
अनेक देशवासी (जिनमें बहुत से अपने भविष्य के लिए संघर्षरत छात्र और उनके अभिभावक हैं) समझ नहीं पा रहे कि नीट-यूजी, सीबीएसई और सीयूईटी जैसी महत्वपूर्ण परीक्षाओं में बार-बार पेपर लीक, आनस्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) और मूल्यांकन प्रणाली में अन्यायकारी गड़बड़ियों, अनियमितताओं और भ्रष्टाचार तथा नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) की विडंबनाओं से भरी कार्यप्रणाली पर अनेक सवाल उठने के बावजूद इन सबके लिए उत्तरदायी केन्द्रीय शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान पद से इस्तीफा क्यों नहीं दे रहे? वह नहीं दे रहे तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी खुद ही उनसे इस्तीफा क्यों नहीं मांग ले रहे या राष्ट्रपति से उनकी बर्खास्तगी की सिफारिश क्यों नहीं कर दे रहे?
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इसका का उत्तर आसान होता, अगर यह भारतीय राजनीति की सत्ता लोलुपता की सामान्य प्रवृत्ति से जुड़ा होता। दुर्भाग्य से इसके उत्तर की जड़ें इस तथ्य से होकर भी गुजरती हैं कि न प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, न उनके (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) परिवार, न सरकार या मंत्रियों को देश की संवैधानिक नैतिकता का तनिक भी अभ्यास है और न ही उसके प्रति किंचित भी सम्मान बचा है।
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याद कीजिए, मोदी की पहली सरकार के महज एक साल बाद 24 जून 2015 को तत्कालीन गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने यह कहकर कि 'इस सरकार में मंत्रियों के त्यागपत्र नहीं होते भैया, यह यूपीए की नहीं, एनडीए की सरकार है', 'घोषणा' कर दी थी कि वह सरकार स्वयं को सारी संवैधानिक नैतिकताओं से परे कर लेने के फेर में है। प्रधान का प्रकरण सिर्फ यह बताता है कि इस सरकार ने अपने तीसरे कार्यकाल में 'परे कर लेने' के इस लक्ष्य को सफलतापूर्वक प्राप्त कर लिया है।
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4 नवंबर 1948 को संविधान सभा में संविधान का मसौदा पेश करते हुए बाबासाहब डॉ. भीमराव आम्बेडकर ने जो महत्वपूर्ण बातें कही थीं, उनके आईने में इसे समझना कठिन नहीं है कि प्रधान सारी नैतिकताओं को नकार कर इस तरह अपनी कुर्सी से क्यों चिपके हुए हैं। बाबासाहब ने कहा था कि संवैधानिक नैतिकता स्वाभाविक या जन्मजात नहीं होती और उसे अभ्यास द्वारा पाना और अपनाना पड़ता है। 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा में अपने अंतिम भाषण में उन्होंने चेतावनी दी थी कि सत्ता में बैठे लोग चाहें तो संविधान के लिखित शब्दों (यानी स्वरूप) को बिना बदले, केवल प्रशासन चलाने के तरीके बदल करके संविधान की मूल भावना को नष्ट कर सकते हैं। इसी सिलसिले में उन्होंने यह भी कहा था कि संविधान अच्छे हाथों में रहा तो अच्छा फल देगा और बुरे हाथों में पड़ गया तो बुरा।
मोदी के प्रधानमंत्रित्व के बारह साल बाबा साहब की इसी 'बुरे हाथों' वाली बात को सही सिद्ध करते रहे हैं। करें भी क्यों नहीं, न उनके पितृ संगठन में इस संविधान के स्वीकार और सम्मान की कोई ईमानदार परंपरा रही है, न पार्टी में।
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हमारे लोकतांत्रिक इतिहास में नैतिकता के पालन के एक नहीं, अनेक उदाहरण हैं। नवंबर 1956 में तमिलनाडु के अरियालूर में भीषण ट्रेन हादसे में एक सौ चालीस से ज्यादा लोगों की जानें चली जाने के बाद तत्कालीन रेल मंत्री लालबहादुर शास्त्री ने अपना इस्तीफा सौंप दिया था। उनसे पहले वी.के. कृष्ण मेनन ने युद्ध में चीन के हाथों देश की पराजय के बाद 31 अक्तूबर 1962 को रक्षामंत्री के पद से त्यागपत्र दे दिया था।
ऐसे में न सिर्फ विपक्षी दलों बल्कि पीड़ित छात्रों और अभिभावकों द्वारा भी बार-बार धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा मांगे जाने पर प्रधान के बचाव में उतर रहे सारे स्वनामधन्यों से यह जरूर पूछना चाहिए कि यदि वे मानते हैं कि कोई मंत्री अपने विभाग में हुई गड़बडि़यों के लिए जिम्मेदार नहीं होता, तो बीजेपी के पूर्व अवतार भारतीय जनसंघ और उसके पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 1962 में जोर-शोर से रक्षामंत्री कृष्ण मेनन का इस्तीफा क्यों मांगा था? क्यों 1996 में बीजेपी ने तत्कालीन संचार मंत्री सुखराम के इस्तीफे की मांग को लेकर संसद को ठप करके उसे हफ्तों तक नहीं चलने दिया था?
