
एक लोकतांत्रिक समाज के तौर पर, यह उम्मीद की जाती है कि भारत के अधिकारी कानून के शासन का पालन करेंगे। इसमें यह भी शामिल है कि शासन मनमाना नहीं होगा, खासकर तब, जब बात क्रिमिनल लॉ की हो। यह बात इसलिए ज़रूरी है क्योंकि क्रिमिनल लॉ से किसी की ज़िंदगी बर्बाद हो सकती है। ऐसा ही हाल ही में एक जज ने कॉलेज छात्रों के एक ऐसे समूह को याद दिलाया था, जिन्होंने एक विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया था।
वैसे तो यह अलग मुद्दा है कि आखिर विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेना अपराध कैसे हो गया, लेकिन ऐसा हो रहा है। राज्य द्वारा क्रिमिनल लॉ का यूं ही इस्तेमाल और फिर जिस पर यह लगाया गया है, उस व्यक्ति का लंबे समय तक लड़ने का संघर्ष, हम भारतीयों ने अब इसे ही सामान्य मान लिया है। हमारे लिए खास बात यह है: यह स्वाभाविक नहीं हो सकता कि लोकतंत्र की जननी माने जाने वाले देश में, आम नागरिक, पुलिस, अदालत और आम तौर पर सरकार से डरते हैं। इसमें कुछ भी नया नहीं है और सिनेमा में तो जाने कब से 'पुलिस का चक्कर' शब्द का इस्तेमाल हो रहा है।
Published: undefined
मैं जिस बारे में बात करना चाहता हूं, वह कुछ अलग है। यह अब अपनी जड़े जमा चुका है और भारत के लोकतंत्र का हिस्सा बन गया है। इस हफ़्ते की दो हेडलाइन से यह साफ़ हो जाएगा कि मेरा क्या मतलब है। पहली हेडलाइन है: 'इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस की आरोपी व्यक्तियों को पैरों में गोली मारने के तरीके प्रैक्टिस की आलोचना की'। इस खबर के सबहेड में लिखा है: 'बेंच ने कहा - ऐसा व्यवहार पूरी तरह से गलत है, क्योंकि सज़ा देने का अधिकार सिर्फ़ अदालतों के पास है।'
दूसरी हेडलाइन है 'उत्तराखंड के धर्मांतरण कानून के तहत दर्ज मामले अदालत में ध्वस्त : 7 साल, 5 पूरे ट्रायल, सभी 5 में बरी'।
पहले मामले में, उत्तर प्रदेश सरकार ने पिछले साल जुलाई में आंकड़े जारी किए थे। 2017 से अब तक पुलिस मुठभेड़ में 9,467 लोगों को पैर में गोली मारी गई थी। इसका मतलब है कि प्रदेश में पिछले नौ सालों से रोज़ाना लगभग तीन लोगों को पुलिस ने पैर में गोली मारी है।
Published: undefined
अब कोर्ट ने ये टिप्पणी की है: सीनियर अधिकारियों को खुश करने के लिए या बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के लोगों को सज़ा देने के पैरों में लिए गोली मारी जा रही है। कोर्ट ने कहा कि यह न्यायपालिका के काम में दखल है और इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। बयान रिकॉर्ड करने और जांच के बारे में, कोर्ट ने कहा कि पुलिस सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस का पालन नहीं कर रही है। कोर्ट इस बात से चिंतित था कि पुलिस अधिकारी जजों, खासकर चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट पर खास ऑर्डर पास करने के लिए दबाव डाल रहे थे।
जज ने कहा कि कोर्ट उत्तर प्रदेश को पुलिस स्टेट बनने की इजाज़त नहीं दे सकता।
एक ऐसा राज्य जो हिरासत में लोगों को मारता है, जो हिरासत में लोगों को अपाहिज बनाता है, जो बिना सही कानूनी प्रक्रिया के और सुप्रीम कोर्ट सहित पूरी न्याय व्यवस्था को नज़रअंदाज़ करके लोगों की निजी संपत्ति को नष्ट करता है, वह ज़ाहिर तौर पर पहले से ही एक पुलिस स्टेट नहीं है!
