
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में युद्ध जितने महत्वपूर्ण होते हैं, उनसे भी अधिक महत्वपूर्ण वे क्षण होते हैं जब युद्धरत पक्ष बातचीत की मेज़ पर लौटते हैं। अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम को आगे बढ़ाने के लिए हुए समझौते तथा उससे जुड़े मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (एमओयू) को इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए। यह केवल हस्ताक्षरों का आदान-प्रदान नहीं है, बल्कि उन संभावनाओं का दस्तावेज़ है जिनमें संघर्ष की जगह संवाद, प्रतिबंधों की जगह सहयोग और सैन्य दबाव की जगह कूटनीति को प्राथमिकता दी जा सकती है। फिर भी, इस समझौते को लेकर उत्साह और संशय- दोनों समान रूप से मौजूद हैं।
अमेरिका और ईरान के संबंध पिछले चार दशकों से अविश्वास, प्रतिबंधों, परोक्ष संघर्षों और वैचारिक टकरावों से प्रभावित रहे हैं। परमाणु कार्यक्रम, पश्चिम एशिया में प्रभाव की प्रतिस्पर्धा, समुद्री सुरक्षा, क्षेत्रीय सहयोगी देशों की भूमिका और आर्थिक प्रतिबंध- इन सभी ने संबंधों को जटिल बनाया है। ऐसे में यदि दोनों पक्ष किसी साझा दस्तावेज़ पर सहमत होते हैं, तो यह अपने आप में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक घटना है। किंतु इतिहास यह भी सिखाता है कि समझौते पर हस्ताक्षर करना अपेक्षाकृत आसान है, उसे टिकाऊ बनाना कहीं अधिक कठिन।
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इस समझौते का पहला और सबसे महत्त्वपूर्ण संदेश है- संघर्ष को सीमित करना। “हर मोर्चे पर संघर्ष समाप्त करने” की भावना केवल सैन्य कार्रवाई रोकने तक सीमित नहीं है; इसका अर्थ यह भी है कि दोनों पक्ष प्रत्यक्ष और परोक्ष टकरावों को कम करने का प्रयास करेंगे। पश्चिम एशिया लंबे समय से ऐसे संघर्षों का क्षेत्र रहा है जहाँ युद्ध औपचारिक घोषणा से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे सैन्य अभियानों, प्रॉक्सी समूहों और सीमित हमलों के माध्यम से चलता रहता है। यदि यह समझौता वास्तव में उस प्रवृत्ति को नियंत्रित कर पाता है, तो इसका प्रभाव पूरे क्षेत्र में महसूस किया जाएगा।
समझौते का दूसरा महत्त्वपूर्ण तत्व है- एक-दूसरे के आंतरिक मामलों का सम्मान। आधुनिक अंतरराष्ट्रीय कानून का यह मूल सिद्धांत है कि प्रत्येक संप्रभु राष्ट्र अपनी राजनीतिक व्यवस्था स्वयं निर्धारित करे। व्यवहार में, शक्तिशाली देश अक्सर सुरक्षा, मानवाधिकार, आतंकवाद या क्षेत्रीय स्थिरता के नाम पर दूसरे देशों की नीतियों को प्रभावित करने का प्रयास करते रहे हैं। ईरान और अमेरिका के संबंधों में भी यही अविश्वास बार-बार सामने आया है। यदि यह प्रावधान वास्तविक नीति का हिस्सा बनता है, तो द्विपक्षीय संबंधों में तनाव कम करने का आधार बन सकता है।
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हालाँकि, केवल घोषणा से विश्वास नहीं बनता। विश्वास लगातार निभाए गए वचनों से पैदा होता है। इसलिए इस समझौते की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि दोनों पक्ष अपने-अपने राजनीतिक वक्तव्यों और वास्तविक नीतियों के बीच कितनी संगति बनाए रखते हैं।
समझौते में समयसीमा बढ़ाने की संभावना भी रखी गई है। पहली दृष्टि में यह व्यावहारिक प्रतीत होती है, क्योंकि परमाणु निरीक्षण, आर्थिक प्रतिबंधों की समीक्षा और वित्तीय व्यवस्थाओं जैसे विषयों पर त्वरित निर्णय लेना कठिन होता है। परंतु यही व्यवस्था यदि अनिश्चितकालीन विस्तार का माध्यम बन जाए, तो यह समझौते को निष्प्रभावी भी कर सकती है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में कई ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहाँ अस्थायी व्यवस्था स्थायी टालमटोल में बदल गई और मूल विवाद कभी समाप्त नहीं हुआ।
