विचार

विष्णु नागर का व्यंग्य: देश के हालातों ने माननीय को कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा!

वैसे भी देश के जो हालात हैं, उन्होंने उन्हें मुंह दिखाने लायक छोड़ा नहीं था। दिनभर बैठे- बैठे, लेटे-लेटे, ऊंघते -ऊंघते करें तो करें क्या? हाथ, अब हाथ नहीं कर कमल हो चुके हैं तो लान की घास खोदकर समय बिताना भी मुश्किल है।

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फोटो: Getty Images Hindustan Times

मजबूर हैं बेचारे। इटली में मिलोनी जी को मेलोडी चाकलेट खिलाने के बाद माननीय जी बड़े बेमन से स्वदेश लौटे थे। यहां भयानक गर्मी और ऊपर से फिलहाल यहां करने के लिए कुछ खास था नहीं। जब गए थे‌ तो विपक्ष के 'भड़कावे ' में आकर जनता को पेट्रोल- डीजल की फिजूलखर्ची रोकने का उपदेश दे गए थे। आए तो वही उन पर भारी पड़ गया। दस दिन से ज्यादा बंगले में कैद उनकी आत्मा तड़पने लगी। रोड शो, रोड शो कर, कहने लगी।

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पहले तो सुबह उठते ही जहाज लेकर पूरा देश नाप आते थे। भाड़े की भीड़ जुटा लेते थे। रोड शो कर लेते थे। इस तरह 18-18 घंटे काम करने की राष्ट्र ने जो जिम्मेदारी उन पर थोपी थी, उसे पूरा कर लेते थे।देश को 'विकसित भारत' बनाने में व्यस्त और प्रसन्न रहते थे।

वैसे भी देश के जो हालात हैं, उन्होंने उन्हें मुंह दिखाने लायक छोड़ा नहीं था। दिनभर बैठे- बैठे, लेटे-लेटे, ऊंघते -ऊंघते करें तो करें क्या? हाथ, अब हाथ नहीं कर कमल हो चुके हैं तो लान की घास खोदकर समय बिताना भी मुश्किल है! दीवारों, आलमारियों, पेड़ - पौधों, मोर- मोरनियों को देखकर हाथ हिलाते रहते हैं ताकि हाथ हिलाने की प्रैक्टिस न छूट जाए! हाथ कहीं जाम न हो जाएं, जनता हताश न हो जाए।

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इन कर कमलों से अब इतना ही कर सकते थे कि एक तो खुद खा सकते थे और दूसरे गौतम अडानी को खिला सकते थे और 'राष्ट्रहित 'में वे इतना कर रहे थे। बाकी कुछ कर नहीं सकते थे। उनकी इस पीड़ा को शब्द देनेवाला देश में कोई कवि- लेखक नहीं था!

इस कारण उनके लिए जीना और पद पर रहना बोझ जैसा लगने लगा था। मन विद्रोह करने लगा था। पश्चिम बंगाल में इतनी भारी जीत के बाद हाथ पर हाथ धरे असहाय बैठने से मन कसमसाने लगा था। उन्हें अपने आप पर गुस्सा आने लगा था कि औरंगज़ेब ने तो अपने बाप को कैद किया था, मैंने तो खुद अपने को कैद कर लिया है। मुझसे ज्यादा बेवकूफ इस धरती पर कौन होगा? आत्मान्वेषण सही दिशा में जा रहा था। उन्हें ईरान पर गुस्सा आने लगा, जिसकी वजह से यह मुसीबत आ खड़ी हुई है। उन्होंने कमरे की दीवार पर जोर की लात मारी। लात तो दर्द सह गई मगर दीवार की ईंट खिसक गई। उनकी सुरक्षा खतरे में पड़ गई। फिर उन्हें अमेरिका पर भी गुस्सा आने लगा।वे एक बार फिर से लात मारकर एक और ईंट खिसकाने वाले थे कि डोनाल्ड ट्रंप खयाल आ गया। मन को शांत करना पड़ा।

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कुछ करना होगा माननीय जी ने सोचा वरना लोग शेयर बाजार गिरने का शोर मचाने लगेंगे।निवेश भाग रहा है, इसकी डुगडुगी बजाने लगेंगे। बड़े-बड़े व्यापारी, उद्योगपति, अर्थशास्त्री आजकल आर्थिक तूफान आने की बात करने लगे हैं। अब तो सरकार के पाले में बैठे अर्थशास्त्री भी ऐसी बहकी- बहकी बातें करने लगे हैं। उधर राहुल गांधी रोज नया सरदर्द पैदा कर रहे हैं। क्रॉकरोच जनता पार्टी भी डरा रही है।

इन बातों की तरफ लोगों का ध्यान जाने लगा तो माननीय जी ने सोचा, मेरा फ्यूचर बिगड़ जाएगा। अभी मेरी उम्र हुई ही क्या है- मात्र पचहत्तर!अभी तो मैं जवान हुआ हूं। मूंछ आना अभी बाकी है। ऐसे में कोई खुराफात करना जरूरी हो गया था। इकानामी जाए भाड़ में, काक्रोच जनता पार्टी जाए गड्ढे में, मेरे शेयर उठते रहने चाहिए।

