विचार

सब पर बरपेगा ‘डीलिस्ट’ का कहर: असल में यह ‘डीरूट’ करने की साज़िश है

जेन ज़ी के सफल आंदोलन के बाद युवाओं को बरगलाने, बांटने के लिए भी आरक्षण विरोध की सुरसुरी छोड़ी गई है। डिलिस्टिंग माने कतिपय समूहों खासकर आदिवासी समुदाय को अनुसूची से बाहर किया जाना।

डिलिस्टिंग का मुद्दा जोरों से उछाला जा रहा है
डिलिस्टिंग का मुद्दा जोरों से उछाला जा रहा है 

डिलिस्टिंग का मुद्दा जोरों से उछाला जा रहा है। ज़ाहिर है कि यह राज्य प्रायोजित प्रतिगामी एजेंडा है। आखिर डिलिस्टिंग का संदर्भ क्या है? उसका परिप्रेक्ष्य जानना जरूरी होगा। 1935 के गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट के तहत अनुसूचित जाति-जनजाति संज्ञा का इस्तेमाल होने लगा। हालांकि ब्रिटिश हुकूमत “डिप्रेस्ड क्लासेस”की संज्ञा का उपयोग करती थी। मगर उसी सूची के आधार पर प्रांतीय चुनावों में आरक्षण का प्रावधान किया गया था।

आज़ादी के बाद भी संविधान ने सूची को बरकरार रखा। विभिन्न जाति और जनजातियों को सूचीबद्ध किया, जिन्हें ऐतिहासिक अन्याय, छुआछूत, भेदभाव का सामना करना पड़ा। यही सूची राजनीतिक, शैक्षिक और सरकारी नौकरी में आरक्षण का आधार बनी।

आदिवासी समुदाय को इसी सूची की आड़ लेकर बांटने का विभत्स प्रयास जारी है। ऐसा ही दलित समाज के साथ भी होना तय है। शायद पिछड़े वर्ग को भी बक्शा नहीं जाएगा। सरकार ने विपक्ष के दबाव में आकर जाति जनगणना की घोषणा तो कर दी, पर उसका इस्तेमाल अपनी सांप्रदायिक राजनीति के लिए करने से वे बाज नहीं आएंगे। आरक्षण का खुला विरोध उनके संगठनों द्वारा कई बार किया जा चुका है। विशेषकर शतक पूर्ण कर चुकी उनकी वैचारिक मातृसंस्था के सरसंघचालक ने इसकी पैरवी की है।

हाल के जेन ज़ी के सफल आंदोलन के बाद युवाओं को बरगलाने, बांटने के लिए भी आरक्षण विरोध की सुरसुरी छोड़ी गई है। तब डिलिस्टिंग को समझना बेहद जरूरी जान पड़ता है। डिलिस्टिंग माने कतिपय समूहों को अनुसूची से बाहर किया जाना। खासकर आदिवासी समुदाय को लक्ष्य किया जा रहा है। यह डिलिस्टिंग मज़हबी आधार पर क्यों न किया जाए? ऐसी चर्चा तमाम प्रचार माध्यमों के ज़रिये फैलाई जा रही है। यानी जो आदिवासी एक बार ईसाई धर्म कुबूल कर लें, उन्हें डिलिस्ट करने का प्रस्ताव रखा जा रहा है। तर्क यह है कि चूंकि वे अब किसी संगठित धार्मिक आस्था के अधीन हो गए हैं, तो अब उन्हें आदिवासी क्यों कर भला माना जाए। साफ तौर पर यह समुदाय को बांटने की कोशिश है। समुदाय के प्रभुत्वशाली वर्ग को यह जंचाया गया है कि ईसाई आदिवासी तो दोहरा लाभ लेते हैं। सो, उन्हें कम-से-कम एक से तो मुक्त करना ही चाहिए।

आखिर यह दोहरा लाभ क्या है? पूछने पर कोई खास तर्क संगत जवाब किसी के पास नहीं। वर्णाधारित व्यवस्था तो दलित को अवर्ण और आदिवासी समूह को वनवासी कहती रही है। मनुवादी समाज व्यवस्था से प्रभावित राजनीतिक दल आज भी वनवासी शब्द का उपयोग करते हैं। तो उनकी दृष्टि में दोहरे लाभ का मतलब क्या है? जिस समुदाय को वे वनवासी या गिरिजन कह कर तिरस्कृत करते थे। उनके ईसाई हो जाने से वे वर्णाधीन संज्ञा से छूट गए! अब उनको वर्णाधीन व्यवस्था की छतरी से बहिष्कृत होने की त्रासदी से छुटकारा मिलेगा, तो क्या इसे लाभ गिना जा रहा है।

