विचार

सेब बागवानों की कमर तोड़ने में आमादा है सरकार! GST की मार झेल रहे सेब उत्पादक सरकार के इस 'खेल' से नाराज

हिमाचल प्रदेश में हालात फिलहाल इस तरह के हैं कि सेब बागवानों को समझ में नहीं आ रहा है कि करें तो क्या करें। सरकार विभिन्न कृषि इनपुट पर मिलने वाली सब्सिडी पहले ही लगभग खत्म कर चुकी है। इनमें कार्टन के साथ-साथ बीज, खाद, कीटनाशक और फफूंदनाशक आदि शामिल हैं।

फोटो: सोशल मीडिया
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हिमाचल प्रदेश की सेब आधारित पांच हजार करोड़ की अर्थव्यवस्था को सरकार खत्म करने पर आमादा है। सरकार के गलत फैसलों ने राज्य की तकरीबन 70 लाख की आबादी में 12 लाख से अधिक रोजगार देने वाली सेब आर्थिकी की कमर तोड़ दी है। सेब बागवानों की समस्याओं की सूची लंबी है। लेकिन हालिया बड़ा मसला जीएसटी का है। सरकार ने सेब कार्टन पर 12 प्रतिशत से बढ़ाकर 18 प्रतिशत जीएसटी लगा दी है, जबकि सेब के समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी महज एक रुपये की है। यह बात किसी के गले नहीं उतर रही है। लिहाजा, सेब बागवान बार-बार सड़क पर उतर रहे हैं।

हिमाचल प्रदेश में हालात फिलहाल इस तरह के हैं कि सेब बागवानों को समझ में नहीं आ रहा है कि करें तो क्या करें। सरकार विभिन्न कृषि इनपुट पर मिलने वाली सब्सिडी पहले ही लगभग खत्म कर चुकी है। इनमें कार्टन के साथ-साथ बीज, खाद, कीटनाशक और फफूंदनाशक आदि शामिल हैं। इससे सेब तैयार करने पर आने वाली लागत लगभग दोगुनी हो गई है। बागवानी निरंतर घाटे का सौदा साबित हो रही है। कार्टन की कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। सौ ट्रे का जो बंडल बीते साल 450 से 550 रुपये में मिलता था, इस बार उसके लिए 700 से 800 रुपये प्रति बंडल देने पड़ रहे हैं। यानी 250 रुपये प्रति बंडल तक कीमतें बढ़ी हैं। बीते साल जो पेटी 53 से 68 रुपये में मिल रही थी, इस बार उसके लिए 60 से 80 रुपये देने पड़ रहे हैं। मतलब पेटी के दाम भी 12 रुपये तक बढ़ गए हैं। प्रति पेटी 6 से 7 ट्रे लगती हैं। मतलब इस बार 48 से 56 रुपये प्रति पेटी और 80 रुपये की पेटी लग रही है।

कार्टन, तुड़ान, ग्रेडिंग, पैकिंग, भाड़ा आदि सब मिलाकर 20 से 25 किलो की पेटी को मंडी तक पहुंचाने में 300 से 400 रुपये तक की लागत आ रही है। मुश्किलों से घिरे सेब बागवानों के जले पर नमक छिड़कते हुए सरकार ने पिछली कैबिनेट बैठक में सेब कार्टन पर जीएसटी को 12 फीसदी से बढ़ाकर 18 कर दिया। इससे पहले सेब पर जीएसटी पांच प्रतिशत ही लगती थी। जब बागवान इसके खिलाफ सड़क पर उतरे तो सरकार ने ऐलान कर दिया कि 18 फीसदी में से 6 फीसदी जीएसटी सरकार वहन करेगी। लेकिन इस पर भी सरकार ने खेल कर कर दिया। सरकार भले 6 फीसदी जीएसटी माफ कर दिया लेकिन यह छूट सिर्फ एचपीएमसी या हिमफैड के स्टोर से कार्टन खरीदने पर ही मिलेगी।

