विचार

आतंकवाद की बदलती परिभाषा: अब सत्ता भी सिंहासन बचाए रखने के लिए उतनी ही बर्बरता से अपने ही जनता की हत्या करती है !

नक्सली प्रभावित क्षेत्रों में खनिजों और प्राकृतिक संसाधनों का भंडार है, इसलिए इन क्षेत्रों में नक्सली खात्मा के नाम पर सत्ता ने खूब हिंसा और खून-खराबा किया है। मारे जाने वालों में सामान्य लोग भी बहुत रहे हैं।

फोटो: सोशल मीडिया
फोटो: सोशल मीडिया 

केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल में ऐलान किया कि देश अब नक्सली आतंक से मुक्त हो चुका है। कुछ वर्ष पहले ऐसा ही ऐलान जम्मू और कश्मीर के लिए भी किया गया था, पर इसके बाद से लगातार आतंकी हमले होते जा रहे हैं। नक्सली प्रभावित क्षेत्रों में खनिजों और प्राकृतिक संसाधनों का भंडार है, इसलिए इन क्षेत्रों में नक्सली खात्मा के नाम पर सत्ता ने खूब हिंसा और खून-खराबा किया है। मारे जाने वालों में सामान्य लोग भी बहुत रहे हैं। अब तो समय ही गृह मंत्री के दावों की हकीकत बताएगा, पर इससे पहले इस पूरी क्षेत्र को पूँजीपतियों के हवाले कर दिया जाएगा।

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अब वैश्विक स्तर पर आतंकवाद की परिभाषा बदल गई है। पहले जिस तरह की हिंसा आतंकवादी संगठन करते थे, अब सत्ता भी सिंहासन बचाए रखने के लिए उतनी ही बर्बरता से अपने ही जनता की हत्या करती है। हमारे देश में भी सत्ता समर्थित तमाम गिरोह एक धर्म के लोगों को छोड़कार किसी की भी हत्या करने के लिए आजाद हैं। अब तो स्थिति यह है कि पुलिस, प्रशासन और न्यायपालिका हत्यारे या आतंकवादी का धर्म देखकर ही उसे “बलात्कारी”, “हत्यारा” या “आतंकवादी” घोषित करती है। यदि आतंकवाद की परिभाषा के अनुसार चलें तो पूरा शासन तंत्र और मेनस्ट्रीम मीडिया ही कटघरे में नजर आएगा। ऑस्ट्रेलिया के इंस्टिट्यूट ऑफ ईकनामिक्स एण्ड पीस द्वारा प्रकाशित ग्लोबल टेररिज़म इंडेक्स 2026 के अनुसार साल-दर-साल राजनीति से प्रभावित आतंकवाद का विस्तार होता जा रहा है। वर्ष 2025 में वर्ष 2024 की तुलना में राजनैतिक तौर पर की गई आतंकवादी गतिविधियों में मरने वालों की संख्या में 20 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। दक्षिणी अमेरिकी देशों में तो ऐसी हत्याओं में 75 प्रतिशत तक बृद्धि हो चुकी है।

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इस इंडेक्स में आतंकवाद से सर्वाधिक प्रभावित देशों की सूची में भारत 13वें स्थान पर है| वर्ष 2025 में भारत में 142 आतंकी हमलों में 100 लोग मारे गए। वैश्विक स्तर पर कुल 2944 आतंकी हमलों में 5582 लोग मारे गए। इस इंडेक्स में पहले स्थान पर पाकिस्तान है, इसके बाद क्रम से बुर्किना फासो, नाइज़र, नाइजीरिया, माली, सीरिया, सोमालिया, डेमोक्रैटिक रीपब्लिक ऑफ कांगो, कोलंबिया और इस्राइल हैं। कुल 64 ऐसे देश हैं जहां पिछले वर्ष एक भी आतंकी हमला नहीं हुआ है – इसमें भूटान, सिंगापुर, साउथ अफ्रीका और श्री लंका शामिल हैं।

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भारत के पड़ोसी देशों में अफगानिस्तान 11वें स्थान पर, म्यांमार 14वें, बांग्लादेश 42वें, चीन 54वें और नेपाल 89वें स्थान पर है। दुनिया के प्रमुख देशों में रूस 17वें स्थान पर है, अमेरिका 28वें, जर्मनी 29वें, ऑस्ट्रेलिया 31वें, फ़्रांस 35वें, यूनाइटेड किंगडम 38वें, कनाडा 53वें, इटली 60वें, ब्राजील 62वें, स्विट्ज़रलैंड 67वें, जापान 75वें, साउथ कोरिया 86वें और मेक्सिको 87वें स्थान पर है। इस इंडेक्स के अनुसार आतंकी हमलों के मामले में अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के 100 किलोमीटर के दायरे का क्षेत्र सबसे खतरनाक होता है। इस दायरे में कुल आतंकी हमलों में से 64 प्रतिशत हमले किए गए।