धर्म के आधार पर कोई आरक्षण तो मिलता नहीं। फिर भारत भले विश्वगुरु हो गया हो, पर जाति के बंधन तो मरने के बाद भी पीछा नहीं छोड़ते। धर्म बदले जाने पर भी जाति कहां छूटती है? रोटी बेटी के संबंध तो अब भी वैसे ही बने रहते हैं। यह जरूर कुप्रचार किया जा रहा है कि ईसाई होने से बाहरी मुल्क फंडिंग करते हैं, जो अपने आप में हास्यास्पद है। यह असल में आदिवासी को पहले पहल बसने वाले मानव समूह न मानने देने की कवायद भी है, ताकि वे मात्र वनवासी कहलाएं जो किसी भी संगठित धर्म को अंगीकार कर सकते हैं। उनकी अपनी कुछ खास विरासत नहीं।

यह कहा जाता है कि जबरदस्ती किया गया धर्मांतरण रोकने का यह सबसे अच्छा तरीका है। पर उससे ज्यादा चिंता तो मनमर्ज़ी से किए जाते धर्मांतरण से सत्तासीनों को हो रही है। वह क्या इससे रुक जाएगा? उन्हें सोचना होगा कि वह कैसे रुक सकता है। क्या वह आदिवासियत को स्वीकार करने से रुकेगा?

आदिवासियत तो मज़हब से पहले धरती में पनप चुका। यह कह सकते हैं कि समस्त आध्यात्मिक विचार की जननी आदिवासियत है। वह तो सभी संगठित धार्मिक मान्यताओं के पनपने से बहुत पहले स्थापित हो चुकी। यह आदिवासियत महज़ सांप्रदायिक पहचान नहीं है। वह एक जीवन फ़लसफ़ा है, भाषा है, सामाजिक व्यवस्था है। उनके पास धरती मानव व्युत्पत्ति के अपने मिथक हैं, किस्से कहानी, गीत, नृत्य, वाद्य हैं। वह दुनिया की सबसे दीर्घकालिक जीवन व्यवस्था है, जिसकी उम्र करीबन डेढ़ लाख साल से भी ऊपर है। माने सेपियन्स की पूरी कालावधि। कृषि दस हज़ार साल पुरानी है। औद्योगिकरण चंद सौ साल और आधुनिक तकनीक सदी भर पहले की ही तो है।

आदिवासियत की भी केवल एक कसौटी कैसे हो सकती है, जबकि विभिन्न भाषाई समूह की अपनी एक तहज़ीबी पहचान होती है। उनकी आस्था भिन्न-भिन्न होती है। बदलते युग में सबकुछ थोड़ा-थोड़ा बदलता जाता है। भाषा, सामाजिक ढांचा, जीवन शैली बदलती है। तो क्या इस वजह से कोई समुदाय डिलिस्ट हो सकता है? फिर भारत में एक अकाट्य सत्य यह है कि किसी को भी वर्णाधारित जाति व्यवस्था में जात बदलने का हक़ नहीं है। समाज का दृष्टिकोण जड़वत है। वह तो जन्मजात पहचान को ही स्वीकृत करता है। चाहे किसी समूह या व्यक्ति ने पुश्तैनी पेशे को छोड़ ही क्यों न दिया हो? दलित-आदिवासी शिक्षक, प्राध्यापक पंडित आचार्य नहीं कहलाते। उनकी “कोटा”कहकर खिल्ली उड़ाई जाती है। तो ऐसे में धर्म बदलने पर भी वे सामाजिक प्रभुत्वता के चलते समतुल्य सामाजिक आर्थिक प्रतिष्ठा कहां पाते हैं?