Published: undefined
दूसरी रिपोर्ट की हेडलाइन थी: 'उत्तराखंड के धर्मांतरण कानून के तहत मामले कोर्ट ध्वस्त: 7 साल, 5 पूरे ट्रायल, सभी 5 में बरी'। यह ज़िक्र उत्तराखंड धर्म स्वतंत्रता अधिनियम, 2018 का है, जो 'लव जिहाद' की साज़िश की थ्योरी फैलने के बाद बीजेपी द्वारा पेश और लागू किए गए कई राज्यों के कानूनों में सबसे पहले बनाया गया था।
यह मुसलमानों और हिंदुओं के बीच शादी को तब अपराध मानता है, जब दोनों में से कोई एक पार्टनर धर्म बदलता है, लेकिन कानून कहता है कि 'अगर कोई व्यक्ति अपने पैतृक धर्म में वापस आता है' तो इसे धर्म परिवर्तन नहीं माना जाएगा, बिना यह बताए कि 'पैतृक धर्म' का क्या मतलब है। इसका मतलब है कि अगर कोई गैर हिंदू अपना धर्म छोकर हिंदू धर्म अपनाता है तो उसे धर्म परिवर्तन नहीं माना जाएगा।
लब जिहाद की अगर शिकायत दर्ज हो गई तो, फिर जिला मजिस्ट्रेट पुलिस के ज़रिए 'उस प्रस्तावित धर्म परिवर्तन के असली इरादे, मकसद और कारण' के बारे में जांच करेंगे। जो लोग सरकार को 'निर्धारित प्रोफ़ार्मा' में आवेदन किए बिना और पुलिस जांच के बाद सरकार की सहमति के बिना अपना धर्म बदलते हैं, उन्हें एक साल की जेल हो सकती है।
Published: undefined
यह कानून सात साल से लागू है। इस दौरान, पाँच मामलों में ट्रायल पूरा हुआ, और उन सभी में आरोपियों को बरी कर दिया गया। सात और मामले ट्रायल के दौरान खारिज कर दिए गए। रिपोर्ट में कहा गया है कि 'कोर्ट रिकॉर्ड से यह साफ़ है कि सबूतों के मानक आमतौर पर पूरे नहीं किए गए, आपसी सहमति से बने रिश्तों को अपराधी बनाया गया, और जांच और मुकदमे में प्रक्रियागत खामियां हैं।'
जिस अखबार ने यह रिपोर्ट छापी, उसने इसे एक खास ऐंगल देते हुए लिखा, 'उत्तराखंड में, न्यायपालिका ने नागरिकों को सरकार की मनमानी से बचाया'। यह बेतुका संपादकीय है, क्योंकि नागरिकों को सजा तो दी ही गई। जैसा कि आजकल के युवा कहते हैं, यहां 'बचाया' शब्द बहुत ज़्यादा काम कर रहा है।
हमारे दौर में हमारे आस-पास जो हो रहा है, उससे हम क्या नतीजा निकाल सकते हैं? दो बातें। पहली यह कि पूरे भारत में अधिकारी जानबूझकर कानून तोड़ रहे हैं ताकि वे बीजेपी सरकारों की मर्ज़ी के हिसाब से चल सकें। वे ऐसा पूरे भरोसे के साथ कर रहे हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि उनकी कोई जवाबदेही नहीं होगी और सच तो यह है कि जैसा कि यूपी कोर्ट ने कहा है, उन्हें ऐसा करने के लिए इनाम भी मिल सकता है।
Published: undefined
दूसरी बात हमें वहीं ले जाती है जहां से हमने शुरुआत की थी और हम पूछें कि जब एक लोकतांत्रिक समाज के अधिकारी जानबूझकर कानून के शासन, खासकर आपराधिक कानून का उल्लंघन करते हैं, तो क्या होता है? इसके छोटे और लंबे समय के नतीजे होते हैं और दोनों ही टाले नहीं जा सकते।
तुरत-फुरत सामने आने वाले नतीजे वे हैं जिनके बारे में हम पढ़ते हैं: सरकार की हरकतों से बर्बाद हुई ज़िंदगी। लेकिन लंबे अर्से तक रह जाने वाले नतीजे वे हैं जो पूरे देश और समाज पर असर डालते हैं। जो देश खुद से यह झूठ बोलता है कि वह कानून के राज वाला लोकतंत्र है, वह उस जगह नहीं पहुँचेगा जहाँ कानून का राज समाजों को ले जाना चाहता है।
Published: undefined