विचार

शिक्षा मंत्री का इस्तीफा उस बड़ी जीत का मात्र छोटा सा हिस्सा, जिसे युवा प्रदर्शनकारियों ने हासिल किया

नीट घोटाले से भड़का छात्र आंदोलन सत्ता की निरंकुशता को चुनौती तो दे रहा है, लेकिन वास्तविक बदलाव मुमकिन नहीं जब तक सरकार अपनी नीतिगत विफलता को न माने। (यह लेख धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और छात्रों की सारी मांगे पूरी होने के पहले लिखा गया है)

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Getty Images SAJJAD HUSSAIN

संपादक ने मुझसे मौजूदा विरोध प्रदर्शनों के संदर्भ में तीन बातों पर विचार करने को कहा - क्या इस आंदोलन ने मुझमें उम्मीद जगाई? क्या मुझे डर है कि ये प्रदर्शन समय के साथ ठंडे पड़ जाएंगे? और मैं इस ऐतिहासिक मोड़ से क्या परिणाम निकलने की उम्मीद करता हूं?

पहले सवाल के जवाब में मेरा उत्तर ‘हां’ है। सभी प्रकार के विरोध और असहमति ऐक्टिविस्टों में उम्मीद जगाते हैं, क्योंकि इनकी बुनियादी धारणा ही यह है कि राज्य व्यवस्था अपूर्ण है और उसमें सुधार केवल जवाबदेही की मांग के जरिये हो सकता है। भ्रष्टाचार अपने व्यापक अर्थ में राज्य के तंत्र को खोखला करता है, और ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मौजूदा बीजेपी सरकार के रूप में यह राज्य व्यवस्था लोक सेवक के बजाय मालिक की तरह सलूक करती दिखती है। 

यह विशेष विरोध प्रदर्शन इसलिए प्रेरणादायी है क्योंकि युवाओं ने बहुत कम संसाधनों के साथ शुरुआत की और इसे एक विशाल आकार दे दिया। शुरू में उनका माखौल उड़ाया गया, लेकिन उनकी प्रतिबद्धता, साहस और दृढ़ संकल्प का ही नतीजा है कि आज उनका मुद्दा हमारे इस विशाल देश की सबसे बड़ी खबर बन चुका है।

दूसरे सवाल पर मेरा मानना है कि यह आंदोलन सफल होगा और शिक्षा मंत्री का जाना तय है। यह विरोध प्रदर्शनों के खत्म होने के फौरन बाद हो सकता है, या फिर उन्हें किसी ओर विभाग में भेजा जा सकता है या फिर उन्हें किसी तरह के फेरबदल की आड़ में चलता किया जा सकता है। जो भी हो, नीट परीक्षा में गड़बड़ी की बात स्वीकार करने के बाद भी मंत्री को पद पर बनाए रखने की जिद पूरी तरह से तर्कहीन है। छात्र आंदोलन ने मंत्री का पद पर बने रहना असंभव बना दिया है और सरकार भी यह बात भली-भांति जानती है।

सरकार की पूरी प्रतिक्रिया- शुरू में आंदोलन की अनदेखी करने से लेकर उसके नेताओं का अपमान करने, फिर पुलिसिया दमन और आखिर में युवाओं को बदनाम करने तक- सिरे से विफल रही है, क्योंकि इसका सफल होना संभव ही नहीं था।

मुझे यह भी लगता है कि शिक्षा मंत्री का इस्तीफा उस बड़ी जीत का छोटा सा हिस्सा मात्र होगा, जिसे युवा प्रदर्शनकारियों ने हासिल किया है। एक वास्तविक लोकतंत्र वही है जहां जन-दबाव सरकार को अपनी नीतियां और फैसले बदलने पर मजबूर कर दे। देश के छात्र आज उसी रास्ते पर चल रहे हैं, जिस पर किसान उनसे पहले चल चुके हैं।

तीसरे सवाल- कि मैं इस मोड़ से किस नतीजे की उम्मीद करता हूं- इसके दो पहलू हैं। निसंदेह, मैं चाहता हूं कि छात्रों को इंसाफ मिले और सरकार अपनी जवाबदेही स्वीकार करे। लेकिन मैं यह भी चाहता हूं कि शिक्षा क्षेत्र का यह संकट हम सब को, और खास तौर पर सरकार को, इस अहम सवाल पर ध्यान केन्द्रित करने में मददगार बने कि आगे की राह क्या होगी।

यह शीशे की तरह साफ है कि आने वाले समय में देश को सबसे बड़ी दो समस्याओं का सामना करना पड़ेगा- ये हैं रोजगार और गरीबी। कृषि श्रम को मैन्युफैक्चरिंग और फिर सेवा क्षेत्र में बदलने का पारंपरिक आर्थिक मॉडल अब हमेशा के लिए बंद हो चुका है।

यहां तक कि चीन ने भी, जिसने किसी भी अन्य देश की तुलना में इस रास्ते पर सबसे अधिक कामयाबी हासिल की, आज ऐसे लोगों की करोड़ों की आबादी से जूझ रहा है जिनके पास या तो काम है ही नहीं या फिर अपर्याप्त काम है। भारत के लिए इस संकट से निपटने की किसी भी रणनीति की शुरुआत इस ईमानदार स्वीकारोक्ति से होनी चाहिए कि हम कहां खड़े हैं और हमारी वास्तविक समस्याएं क्या हैं।

यह एक बेहद सामान्य बात लग सकती है, लेकिन इसे मानना, कहना बेहद जरूरी है। क्योंकि हम एक ऐसी सरकार और ऐसे प्रधानमंत्री को देख रहे हैं जो स्वीकार ही नहीं करते कि कोई समस्या मौजूद है। ‘सब चंगा सी’ का दिखावा किया जाता है।

जाहिर तौर पर यह सरासर झूठ है और अब यह बात छिपी भी नहीं रही। छात्रों का आक्रोश और निराशा न केवल उस भ्रष्टाचार और अक्षमता से उपजी है जिसके कारण नीट में गड़बड़ी हुई, बल्कि इस डर से भी पैदा हुई है कि उनका भविष्य अंधकारमय है। छात्रों ने अपनी भावनाओं को पूरी स्पष्टता के साथ व्यक्त कर दिया है। अब यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह उनकी मांगों को स्वीकार करे और एक ऐसी प्रक्रिया शुरू करे जो यह सुनिश्चित करे कि हम दोबारा कभी ऐसे मोड़ पर न खड़े हों।

असली चिंता यह है कि सरकार शायद फिर भी कोई ठोस कदम न उठाए। भले ही वह इस दौर में हार जाए, वैसे तो मेरे मानना है कि उसकी हार हो चुकी है, कहीं वह इसे किसी व्यापक समस्या से असंबद्ध एक पृथक घटना मानकर दरकिनार न कर दे। शायद उसे अपनी ही कही उन झूठी बातों पर भरोसा है कि इसके पीछे बाहरी ताकतें और एजेंडे काम कर रहे हैं। उसकी सोच चाहे जो भी हो, पिछले एक दशक से अधिक समय ने दिखाया है कि यह सरकार निराधार आश्वस्तियों और अहंकार के इर्द-गिर्द बनी है। यही रवैया अनिवार्य रूप से हमें बार-बार उसी मुहाने पर लाकर खड़ा कर देगा। हमारे किसान इस कड़वी सच्चाई को जानते थे और उन्होंने महसूस किया कि सड़कों पर उतरना ही उनका एकमात्र विकल्प था; हमारे छात्र आज ठीक वही महसूस कर रहे हैं।

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