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संविधान के जानकार और वरिष्ठ राजनीतिविज्ञानी डॉ. रामबहादुर वर्मा कहते हैं कि संविधान निर्माता सोच भी नहीं सकते थे कि एक दिन ऐसे लोग या दल देश की सत्ता में आ जाएंगे जो ऊपर से तो संविधान का खोल ओढ़े हुए होंगे, भीतर से उस पर एक के बाद एक प्रहार करते हुए लगातार उसे क्षतिग्रस्त करने में लगे रहेंगे।
डॉ. वर्मा बताते हैं कि हमारे जैसे देश में सरकार और उसके मंत्रियों के दायित्व निर्वहन की लगातार छानबीन को आवश्यक मानकर ही संविधान निर्माताओं ने राष्ट्रपति शासन प्रणाली के बजाय संसदीय शासन प्रणाली को स्वीकार किया था, जिसमें दायित्व को स्थायित्व से अधिक महत्वपूर्ण समझा जाता है। इसमें प्रधानमंत्री और मंत्री संसद के सदस्य तो होते ही हैं, उसके प्रति उत्तरदायी भी होते हैं।
उनका अपने पद पर रहना और जाना भी संसद के विवेक पर ही निर्भर है और वह किसी भी समय अविश्वास प्रस्ताव द्वारा उन्हें तो क्या, उनकी समूची सरकार को ही पद से हटा सकती है। अविश्वास प्रस्ताव के अलावा भी प्रश्न और पूरक प्रश्न, काम रोको प्रस्ताव, अल्पकालीन प्रस्ताव और आधे घंटे की बहस आदि तमाम ऐसे तरीके हैं जिनके द्वारा संसद मंत्रिमंडल पर अपना नियंत्रण रखती है तथा उसे उसके कार्यों के लिए जवाबदेह ठहराती है।
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इस जवाबदेही में नैतिक जवाबदेही भी अनिवार्य रूप से शामिल है और उससे कतई इनकार नहीं किया जा सकता। इसमें लोकलाज को भी शामिल कर लें तो निर्लज्ज होकर लोकमत के विरुद्ध किसी सरकार या मंत्री का उनकी छाती पर सवार रहना भी नैतिक जवाबदेही की घोर अवज्ञा है, जिसको हर हाल में निंदनीय ही माना जाता है, कभी भी काबिल-ए-तारीफ नहीं।
निस्संदेह, मंत्रिमंडल का सामूहिक उत्तरदायित्व संसदीय शासन प्रणाली का एक प्रमुख सिद्धान्त है। लेकिन वह सरकार के मंत्रियों को समूची सरकार के पतन तक अपने पद पर बने रहने का संरक्षण नहीं देता। उसका अर्थ सिर्फ यह है कि सारे मंत्री प्रधानमंत्री के नेतृत्व में एकजुट होकर कार्य और संसद का सामना करें। साथ ही वे सभी सरकार की समूची नीति के लिए जिम्मेदार हों।
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लेकिन सामूहिक उत्तरदायित्व की आड़ में मंत्री के प्रभाराधीन विभाग/मंत्रालय के कामकाज के समुचित संपादन से जुड़े मंत्री के व्यक्तिगत उत्तरदायित्व को नकारा नहीं जा सकता। अपने विभाग/ मंत्रालय के कार्यों के लिए संसद के प्रति मंत्री का उत्तरदायित्व भी संसदीय प्रणाली का अपरिहार्य अंग है। साथ ही, किसी मंत्री की संवैधानिक नैतिकता का अर्थ संविधान के लिखित कानूनों का पालन करना भर ही नहीं, बल्कि संविधान की अंतर्निहित भावना (जैसे न्याय, स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और जन कल्याण) के प्रति अटूट निष्ठा बनाए रखना भी है। संवैधानिक ढांचे में एक मंत्री के लिए इसका मुख्य आधार संसद, साथ ही जनता, के प्रति अपनी जवाबदेही सुनिश्चित करना ही है। इसके बगैर जिसे हम कानून का शासन कहते हैं, वह संभव ही नहीं है, न ही संविधान की सर्वोपरिता ही संभव है।
ऐसा नहीं है कि नरेन्द्र मोदी की सरकार, पार्टी और संघ परिवार इस बात को समझते नहीं हैं। खूब समझते हैं, लेकिन इससे ज्यादा वे इस बात को समझते हैं कि इस नैतिकता का पालन करते रहकर वे संविधान के उद्देश्यों और भावनाओं के विरुद्ध जाकर अपने स्वार्थ पूरे नहीं कर सकते। इसलिए जब भी वे अपनी इस तरह की स्वार्थ साधना में रत होते हैं, भूल जाते हैं कि संवैधानिक नैतिकता विधि द्वारा स्थापित देश के संविधान की आत्मा और मूल्यों से जुड़ी हुई है।
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