विचार

उस सुबह युवा होना जन्नत का अहसास था

हुक्मरानों के लिए बेहतर होगा कि वे भारत का इतिहास पढ़ें, क्योंकि हमारी सियासत की तासीर हमेशा आंदोलनों से ही तय होती रही है।

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और सभी मांगे माने जाने के बाद जंतर-मंतर पर जश्न मनाते छात्र-युवा (फोटो - विपिन)
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और सभी मांगे माने जाने के बाद जंतर-मंतर पर जश्न मनाते छात्र-युवा (फोटो - विपिन) 

दिल्ली के जंतर-मंतर पर युवा भारत ने डेरा डाल दिया। भोर होते ही छात्र अपने बिस्तर समेटते। वे गाते, बहस करते और अपने जख्मों की मरहम-पट्टी करते। खुद पर ही तंज कसते हुए अपनी जमात को ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ कहते हैं। दरअसल, एक न्यायिक टिप्पणी में संघर्षरत युवाओं की तुलना तिलचट्टों से की गई थी। लेकिन इन युवाओं ने इस अपमान को ही अपना तमगा बना लिया और यही तंज एक ऐसा आंदोलन बन गया जिसने देश की राजधानी को बेचैन कर दिया।

इसकी तात्कालिक वजह नीट परीक्षा है- अकेली परीक्षा जो तय करती है कि कौन डॉक्टर बनेगा। प्रश्नपत्र लीक हो गए और लाखों छात्रों को दोबारा परीक्षा में बैठने पर मजबूर किया गया। सालों की तैयारी, परिवार की जिंदगी भर की बचत और युवाओं की उम्मीदें सरकारी नाकामी की भेंट चढ़ गईं। छात्र एक सीधा-सा सवाल पूछ रहे थे: अगर उन्हें नियमों का पालन करना है, तो क्या हुकूमत के लिए कोई नियम-कायदा नहीं? वे परीक्षा आयोजित करने वालों से जवाबदेही मांग रहे थे, और बदले में हुकूमत ने उन्हें धारा 144, आंसू गैस और लाठियां दी।

हुक्मरानों के लिए बेहतर होगा कि वे भारत का इतिहास पढ़ें। हमारी राजनीति हमेशा से आंदोलनों की राजनीति रही है। आजादी की लड़ाई केवल कमेटी रूमों में नहीं जीती गई थी। वह सड़कों पर, गांवों में और डांडी के नमक मैदानों में जीती गई थी। उसके बाद से हर पीढ़ी ने अपना एक आंदोलन पैदा किया, और हर आंदोलन का अंत राजनीतिक सत्ता के नए संतुलन के रूप में हुआ।

साठ-सत्तर के दशक के जेपी आंदोलन ने कांग्रेस के एकाधिकार को तोड़ा। मंडल आंदोलन ने सामाजिक सत्ता के नक्शे को नए सिरे से उकेरा। 2011 के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने एक नई पार्टी को जन्म दिया और पुरानी सरकार को दफ्न कर दिया। आंदोलन ही वह जरिया हैं जिनसे भारत शासक और शासित के बीच के रिश्तों की शर्तों को नए सिरे से तय करता है।

इतिहास के सबसे बड़े बदलाव पर गौर कीजिए। 1920 तक भारतीय राजनीति विशुद्ध रूप से शिष्ट तौर-तरीके पर केन्द्रित थी। कांग्रेस याचिकाएं देती, ज्ञापन सौंपती और इंतजार करती। उसके नेता ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर ही धीरे-धीरे सुधार, सत्ता में भागीदारी और समय के साथ डोमिनियन स्टेटस चाहते थे। फिर दक्षिण अफ्रीका से गांधी आए और उन्होंने आंदोलन का पूरा मिजाज ही बदल दिया। असहयोग आंदोलन ने आम भारतीयों से अपील की कि वे अंग्रेजी हुकूमत को अपनी मूक मंजूरी देना बंद करें। सविनय अवज्ञा ने उनसे अन्यायपूर्ण कानूनों को खुलेआम तोड़ने और मुस्कुराते हुए सजा भुगतने का आह्वान किया। 