फिर आदिवासियत अपने आप में एक संगठित जीवन दर्शन है। यदि इसको सत्ता स्वीकार करती है, तो फिर जिन राज्यों में उनके दल की सरकार है, वहां किसी सरकारी आवेदन, प्रपत्र के मज़हब को दर्ज करने के कॉलम में उसका विकल्प क्यों नहीं है। क्यों आदिवासी आवेदनकर्ता अपने को गैर अल्पसंख्यक होने पर हिन्दू कहने को विवश है। वह खुद को आदिवासी क्यों न कहे। क्या हिन्दू होने पर भी वह ‘डिलिस्ट’ होगा? क्या वह धर्मांतरण नहीं? जबरदस्ती का निरूपण नहीं? या पहले से चली गई चाल है, ताकि धीरे-धीरे किसी को भी आदिवासी न कहा जा सके।

डिलिस्ट के बहुत पहले से ही निरंतर विस्थापन झेलते आदिवासी समुदाय को क्या ‘डीरूट’ यानी जड़ से उखाड़ा नहीं जा रहा। अपनी ज़मीन-जल-जंगल के रिश्ते से जुदा मात्र 8 फीसदी आदिवासी 55 फीसदी विस्थापन झेलता है। अपने पर्यावास से दूर मज़दूरी-बेगारी को मजबूर हैं। उसकी सामूहिकता नहीं बचती। तो भाषा, तहज़ीब, फलसफा सब छूट जाता है। वह सूची में शायद रहता है, पर जड़ विहीन होकर रह जाता है। सूची से इतर उसकी विरासत की समृद्धि खो जाती है। भाषा लुप्त होती है, देवी-देवता ध्वस्त हो जाते हैं, कहानियां गुम जाती हैं। जल-जंगल-जमीन से कटकर वह न तो इनसे अपना नैसर्गिक मौलिक अंतरसंबंधीय हक़ रखता है और न ही कोई प्रतिरोध करने के मंच बाकी बचते हैं। गांव नहीं रहा तो गांव सभा का क्या मायनए रह जाएगा।

इतने सबके बावजूद भी चूंकि वह अब भी कुछ-कुछ जीवंत है, सत्तासीन को रास नहीं आ रहा। दरअसल उसी की बसाहट में सारी नैसर्गिक संपदा जो है। ईसाईयत के नाम पर ‘डिलिस्ट’ करते ही आदिवासी आबादी कम दर्ज की जाएगी। परिसीमन, सीट बढ़ाने की कवायद में आदिवासी प्रतिनिधित्व और कम किया जाएगा। फिर बात यहां नहीं रुकेगी। अनुसूचित क्षेत्र, वनाधिकार “पेसा”हक़ नहीं देना पड़ेगा।

यह गहरी साजिश है।

फिलहाल इसकी अनुगूंज पांचवी अनुसूची क्षेत्र वाले राज्यों में है, जहां सांप्रदायिकता वादी राजनीति चरम पर है। वहीं पर आदिवासी और वनवासी की बहस भी जारी है। उत्तरपूर्व में असम, मणिपुर, त्रिपुरा, सिक्किम छोड़कर तकरीबन सभी राज्य ईसाई बाहुल्य हैं। वे सभी जनजातीय भी हैं। वहां यह छेड़ना सत्ता के लिए मुश्किल खड़ी कर सकता है। सो वहां औपनिवेशीकरण के दूसरे उपाय चालू हैं। मणिपुर में बेलगाम जनजातीय नरसंहार कराया जा रहा है। राज्य की सरकार केन्द्र आश्रित होती है। उसका लाभ लेकर औपनिवेशीकरण हो रहा है। थोड़े दिनों में पर्यावरणीय बदलाव सामने आएगा। आज जो सड़क, रेल बिछ रही हैं, वे औपनिवेशीकरण के लिए अधिक है, स्थानीय लोगों की आवाजाही बढ़ाने की गरज कम है। कोई आश्चर्य नहीं की देश के दूसरे हिस्से से लोग सायास बसाए जाएं। एक देश के नाम पर सारी विशिष्टताएं खत्म की जाएं। 370 हटा तो 371 के तहत दर्ज हक़ कब तक टिकेंगे।

हर समूह को चाहिए कि वह इस स्थिति को पहचाने। ‘डिलिस्ट’ का कहर सब पर बरपेगा। कोई शेष नहीं रहेगा। यह ‘डिलिस्ट’ का प्रयास नहीं है। असल में ‘डीरूट’ करने की साज़िश है।

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