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आर्थिक प्रतिबंधों में संभावित ढील समझौते का सबसे संवेदनशील पक्ष है। प्रतिबंध आधुनिक युग में युद्ध के बिना दबाव बनाने का प्रमुख साधन बन चुके हैं। ईरान पर लगाए गए विभिन्न आर्थिक प्रतिबंधों ने उसके बैंकिंग तंत्र, तेल निर्यात, विदेशी निवेश और मुद्रा बाज़ार को प्रभावित किया है। यदि इन प्रतिबंधों में वास्तविक राहत मिलती है, तो ईरान की अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवन मिल सकता है। उद्योग, रोजगार, आयात-निर्यात और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में नई संभावनाएँ खुल सकती हैं।
लेकिन यहाँ एक मूलभूत प्रश्न है- क्या प्रतिबंध हटाने का निर्णय स्थायी होगा या शर्तों से बँधा रहेगा? यदि हर आर्थिक रियायत भविष्य के राजनीतिक मूल्यांकन पर निर्भर होगी, तो निवेशकों और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों का विश्वास सीमित रह सकता है। आर्थिक विकास केवल धन से नहीं, बल्कि नीति की स्थिरता से भी आता है।
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होर्मुज़ जलडमरूमध्य का पुनः खुलना इस समझौते का वैश्विक महत्व दर्शाता है। विश्व ऊर्जा आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है। जब भी इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है, तेल की कीमतें प्रभावित होती हैं और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार अस्थिर हो जाते हैं। इसलिए इस समुद्री मार्ग की सुरक्षा केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक चिंता का विषय है। यदि यहाँ स्थिरता आती है, तो उसका लाभ एशिया, यूरोप और अन्य ऊर्जा आयातक देशों तक पहुँचेगा।
समझौते में ईरान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए 300 अरब डॉलर के संभावित फंड का विचार भी उल्लेखनीय है। किसी भी लंबे तनाव या संघर्ष के बाद आर्थिक पुनर्निर्माण सामाजिक स्थिरता का आधार बनता है। बुनियादी ढाँचे, परिवहन, ऊर्जा, शिक्षा, स्वास्थ्य और तकनीकी निवेश में यदि बड़े पैमाने पर संसाधन लगाए जाते हैं, तो उसका सकारात्मक प्रभाव केवल अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं रहता; वह सामाजिक असंतोष और राजनीतिक अस्थिरता को भी कम कर सकता है। हालांकि यह भी ध्यान रखना होगा कि इतनी बड़ी वित्तीय व्यवस्था की पारदर्शिता, स्रोत और उपयोगिता पर अंतरराष्ट्रीय निगरानी की माँग स्वाभाविक रूप से उठेगी।
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परमाणु हथियार न बनाने की प्रतिबद्धता समझौते का केंद्रीय तत्व है। वैश्विक अप्रसार व्यवस्था इसी सिद्धांत पर आधारित है कि परमाणु तकनीक का उपयोग शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए हो, न कि सैन्य हथियारों के विकास के लिए। लेकिन अनुभव बताता है कि केवल राजनीतिक घोषणा पर्याप्त नहीं होती। निरीक्षण की विश्वसनीय प्रणाली, तकनीकी सत्यापन, नियमित रिपोर्टिंग और अंतरराष्ट्रीय सहयोग अनिवार्य होते हैं। यदि इन व्यवस्थाओं में पारदर्शिता नहीं होगी, तो संदेह बना रहेगा और वही संदेह भविष्य के तनाव का कारण बन सकता है।
समझौते का “प्रदर्शन आधारित” स्वरूप विशेष ध्यान देने योग्य है। इसका अर्थ है कि आर्थिक लाभ और प्रतिबंधों से राहत स्वतः नहीं मिलेगी, बल्कि प्रत्येक चरण में यह देखा जाएगा कि ईरान अपनी प्रतिबद्धताओं का पालन कर रहा है या नहीं। सिद्धांततः यह व्यवस्था जवाबदेही सुनिश्चित करती है, किंतु व्यवहार में यह शक्ति-संतुलन का प्रश्न भी बन सकती है। यदि मूल्यांकन का अधिकार मुख्यतः एक पक्ष के पास हो, तो दूसरा पक्ष इसे असमान व्यवस्था मान सकता है। इसलिए किसी भी निगरानी तंत्र की निष्पक्षता उसकी सफलता की पूर्वशर्त है।
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फ़्रीज़ किए गए खातों और प्रतिबंधित वित्तीय संसाधनों की बहाली का प्रश्न भी कम जटिल नहीं है। अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग प्रणाली अत्यंत संवेदनशील होती है और राजनीतिक जोखिम को तुरंत ध्यान में रखती है। यदि निवेशकों को यह आशंका रहे कि थोड़े से विवाद पर पुनः प्रतिबंध लग सकते हैं, तो वे दीर्घकालिक निवेश से बचेंगे। इसलिए वास्तविक आर्थिक लाभ केवल कानूनी घोषणा से नहीं, बल्कि भरोसेमंद कार्यान्वयन से मिलेगा।