युवाओं में आतंकवाद लोकप्रिय होता जा रहा है। अधिकतर आतंकी हमलों में युवा ही शामिल रहते हैं| पश्चिमी देशों में युवाओं का अकेलापन और समाज से अलगाव इसका मुख्य कारण है जबकि गरीब देशों में बेरोजगारी और प्राकृतिक संसाधनों का आसमान वितरण युवाओं को आतंकवाद की तरफ धकेल रहा है। अब बहुत बड़े आतंकी हमले, जिसमें 100 या अधिक लोगों की जिंदगी एक साथ खत्म होती है, बहुत कम हो गए हैं। वर्ष 2025 में ऐसे केवल 3 हमले हुए और ये तीनों ही हमले अफ्रीकी देश बुर्किना फासो में दर्ज किए गए।

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आतंकवाद की परिभाषा तेजी से बदल रही है। पहले हरेक हिंसक हमले आतंकवाद के दायरे में आते थे, और इन हमलों के पीछे उग्रवादी संगठन रहते थे। पर अब हिंसा सत्ता, मीडिया और सत्ता के समर्थक करने लगे हैं। पहले आतंकवाद का दौर चंद घंटे में समाप्त हो जाता था, पर जब से सत्ता ने आतंकवाद का जिम्मा उठाया है, तब से ऐसा आतंकवाद हमारे जीवन का और समाज का अभिन्न अंग बन गया है। पारंपरिक आतंकवाद में एक गिरोह के कुछ सदस्य शामिल रहते थे और चंद लोग प्रभावित होते थे, पर अब तो आतंकवाद में सत्ता, पुलिस, प्रशासन, संवैधानिक संस्थाएं और मीडिया सभी शामिल हैं – समाज के एक बड़े तबके को हिंसा का प्रशिक्षण देकर तैयार किया जा रहा है – इनके निशाने पर वे सभी हैं जो सत्ता से सवाल करने की जुर्रत करते हैं।

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आतंकवाद भी अब प्रमुख तौर पर दो बड़े वर्गों में बंट गया है – ऑनलाइन आतंकवाद और शारीरिक आतंकवाद। आश्चर्य यह है कि परंपरागत आतंकवाद अब कम होता जा रहा है, पर सत्ता-समर्थित आतंकवाद का दायरा लगातार फैलता जा रहा है। इसके लिए सत्ता तमाम अपराधियों को नियुक्त करती है और ऑनलाइन आतंक के लिए तो एक अदद आईटी सेल ही है। हरेक सत्ता को अपने कारीबियों का आतंक नजर नहीं आता और यह परंपरा अन्तराष्ट्रिय स्तर पर कायम है।

पारंपरिक आतंकवाद भी सत्ता की नीतियों के कारण ही पनपता है। इसके पनपने का सबसे बड़ा कारण समाज में व्यापक तौर पर आर्थिक तंगी, युवाओं में व्यापक बेरोजगारी और प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार में कमी या अधिकार पूरी तरह से छिन जाना है। यह निष्कर्ष जर्मनी के लेपजीग यूनिवर्सिटी के सामाजशास्त्रियों के नेतृत्व में किए गए एक अन्तराष्ट्रिय अध्ययन का है। अब तक समाजशास्त्रियों का एक बड़ा वर्ग दुनिया में बढ़ते आतंकवाद का कारण धार्मिक उन्माद और राजनीति में कट्टरपंथियों के बढ़ते वर्चस्व को मानता था।

इस अध्ययन के लिए बाल्कन, मध्यपूर्व, अफ्रीका के उत्तरी और साहेल क्षेत्र में स्थित आतंकवाद से जूझ रहे 17 देशों में आतंकवाद के विस्तार के लिए जिम्मेदार स्थानीय और ढांचागत कारणों का व्यापक विश्लेषण किया गया। इन देशों में मोरक्को, अल्जेरिया, लीबिया, ईजीप्ट, माली, जोर्डन, इराक, सीरिया और सऊदी अरब भी शामिल हैं। इस अध्ययन को लाईने रीनेर पब्लिशर्स ने एक संकलित पुस्तक के स्वरूप में वर्ष 2025 में प्रकाशित किया है, पुस्तक का नाम है – रेजिस्टीग रेडिकलाइजेशन: इक्स्प्लोरिंग द नॉनअकरेन्स ऑफ वाइलेन्ट एक्स्ट्रीमिज़्म – और इसके संपादक हैं, मॉरटेन बोयस, गिलाड बेन नून, उलफ एंजेल और कारी ओसलैंड। इस अध्ययन के लिए वर्ष 2020 से 2023 तक के अन्तराष्ट्रिय स्तर पर उपलब्ध आतंकवाद के आंकड़ों के विश्लेषण के साथ ही हरेक देश में आतंकवाद के अध्ययन से जुड़े स्थानीय विशेषज्ञों, धार्मिक समूहों और दूसरे जानकारों की भी मदद ली गई।