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कहते हैं कि खाली दिमाग शैतान का घर होता है मगर दिमाग ही अगर शैतान का हो तो वह घर नहीं, बंगला होता है। तो शैतान ने विचार किया। इमेज का भगवा झंडा बुलंद करने के तमाम उपाय सोचे पर भेजे में कुछ आया नहीं। भेजा जाम हो चुका था। चाणक्य जी को सादर बुलाया गया। वे आए तो माननीय जी ने जीवन में पहली बार उन्हें पानी का गिलास दिया।

माननीय जी का मुंह उतरा और आंखें झुकी देख चाणक्य जी का दिल पिघल गया। माननीय जी की आंखों के नीचे काले गड्ढे पड़ चुके थे। इतनी फ़ुरसत के बावजूद चेहरे पर रंग- रोगन करवाने की उनकी इच्छा मर चुकी थी। चाणक्य जी की आंखें भींग गईं। विचलित मन से वह सोचने लगे कि इनके लिए क्या करूं और क्या- क्या करूं, क्या मरूं?

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घनघोर निराशा के इन क्षणों में भी चाणक्य जी के दिमाग में लाइट चमकी। उन्होंने कहा कि पहले तो माननीय बंगले में बैठे रहना बंद कीजिए। मूड ताजा करने के लिए हवाई जहाज लेकर गुजरात निकल पड़िये।आलोचकों की ऐसी-तैसी। इसके बाद चाणक्य जी कुछ रुके। उन्हें खयाल आया कि लगातार प्रधानमंत्री बने रहने का रिकॉर्ड बनाकर माननीय जी इंदिरा गांधी को तो पटखनी दे चुके हैं मगर उसका कोई फायदा नहीं हुआ। बात आई- गई हो गई। वैसे भी माननीय जी की असली समस्या नेहरू हैं। इन्हें नेहरू से बड़ा दिखने की खुजली चलती रहती है, जो लाइलाज हो चुकी है। इस खुजली पर मलहम लगाना फिलहाल जरूरी है!

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आखिर में टुन्नू -पुन्नू किस्म का विचार अलादीन के चिराग की तरह उनके दिमाग की अंधेरी कोठरी में प्रकट हुआ कि नेहरू जी यूं तो करीब 17 साल तक प्रधानमंत्री रहे और माननीय जी का तो अभी बारह साल में ही सिंहासन डोलने लगा है। इन्हें नेहरू जी से बड़ा साबित कैसे करें मगर मानते भी तो नहीं। बच्चे की तरह जिद पर अड़े हैं। कोई उपाय करना होगा वरना मेरा और राजनाथ सिंह का कद एक हो जाएगा। उन्हें आइडिया आया कि नेहरू जी के शुरू के कार्यकाल में पांच साल घटाए दिए जाएं क्योंकि आम चुनाव कांग्रेस ने पहली बार 1952 में लड़ा था। इस तरह माननीय जी को उनसे आगे निकाला जा सकता है। उनसे बड़े साबित होने की उनकी साध एक हफ्ते के लिए पूरी हो जाएगी। ये आइडिया आते ही चाणक्य जी की आंखों में चमक आ गई। माननीय जी इस चमक को लपक लिया और उछल पड़े! ईश्वर की दया से छत ऊंची थी वरना बाल रहित खोपड़ी से खून निकल टपकने लगता!

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चाणक्य जी ने माननीय जी को पूरा गणित समझाया तो माननीय जी ने खुश होकर चाणक्य जी को गले से उसी तरह लगा लिया, जिस तरह हाल ही में उन्होंने संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति को लगाया था। इतनी पुरानी दोस्ती के बावजूद चाणक्य जी को जीवन में पहली बार ऐसा सौभाग्य प्राप्त हुआ था। उन्होंने इच्छा प्रकट की कि माननीय जी इस दृश्य का रिटेक करें ताकि इसकी फोटो और रील बन सके मगर माननीय जी ने राष्ट्रीय सुरक्षा पर मंडराते हुए खतरे के मद्देनजर इस प्रस्ताव को ख़ारिज़ कर दिया!

तो इस तरह लोकतांत्रिक ढंग से चुने गए प्रधानमंत्री के रूप में माननीय जी इस दस तारीख को नंबर वन जाएंगे,जैसे कि साबुन और बिस्किट के ब्रांड हो जाते हैं। उस दिन जश्न होगा। मिठाई खाई और खिलाई जाएगी। प्रशंसा प्रस्ताव पारित होगा। गोदी चैनलों पर सुबह से रात तक माननीय की कीर्तिकथा दिखाई जाएगी। अखबार उनकी अखंड मंगल आरती उतारेंगे। और इस तरह माननीय जी नेहरू जी से आधा इंच बड़े हो जाएंगे। इसके बाद आप भूल गए क्या कि आपको ताली बजाना है।

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