योग्य मतदाताओं के नाम तो नहीं काटे जा रहे हैं। कांग्रेस का आरोप है कि प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी है, लोगों को नाम हटाए जाने की पर्याप्त सूचना और अपना पक्ष रखने का उचित अवसर नहीं मिल रहा है।

'द इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के मुताबिक, SIR के तहत 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की मसौदा मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए जाने की बात सामने आई है। वहीं, पहले दो चरणों में 13 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की अंतिम सूचियों में मतदाताओं की कुल संख्या में करीब 5.84 करोड़ की शुद्ध कमी दर्ज की गई। यह आंकड़ा मतदाताओं की संख्या में आई कुल कमी बताता है, इसे सीधे तौर पर फर्जी मतदाताओं या विदेशी नागरिकों की संख्या नहीं माना जा सकता। कांग्रेस का कहना है कि इतने बड़े पैमाने पर बदलावों की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए और हटाए गए नामों की जानकारी कारणों सहित सार्वजनिक की जानी चाहिए।

कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। पार्टी का आरोप है कि SIR से जुड़े अहम फैसले और प्रक्रियागत बदलाव आयोग के सभी सदस्यों की जानकारी या सहमति के बिना किए गए और मतदाता पंजीकरण से जुड़े फॉर्म में बदलावों को लेकर भी नियमों का पालन नहीं हुआ।

'द इंडियन एक्सप्रेस' की एक जांच रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों के दौरान कम से कम 14 बार आयोग के कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर आपत्ति दर्ज की थी। इसी आधार पर राहुल गांधी और INDIA गठबंधन के अन्य नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर संबंधित रिकॉर्ड सार्वजनिक करने और मतदाता सूची में हुए बदलावों का स्वतंत्र ऑडिट कराने की मांग की है।

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