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इस अध्ययन के अनुसार स्थानीय सत्ता में पर्याप्त भरोसा, भरोसेमंद सामाजिक सुरक्षा और मजबूत सामाजिक ढांचा आतंकवाद के विस्तार को नियंत्रित करने का सबसे अच्छा माध्यम है। समाज में व्यापक तौर पर सामाजिक-आर्थिक विकास में सुधार लाकर आतंकवाद को रोकना आसान है। सामाजिक असमानता कम करने के लिए, यदि संसाधन नहीं हैं तो अंतराष्ट्रीय मदद से रोजगार के व्यापक अवसर पैदा किए जा सकते हैं। इसके लिए आर्थिक मदद दी जा सकती है, बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं शुरू की जा सकती हैं या फिर विदेशी निवेश को बढ़ाने की पहल की जा सकती है। आर्थिक असमानता कम होने पर और रोजगार के व्यापक अवसर पैदा होने के बाद बड़ी आबादी की सोच सकारात्मक होने लगती है और स्थानीय सत्ता पर भरोसा बढ़ता है।

देश में बेरोजगारी की स्थिति भयावह है, बाजार सामानों से भरा है पर खरीददार नहीं हैं, निर्यात पिछले तीन वर्षों से लगभग एक स्तर पर है, छोटे उद्योग तेजी से बंद हो रहे है और सत्ता विकसित भारत के सपने बेच रही है। भारत में आर्थिक असमानता का स्तर दुनिया में सबसे अधिक है और यह लगातार बढ़ता जा रहा है। आर्थिक असमानता की ऐसी भयावह स्थिति 1947 के पहले ब्रिटिश राज में भी नहीं रही, पर मोदी सरकार की नीतियों में इसे कम करने की योजनाएं नजर नहीं आतीं। मानव विकास इंडेक्स में कुल 191 देशों में भारत का स्थान 122वां है।ं

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इस अध्ययन के अनुसार स्थानीय सत्ता में पर्याप्त भरोसा, भरोसेमंद सामाजिक सुरक्षा और मजबूत सामाजिक ढांचा आतंकवाद के विस्तार को नियंत्रित करने का सबसे अच्छा माध्यम है। समाज में व्यापक तौर पर सामाजिक-आर्थिक विकास में सुधार लाकर आतंकवाद को रोकना आसान है। सामाजिक असमानता कम करने के लिए, यदि संसाधन नहीं हैं तो अंतराष्ट्रीय मदद से रोजगार के व्यापक अवसर पैदा किए जा सकते हैं। इसके लिए आर्थिक मदद दी जा सकती है, बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं शुरू की जा सकती हैं या फिर विदेशी निवेश को बढ़ाने की पहल की जा सकती है। आर्थिक असमानता कम होने पर और रोजगार के व्यापक अवसर पैदा होने के बाद बड़ी आबादी की सोच सकारात्मक होने लगती है और स्थानीय सत्ता पर भरोसा बढ़ता है।

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देश में बेरोजगारी की स्थिति भयावह है, बाजार सामानों से भरा है पर खरीददार नहीं हैं, निर्यात पिछले तीन वर्षों से लगभग एक स्तर पर है, छोटे उद्योग तेजी से बंद हो रहे है और सत्ता विकसित भारत के सपने बेच रही है। भारत में आर्थिक असमानता का स्तर दुनिया में सबसे अधिक है और यह लगातार बढ़ता जा रहा है। आर्थिक असमानता की ऐसी भयावह स्थिति 1947 के पहले ब्रिटिश राज में भी नहीं रही, पर मोदी सरकार की नीतियों में इसे कम करने की योजनाएं नजर नहीं आतीं। मानव विकास इंडेक्स में कुल 191 देशों में भारत का स्थान 122वां है।

विकसित राष्ट्र और सुपरपावर का दर्जा केवल टेक्नॉलजी और इंफ्रास्ट्रक्चर से ही नहीं मिलता पर इसके लिए एक प्रबुद्ध और शांत समाज, सबको योग्य रोजगार और सत्ता के हस्तक्षेप से मुक्त न्याय व्यवस्था और संवैधानिक संस्थाओं की जरूरत भी होती है। मोदी सरकार ने वर्ष 2014 के बाद से सबसे अधिक हमला इन्हीं क्षेत्रों में किया है। देश की गरीबी और साथ ही भुखमरी का मंजर तो ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भी नजर आता है।

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आतंकवाद पर लगाम लगाने के लिए और नए आतंकवादियों को पनपने से रोकने के लिए शिक्षकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, सामाजिक विकास से जुड़े गैर-सरकारी संगठनों के सदस्यों, स्थानीय सुरक्षा बलों और धर्म-गुरुओं को विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता है, जिससे आतंकवाद के खतरे को समय रहते पहचाना जा सके और कार्यवाही की जा सके। समस्या यह है कि देश में आतंकवाद को रोकने वाले ही अब आतंकवाद को फैला रहे हैं, बढ़ावा दे रहे हैं।

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