वास्तविकता यह है कि प्रदेश में 90 फीसदी से ज्यादा बागवान ओपन मार्केट से कार्टन खरीदते हैं। इसके पीछे वजह यह है कि एचपीएमसी का कार्टन ओपन मार्केट से महंगा होता है। बागवान सरकार के इस खेल से और नाराज हैं। बागवानों का कहना है कि वह तो सेब कार्टन पर जीएसटी को 18 प्रतिशत से घटाकर शून्य करने की मांग कर रहे हैं या फिर इसे सिर्फ दो प्रतिशत रखा जाए। वह कृषि इनपुट पर सब्सिडी बहाल करने की मांग कर रहे हैं। विदेशी सेब से हिमाचल के सेब को बचाने के लिए वह सेब आयात शुल्क को सौ फीसदी करने की मांग कर रहे हैं। साथ ही कह रहे हैं कि जम्मू-कश्मीर की तर्ज पर हिमाचल में भी नैफेड के माध्यम से तीन ग्रेड का सेब 24, 44 और 64 रुपये के हिसाब से खरीदने की व्यवस्था की जाए। वहीं सरकार है कि उस पर टैक्स की दरें बढ़ाकर कमर तोड़ने पर आमादा है। बीते दो साल में सेब की पैकिंग सामग्री में अप्रत्याशित 40 से 50 प्रतिशत की वृद्धि की गई है।

सरकार सेब आर्थिकी को बचाने के लिए कितनी गंभीर है, यह इससे जाहिर होता है कि हर वर्ष सेब की पैकेजिंग सामग्री के रेट सेब सीजन से तकरीबन एक महीने पहले तय हो जाते हैं। इस बार यह भी काफी विलंब से हुआ। यह इसके बावजूद हुआ कि इस बार सेब का सीजन 10-12 दिन पहले है। यह रेट भी तब तय किए गए जब किसान इसके विरोध में आ गए। बीते साल एचपीएमसी ने 21 जून को ही सेब की पैकेजिंग सामग्री के रेट तय कर दिए थे। सरकार की उपेक्षा के चलते प्रदेश में इस बार सेब की बंपर फसल के बावजूद किसान संकट में हैं। हिमाचल में तकरीबन ढाई लाख हेक्टेयर में बागवानी होती है जिसमें से 80 फीसदी सेब शिमला जिले में होता है। इसके अलावा, कुल्लू और चंबा में बड़े पैमाने पर लोग इस पर निर्भर हैं। राज्य में सालाना तीन से चार करोड़ पेटी सेब का उत्पादन होता है।

हिमाचल फल-सब्जी एसोसिएशन के अध्यक्ष हरीश चौहान का कहना है कि पिछली जीएसटी काउंसिल में सेब कार्टन पर जीएसटी 12 से 18 फीसदी कर दिया गया। अब हम कह रहे हैं कि ठीक है कि इसमें कमी तो अगली जीएसटी काउंसिल की बैठक ही होगी लेकिन सरकार तो हमें राहत दे सकती है। राहत देना तो सरकार के हाथ में है। हिमाचल की अर्थव्यवस्था काफी सेब बागवानी पर निर्भर है। हमारी मांग है कि पैकेजिंग मैटीरियल पर टैक्स कर दिया जाए। चौहान का कहना है कि कंपनियां तो अपने टैक्स की रिकवरी कई तरह से कर लेती हैं लेकिन कृषि में हमारे पास ऐसा कोई रास्ता नहीं होता। इस तरह सरकार एक के बाद एक टैक्स लगाएगी, तो बागवानी दम तोड़ देगी। सरकार जिस तरह टैक्स लगा रही है उससे तो यह लगता है कि एक दिन ऐसा आएगा कि ये सांस लेने में भी टैक्स लगा देंगे। हमने विदेशी सेब से बचाने के लिए सौ फीसदी आयात शुल्क लगाने की मांग की थी लेकिन उस पर भी कुछ नहीं हुआ। बजट से पहले की बैठकों में केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन से बातचीत में हमने उनके सामने भी यह मांग उठाई थी लेकिन नतीजा जीरो है। पिछले वर्ष ईरान के सेब ने ही हमें 500 करोड़ का नुकसान पहुंचाया है। यदि सरकार नहीं मानती है, तो पांच अगस्त से हम बड़ा आंदोलन करने को मजबूर होंगे।

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