विचार

नागरिक और हुकूमत के बीच बदलते रिश्तों की कड़वी हकीकत उजागर कर गया जंतर-मंतर आंदोलन

आज के राजनीतिक विमर्श में सरकार से सवाल पूछने से पहले लोगों को अपनी नागरिकता और पात्रता साबित करनी पड़ती है। लेकिन जंतर-मंतर का आंदोलन महज एक परीक्षा की धांधली का नहीं, बल्कि राज्य और हर एक नागरिक के बीच शक्ति संतुलन को बहाल करने का संघर्ष साबित हुआ।

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Getty Images Garima Agarwal

लुटियंस दिल्ली की सड़कें प्रधानमंत्री के मुस्कुराते चेहरे वाले होर्डिंग्स से पटी पड़ी हैं, जिनमें उन्हें किसी न किसी उपलब्धि के लिए बधाइयां दी जा रही हैं। प्रदर्शनकारी छात्रों पर हुए बर्बर पुलिसिया हमले की काली छाया में वह मुस्कान खास तौर पर खटकती है- नीचे जमीन पर तड़पते घायल नौजवान और ऊपर होर्डिंग्स पर तैरती एक दंभी मुस्कान। संभव है कि आने वाले दिनों में, अपने भरोसेमंद वफादार गृहमंत्री के इशारे पर पुलिस द्वारा पीटे गए छात्रों के प्रति संंवेदना जताते हुए उनकी आवाज रुंध भी जाएं। लेकिन ज्यादा उम्मीद है कि उनका ध्यान इस बात पर रहे कि कैसे विपक्ष और ‘देशद्रोहियों’ ने इसका राजनीतिकरण कर दिया।

खैर, उस खौफनाक दिन की दहशत के बीच वह मुस्कुराता चेहरा बहुत साफ और चुभने वाला विरोधाभास खड़ा कर रहा था। मेरे मन में सवाल उठा- क्या होता अगर वह खुद बेझिझक टहलते हुए प्रदर्शन स्थल पर चले आते? जिस नेता के पास आज भी इतना बड़ा जनाधार है, वह उस जगह पर पहुंचकर पूरे माहौल की कमान अपने हाथ में ले सकता था। वह प्रदर्शनकारियों को डांट-डपट भी देते, तब भी लोग शायद उनकी बात सुन लेते और इस्तीफे की मांगें शायद हवा में गुम हो जातीं।

इतिहास गवाह है कि नेहरू, जिन्हें आज लगातार निशाने पर लिया जाता है, अक्सर आक्रोशित भीड़ के बीच बेझिझक चले जाते थे और उनसे सीधे बात करते थे। ऐसा करना किसी नेता का झुक जाना या पीछे हटना नहीं।

आखिर, हमारे नेता जनता से सीधा संवाद क्यों नहीं करते? क्या वे सचमुच भीड़ में अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा को लेकर डरते हैं?

मुझे लगता है कि हुकूमत का यह डर केवल इस दलील तक सीमित नहीं है कि ‘एक मांग मान ली तो कमजोर दिखेंगे और आगे और रियायतें देनी पड़ेंगी।’ असल खेल तो विमर्श के इस बदलते ढर्रे का है। एक स्वस्थ लोकतंत्र में आम समझ यही कहती है कि जनता की इच्छा के आगे सिर झुकाया जाए। लेकिन आज के राजनीतिक विमर्श की शुरुआत ही जनता की वैधानिकता पर सवाल उठाकर होती है - ‘क्या आप बहुसंख्यक आबादी की राय का प्रतिनिधित्व करते हैं? नहीं? तो क्या यह बात आपको देशद्रोही या गैर-वाजिब नागरिक नहीं बना देती?’ नेतृत्व से बातचीत का हक पाने से पहले लोगों पर ही यह साबित करने का बोझ डाल दिया गया है कि वे इस देश के वैध नागरिक हैं। 

हैरानी की बात तो यह है कि संवैधानिक अदालतों ने भी मौखिक टिप्पणियों में याचिकाकर्ताओं के ‘नागरिक होने की हैसियत’ पर सवाल उठाए हैं और नतीजतन अधिकारों की गुहार लगाने के उनके हक को कटघरे में खड़ा किया है। यह आंदोलन ऐसे ही एक अपमानजनक ठप्पे पर अपना कब्जा जमाकर, उसे सत्ता के ही खिलाफ हथियार बनाने से शुरू हुआ। इसलिए, आज हर एक नागरिक की वैधानिकता और उसकी गरिमा के सवाल को उठाना बेहद जरूरी है-और यही वह सवाल है जो इस आंदोलन के लिए अभी सबसे अहम है। इसके लिए एक व्यापक राजनीतिक दृष्टि और उसमें हर इंसान के लिए जगह की जरूरत है। 

