विचार

बेकारी से जूझता तथाकथित 'विकसित भारत', 'उत्तम प्रदेश' में तो युवाओं का सबसे बुरा हाल

सत्ता अब युवाओं के मस्तिष्क और सोचने की प्रक्रिया को भी हैक कर रही है। आज के युवा सच नहीं देखते बल्कि आर्टिफ़िशियल इन्टेलिजेंस का मायाजाल देखते हैं और उसी से प्रभावित भी हो रहे हैं। युवा अब तर्कहीन भी हो रहे हैं, इसीलिए हिंसक होने लगे हैं।

बेकारी से जूझता तथाकथित विकसित भारत, 'उत्तम प्रदेश' में तो युवाओं का सबसे बुरा हाल
बेकारी से जूझता तथाकथित विकसित भारत, 'उत्तम प्रदेश' में तो युवाओं का सबसे बुरा हाल फोटोः महेंद्र पांडे

विकसित भारत, विश्वगुरु, सबका विकास, बड़ी अर्थव्यवस्था जैसे सरकारी नारों, रंगीन पोस्टरों और भव्य इवेंट्स मैनेजमेंट के बीच देश का युवा पिस रहा है, अपने सपनों को दफन कर रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में 15 से 28 वर्ष के आयुवर्ग के युवाओं में लगभग 9  करोड़ युवा शिक्षा, रोजगार और कौशल प्रशिक्षण से मरहूम हैं। प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री आदित्यनाथ का तथाकथित “उत्तम प्रदेश” यानि उत्तर प्रदेश इस मामले में देश के औसत से भी मीलों पीछे है।

विश्व बैंक ग्रुप के अनुसार देश में 15 से 28 वर्ष के आयु वर्ग के शिक्षा, रोजगार और प्रशिक्षण से वंचित युवाओं की संख्या वर्ष 2025 में 25.6 प्रतिशत तक पहुंच गई है, यह संख्या साल-दर-साल बढ़ती जा रही है और अब वर्ष 2012 के स्तर, 26.9 प्रतिशत, के आसपास पहुंच चुकी है। वर्ष 2024 में यह संख्या 24.2 प्रतिशत थी, जबकि वर्ष 2023 में यह 23.5 प्रतिशत के स्तर पर रही थी। वर्ष 2012 में यह दर 26.9 प्रतिशत थी, जो प्रधानमंत्री मोदी के अमृत काल में वर्ष 2019 तक 31.2 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। हमारे देश में शिक्षा, रोजगार और कौशल विकास प्रशिक्षण से दूर युवाओं, यानि बेकार युवाओं की युवाओं की कुल संख्या में अनुपात दक्षिण एशिया के औसत स्तर, 25.5 प्रतिशत, और गरीब देशों के औसत स्तर, 17.3 प्रतिशत, से भी बहुत पीछे है।

पीरीयाडिक लेबर फोर्स सर्वे 2025 के अनुसार देश के जिन 600 जिलों में सर्वेक्षण किया गया, उसमें से 250 से अधिक जिलों में शिक्षा, रोजगार और प्रशिक्षण से बाहर 15 से 29 वर्ष के आयुवर्ग के युवाओं की संख्या, युवाओं की कुल संख्या का 25 प्रतिशत से भी अधिक है। इसमें अधिकतर उत्तर भारत के राज्य हैं और इनमें उत्तर प्रदेश अग्रणी है। उत्तर भारत के राज्यों में दो-तिहाई से अधिक जिलों में ऐसी ही स्थिति है।

बेकार युवाओं के मामले में भारत की वैश्विक स्थिति

बेकार युवाओं के संदर्भ में अपने पड़ोसी देशों में भारत से पीछे केवल पाकिस्तान और नेपाल ही हैं। भूटान में 15.3 प्रतिशत, म्यांमार में 15 प्रतिशत, चीन में 12.7 प्रतिशत, श्रीलंका में 17.2 प्रतिशत, पाकिस्तान में 28.5 प्रतिशत और नेपाल में 34.8 प्रतिशत युवा बेकार हैं। लगातार युद्ध की विभीषिका झेल रहे ईरान, लेबनॉन और यूक्रेन में भी युवाओं में बेकारी की दर क्रमशः 24.3, 23.5 और 16.5 प्रतिशत ही है।

बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों में से केवल दक्षिण अफ्रीका में जनसंख्या के अनुपात में बेकार युवाओं की संख्या भारत से ज्यादा, 34.6 प्रतिशत है। अर्जेन्टीना में यह दर 15.2 प्रतिशत, ऑस्ट्रेलिया में 8.5, ब्राजील में 18.7, कनाडा में 13.3, मिस्र में 23.8, फ्रांस में 12.6, जर्मनी में 7.6, इंडोनेशिया में 21.4, इजरायल में 15.3, इटली में 12.0, जापान में 3.1, मेक्सिको में 16.2, रूस में 6.7, सऊदी अरब में 16.4, यूनाइटेड अरब अमीरात में 8.9, यूनाइटेड किंगडम में 14.4 और अमेरिका में यह दर 11.6 प्रतिशत है।

बेकारी से जूझता तथाकथित विकसित भारत, 'उत्तम प्रदेश' में तो युवाओं का सबसे बुरा हाल