इस समझौते का एक व्यापक भू-राजनीतिक पक्ष भी है। पश्चिम एशिया में शक्ति-संतुलन निरंतर बदल रहा है। क्षेत्रीय देशों के बीच प्रतिस्पर्धा, ऊर्जा संसाधनों का महत्व, समुद्री मार्गों की सुरक्षा और वैश्विक शक्तियों के रणनीतिक हित इस क्षेत्र को अत्यंत संवेदनशील बनाते हैं। ऐसे में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होना केवल द्विपक्षीय घटना नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्रीय समीकरण को प्रभावित करने वाला विकास हो सकता है।
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हालाँकि, इस समझौते के कई प्रश्न अभी भी अनुत्तरित हैं। यदि किसी पक्ष पर उल्लंघन का आरोप लगेगा तो अंतिम निर्णय कौन करेगा? क्या कोई संयुक्त आयोग बनेगा? क्या किसी अंतरराष्ट्रीय संस्था को निगरानी की भूमिका मिलेगी? यदि निरीक्षण दलों और स्थानीय प्रशासन के बीच मतभेद उत्पन्न होते हैं, तो समाधान की प्रक्रिया क्या होगी? इन प्रश्नों के स्पष्ट उत्तर भविष्य में विवादों को रोकने के लिए आवश्यक हैं।
इतिहास के अनुभव इस संदर्भ में उपयोगी हैं। अनेक अंतरराष्ट्रीय समझौते प्रारंभिक उत्साह के बावजूद इसलिए विफल हुए क्योंकि उनके क्रियान्वयन की संस्थागत व्यवस्था पर्याप्त मजबूत नहीं थी। वहीं कुछ समझौते इसलिए सफल रहे क्योंकि उन्होंने विश्वास निर्माण के छोटे-छोटे चरणों को प्राथमिकता दी। इसलिए इस एमओयू की सफलता भी इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या इसे केवल राजनीतिक घोषणा बनाकर छोड़ दिया जाता है या इसे संस्थागत रूप देकर निरंतर लागू किया जाता है।
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लोकतांत्रिक देशों में एक और चुनौती घरेलू राजनीति होती है। किसी भी सरकार की विदेश नीति पर आंतरिक राजनीतिक दबाव प्रभाव डालता है। सत्ता परिवर्तन, चुनावी वादे, सुरक्षा संबंधी घटनाएँ या जनमत में बदलाव समझौतों की दिशा बदल सकते हैं। इसलिए किसी भी दीर्घकालिक व्यवस्था को केवल वर्तमान नेतृत्व के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता; उसे ऐसी संस्थागत स्वीकृति चाहिए जो राजनीतिक परिवर्तन के बाद भी बनी रहे।
इस पूरे परिदृश्य में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या शांति केवल समझौतों से आती है। उत्तर है- नहीं। शांति तब आती है जब समझौते विश्वास पैदा करते हैं, विश्वास सहयोग में बदलता है और सहयोग साझा हितों का निर्माण करता है। यदि आर्थिक विकास, व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता दोनों पक्षों के साझा हित बन जाएँ, तभी संघर्ष की संभावना स्वाभाविक रूप से घटेगी।
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अंततः यह समझौता न तो अंतिम समाधान है और न ही इसे असफल मान लेने का कोई कारण है। यह एक संक्रमणकालीन दस्तावेज़ है, जिसकी वास्तविक परीक्षा आने वाले महीनों और वर्षों में होगी। यदि इसके प्रावधान निष्पक्ष निगरानी, पारदर्शी कार्यान्वयन और सतत राजनीतिक संवाद के साथ आगे बढ़ते हैं, तो यह पश्चिम एशिया में स्थिरता की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम सिद्ध हो सकता है। लेकिन यदि इसे केवल सामरिक विराम, राजनीतिक प्रचार या अस्थायी सुविधा के रूप में देखा गया, तो यह भी उन अनेक समझौतों की सूची में शामिल हो जाएगा जिनके हस्ताक्षर इतिहास में दर्ज हैं, पर जिनसे स्थायी शांति का मार्ग प्रशस्त नहीं हो सका।
विश्व राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि युद्ध शुरू करने में कभी-कभी कुछ घंटे लगते हैं, जबकि विश्वास बहाल करने में वर्षों नहीं, पीढ़ियाँ लग जाती हैं। इसलिए अमेरिका और ईरान के बीच यह समझौता केवल दो देशों की कूटनीति का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि इस प्रश्न की भी परीक्षा है कि क्या इक्कीसवीं सदी की विश्व व्यवस्था टकराव की जगह सहयोग को चुनने का साहस रखती है।
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