जिस दिन सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शन के दौरान पुलिस बल के अत्यधिक इस्तेमाल से जुड़ी अर्जी पर सुनवाई से इनकार करते हुए उसे ‘समय की बर्बादी’ करार दिया, उसी दिन मैंने देखा कि एक पत्रकार एक युवा प्रदर्शनकारी से पूछ रहा था कि क्या उमर खालिद जैसे ‘देशद्रोहियों’ को अदालत में सफाई देने या सुनवाई का हक भी होना चाहिए? इसका सबसे आम जवाब आयाः ‘यह प्रदर्शन उमर खालिद या शरजील इमाम के बारे में नहीं है।’ लेकिन मुझे लगता है कि आखिरकार यह प्रदर्शन उनके बारे में भी है- यह हुकूमत और सभी नागरिकों के बीच शक्ति संतुलन को फिर से बहाल करने की लड़ाई है। यह उन तमाम कोशिशों पर सवाल उठाने की लड़ाई है, जिनका मकसद समाज के कुछ तबकों को बेदखल करना, उनकी नागरिकता को अवैध ठहराना और उनसे उनका इंसानी वजूद छीनना है। 

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संसद मार्ग पर स्थित एक मशहूर रेस्तरां-जो राहुल गांधी का भी पसंदीदा माना जाता है- बंद है। उसका बैचैन स्टाफ फुटपाथ पर कतार में खड़ा सिगरेट पी रहा है, आपस में गपशप कर रहा है और प्रदर्शन की गतिविधियों को देख रहा है। वहां कुछ ऐसे लोग भी थे जो इस पूरे मामले के ‘राजनीतिकरण’ से खुश नहीं थे, क्योंकि उनके मुताबिक इसमें ‘अन्य लोग’ भी शामिल हो गए थे-ऐसे लोग जो छात्र नहीं हैं, या अगर छात्र हैं भी तो कभी नीट परीक्षा में नहीं बैठे। कुछ लोग कह रहे थे: ‘अगर मामला शिक्षा का ही है, तो ये लोग बाकी मुद्दों पर बात क्यों कर रहे हैं?’

यह सोच आंदोलनों के भीतर हावी हो रही लालफीताशाही वाली मानसिकता दिखाती है। पहले अपनी पात्रता साबित कीजिए- क्या आप सीधे तौर पर प्रभावित हैं? दूसरा, यह आंदोलन आपकी तमाम शिकायतों के निपटारे का एकल खिड़की केन्द्र नहीं बन सकता। कोई बेतुकी नारेबाजी नहीं होगी, कोई अन्य व्यापक सरोकार यहां नहीं उठाए जाएंगे।

नए भारत ने एक ऐसी व्यावसायिक होड़ वाली अर्थव्यवस्था को जन्म दिया है, जहां अगर आप किसी ऐसे मुद्दे पर सहानुभूति जताते हैं या उसमें हिस्सा लेते हैं जिससे आप सीधे प्रभावित नहीं हैं, तो आपको शक की निगाह से देखा जाता है। कुछ लोग दलील देते हैं कि शिक्षा के मुद्दे को अगवा कर इसका राजनीतिकरण किया जा रहा है। मानो सरकारी शिक्षा के बजट में कटौती, निजीकरण, इतिहास का पुनर्लेखन और पाठ्यक्रम में प्रायोजित बदलाव जैसी चीजें अलग-अलग खानों में बंटी हैं और उस पूरे नजरिये को चुनौती दिए बिना इनसे लड़ा जा सकता है जहां से ये नीतियां उपजती हैं।

ऐसा लगता है कि सार्वजनिक क्षेत्र में प्रवेश का एक खास प्रोटोकॉल तय कर दिया गया है। इसे एक के अंदर एक बने घेरों की तरह समझिए। केन्द्र में वे ‘आदर्श नागरिक’ हैं जो सरकार से कभी सवाल नहीं करते, बल्कि सवाल उठाने वालों की नीयत पर उंगली उठाते हैं। उसके बाद वे लोग आते हैं जिन्हें प्रदर्शन तो करना है, लेकिन वे ‘अच्छे घर-परिवार’ से आते हैं और सरकार के प्रति अपना पुराना समर्थन साबित कर सकते हैं- यानी वे वैचारिक रूप से सरकार के विरोधी नहीं हैं। अगर उनकी ‘एकसूत्री मांग’ मान ली जाए तो वे वापस मुख्यधारा के घेरे में लौट सकते हैं। और फिर सबसे बाहर वे लोग हैं जो हमेशा संदिग्ध हैं: मुसलमान, कश्मीरी, सीएए-विरोधी प्रदर्शनकारी, ‘अर्बन नक्सल’, किसान, आदिवासी और दलित। बाहरी घेरे वाले इन लोगों को पेपर लीक जैसे मामले पर हो रहे विरोध प्रदर्शन को प्रदूषित करने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए।