देश की औसत स्थिति से बदतर उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश की स्थिति इस संदर्भ में देश की औसत स्थिति से भी बदतर है। मार्च 2026 में समाजवादी पार्टी ने बताया था कि प्रदेश के 15 से 24 वर्ष के आयुवर्ग के कुल युवाओं में से एक-तिहाई, 33.5 प्रतिशत, शिक्षा, रोजगार और कौशल प्रशिक्षण से वंचित हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत 29.3 प्रतिशत ही है। 15 से 29 वर्ष के आयुवर्ग में तो यह संख्या 36.7 प्रतिशत तक पहुंच जाती है। प्रदेश में 15 से 29 वर्ष के आयुवर्ग की कुल महिलाओं में से 59.5 प्रतिशत शिक्षा, रोजगार और कौशल विकास प्रशिक्षण से बाहर हैं।

आईआईएम लखनऊ और एजुकेट गर्ल्स नामक संस्था द्वारा किए गए एक संयुक्त अध्ययन के अनुसार उत्तर प्रदेश में 15 से 29 वर्ष के आयुवर्ग की 60 प्रतिशत महिलायें बेकार हैं और यह संख्या पुरुषों की तुलना में चार-गुणा अधिक है।

यूथ पावर नामक संस्था की रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश के 100 युवाओं में से 38 युवा रोजगार में हैं, 32 युवा शिक्षा/कौशल प्रशिक्षण में व्यस्त हैं और शेष 30 युवा शिक्षा, रोजगार और कौशल विकास के दायरे से बाहर हैं।

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गरीबी से बढ़ती है युवाओं की बेकारी

यूनाइटेड किंगडम की यूनिवर्सिटी ऑफ लिवरपूल और यूनिवर्सिटी ऑफ मैंचेस्टर द्वारा किए गए संयुक्त अध्ययन के अनुसार, लगातार गरीबी की मार झेल रहे युवाओं में बेकारी की दर सामान्य आबादी की तुलना में तीन-गुणा अधिक रहती है। ऐसे युवाओं में बेकारी से पार पाने की दर भी अपेक्षाकृत कम रहती है।

इस अध्ययन के अनुसार, गरीबी से युवा केवल बेकार ही नहीं होते, बल्कि इनके लिए बेकारी से निकलने के रास्ते भी संकरे हो जाते हैं या फिर इन युवाओं के अच्छे भविष्य की इच्छाशक्ति कम हो जाती है– और यह अर्थव्यवस्था के लिए एक अभिशाप होता है। अध्ययन में देखा गया कि बेहद गरीबी में रहने वाले जो बच्चे 17 वर्ष की उम्र में शिक्षा, रोजगार और प्रशिक्षण से बाहर थे, उनमें से 56 प्रतिशत युवाओं की स्थिति 23 वर्ष की उम्र में भी बिल्कुल वैसे ही बनी रही। दूसरी तरफ सामान्य वर्ग के लिए यह संख्या 33 प्रतिशत ही रही।

केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024-25 में देश में औसत प्रतिव्यक्ति आय लगभग 2 लाख रुपये प्रतिवर्ष है। राज्यों में 60000 से 65000 रुपये की प्रतिव्यक्ति आय के साथ सबसे बुरी स्थिति में बिहार है। इसके बाद के स्थान पर 80000 से 85000 रुपये प्रतिव्यक्ति आय के साथ आदित्यनाथ और मोदी के शब्दों में विकास की नदियां बहाता उत्तर प्रदेश है।

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युवा हिंसक हो रहे हैं

विकसित राष्ट्र और सुपरपावर का दर्जा केवल टेक्नॉलजी और इंफ्रास्ट्रक्चर से ही नहीं मिलता पर इसके लिए एक प्रबुद्ध और शांत समाज, सबको योग्य रोजगार और सत्ता के हस्तक्षेप से मुक्त न्याय व्यवस्था और संवैधानिक संस्थाओं की जरूरत भी होती है। मोदी सरकार ने वर्ष 2014 के बाद से सबसे अधिक हमला इन्हीं क्षेत्रों में किया है। इन्टरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन के आंकड़ों के अनुसार, कुल बेरोजगारों में से पढ़े-लिखे युवा बेरोजगारों की संख्या वर्ष 2000 में 54.2 प्रतिशत थी, पर वर्ष 2022 तक यह संख्या 65.7 प्रतिशत तक पहुंच गई। ये आंकड़े डराने वाले हैं क्योंकि देश की औसत आयु महज 29 वर्ष ही है।

दूसरी तरफ वर्ष 2014 के बाद से वेतन में कोई प्रभावी वृद्धि नहीं हुई है। हमारा देश श्रमिक उत्पादकता के संदर्भ में 133वें स्थान पर है तो दूसरी तरफ यहां के 51 प्रतिशत से अधिक श्रमिकों को हरेक सप्ताह 49 घंटे से अधिक काम करना पड़ता है– इस संदर्भ में भारत का स्थान दूसरा है।

युवाओं के लिए पूरा समाज और देश बदल चुका है। शारीरिक और मानसिक तौर पर युवा कमजोर हो रहे हैं और सत्ता अब उनके मस्तिष्क और सोचने की प्रक्रिया को भी हैक कर रही है। आज के युवा सच नहीं देखते बल्कि आर्टिफ़िशियल इन्टेलिजेंस का मायाजाल देखते हैं और उसी से प्रभावित भी हो रहे हैं। युवा अब तर्कहीन भी हो रहे हैं, इसीलिए हिंसक होने लगे हैं।

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