रणनीतिक रूप से ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) भी इस तर्क के आगे झुकती दिखी है और उसने मंजूरशुदा नारों की एक सीमा तय कर दी। लेकिन स्वाभाविक और भावनात्मक रूप से यह आंदोलन इस क्षणिक रणनीतिक सोच के दायरे से बहुत आगे निकल चुका था। वहां की नारेबाजी अब किसी बंदिश में रहने वाली नहीं है। देखना यह है कि क्या सरकार इस पर और आक्रामक रुख अपनाएगी और बातचीत को खींचकर इस आधार पर नारों में नई दरार पैदा करेगी कि किसे बर्दाश्त किया जा सकता है और किसे नहीं। 

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शांतिपूर्ण प्रदर्शन का महत्व सर्वोपरि है। फिर भी इस बात को दोहराया जाना चाहिए कि शांति बनाए रखने का वादा  प्रदर्शनकारियों से ही मांगा जाता है। जबकि राज्य द्वारा वैध हिंसा की धमकी-जिसका इस्तेमाल पूरी तरह हुकूमत की मर्जी पर निर्भर है- हमेशा हवा में तैरती रहती है। हमें राज्य से भी शांतिपूर्ण व्यवहार के वादे की मांग करनी चाहिए। यह कोई नामुमकिन बात नहीं। उम्मीद की जाती है कि पुलिस को जन-आक्रोश, नारेबाजी और हल्की-फुल्की धक्का-मुक्की के बीच संयम से काम लेने के लिए प्रशिक्षित है- ठीक वैसे ही जैसे प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षक अपने अनुशासनहीन छात्रों से निपटते हैं। इसके बजाय, पुलिसिया कार्रवाई प्रतिशोधात्मक हो जाती है, जिसमें अक्सर इस बात का गुस्सा दिखता है कि आम जनता की राज्य से सवाल पूछने की हिम्मत कैसे हुई। इस पूरी अफरातफरी में सरकार से वैचारिक रूप से जुड़ी निजी सेनाओं की बेरोकटोक घुसपैठ देश को एक भयावह अंधेरे की ओर ले जाने का संकेत है।

ऐसे में मुसलमानों को क्या करना चाहिए? सोशल मीडिया पर इस बात को लेकर बहस छिड़ी है कि मुस्लिम युवाओं को इस आंदोलन में शामिल होना चाहिए या इससे दूर रहना चाहिए? कुछ लोग कह रहे हैं कि उन्हें शामिल होना चाहिए तो कुछ सावधानी बरतने की सलाह दे रहे हैं- यह जानते हुए कि एक मुसलमान सड़कों पर भी उतना ही असुरक्षित है जितना कि कानून के सामने।

मुझे नहीं लगता कि मुसलमान अपनी हर बात के लिए उलेमा या किसी धर्मनिरपेक्ष नेतृत्व की सलाह के मोहताज हैं। वे कोई राजनीतिक रूप से एक ही ढर्रे पर चलने वाला समूह नहीं हैं। मुस्लिम युवा वही करते हैं जो उन्हें सही लगता है-अगर वे चाहेंगे तो आंदोलनों में जरूर जाएंगे, क्योंकि यह देश उनका भी उतना ही है जितना किसी और का। कुछ लोग शायद इसलिए दूर भी रहें क्योंकि उन्हें इसकी जो भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है, वह उनके बस की बात नहीं। 

लेकिन इस सब के बीच, सार्वजनिक जीवन के उन एक के अंदर एक बने घेरों को देखकर मुझे एक नारा याद आया स्वयं को ‘सनातनी’ बताने वाला उपद्रवी कुछ भी करे, उसके लिए सब माफ है, लेकिन बाकी दूसरों के लिए सवाल मुंह बाए खड़ा रहता है- ‘कोई करे तो डेमोक्रेसी, कोई और करे तो कॉन्सपिरेसी!’ 

(शाहरुख आलम सुप्रीम कोर्ट में संविधान से जुड़े मामलों की वकील और मानवाधिकार ऐक्टिविस्ट हैं। यह लेख धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से पहले लिखा गया है)