महज एक दशक के भीतर आंदोलन की मांग ‘धीमी प्रगति’ से बदलकर ‘पूर्ण स्वराज’ तक पहुंच गई। जो कल तक ‘प्रजा’ थे, वे दावेदार बन गए। ब्रिटिश राज इस झटके से कभी उबर नहीं सका। आंदोलन यही करते हैं- वे केवल मांग नहीं रखते, बल्कि यह भी बदल देते हैं कि लोग खुद को किस बात का हकदार मानने लगे हैं।

जंतर-मंतर पर डटे ये युवा उसी परंपरा में खड़े रहे- चाहे वे यह जानते हों या नहीं। और वे किसी क्रांति की मांग नहीं कर रहे थे। एक दशक पहले, एक युवा छात्र नेता कन्हैया कुमार को उन नारों के लिए देशद्रोह के आरोपों का सामना करना पड़ा था जो उसने लगाए ही नहीं थे। उन्होंने इसका ऐसा जवाब दिया जो इतिहास में दर्ज होने के लायक है। उन्होंने कहा- ‘हमें भारत से नहीं बल्कि भारत में आजादी चाहिए।’ यानी भूख से, भ्रष्टाचार से, धांधली वाली परीक्षाओं से और छीने गए भविष्य से आजादी।

ठीक यही मांग आज की यह पीढ़ी कर रही है। वे तिरंगा लहराते हैं, संविधान की दुहाई देते हैं और इस गणराज्य से अपने ही वादों पर खरा उतरने की गुहार लगाते हैं। किसी भी हुकूमत को ऐसे देशभक्तों से डरना नहीं चाहिए; डरती केवल वही हुकूमत है जिसने जनता की बात सुनना बंद कर दिया हो।

इसके बावजूद हुकूमत का रवैया निराशाजनक रूप से औपनिवेशिक रहा है। अपनी ही संसद की ओर मार्च कर रहे निहत्थे छात्रों पर लाठियां बरसाई गईं। दर्जनों को अस्पताल जाना पड़ा। इंटरनेट बंद कर दिया गया, मानो अंधेरा उस सच को छिपा सकता है जिसे दिन के उजाले ने देखा हो। सोए हुए प्रदर्शनकारियों का कैंप उजाड़ दिया गया। एक बुजुर्ग गांधीवादी भूख हड़ताल पर बैठा हो और मंत्री नजरें फेरे रहे! यह किसी गणराज्य का नहीं, बल्कि ब्रिटिश ‘राज’ का स्वाभाविक चरित्र है। इसमें जनरल डायर की मानसिकता की बू आती है, जिसने जलियांवाला बाग में सोचा था कि ताकत का इस्तेमाल ‘देसियों’ को उनकी औकात सिखा देगा। डायर की गोलियों ने सैकड़ों लोगों को मार डाला, लेकिन उन्होंने उससे भी बड़ी किसी चीज का कत्ल कर दिया: निष्पक्षता के ब्रिटिश दावे का।

अमृतसर की घटना के बाद कोई भी भारतीय यह नहीं मान सकता था कि ब्रिटिश साम्राज्य न्यायप्रिय था। टैगोर ने अपनी ‘नाइटहुड’ की उपाधि लौटा दी, गांधी ने अपने पदक वापस कर दिए। हालांकि उसके बाद भी तिरंगा फहराने में 27-28 साल लग गए, लेकिन ब्रिटिश हुकूमत का नैतिक अधिकार जलियांवाला की धरती पर उसी दिन रक्त के साथ बह गया था। जो सरकारें सवालों का जवाब ताकत से देती हैं, वे सवालों को खत्म नहीं करतीं, वे अपनी ही वैधता का अंत कर देती हैं।

बुद्धिमानी का रास्ता वही पुराना संवैधानिक रास्ता ही है। युवाओं से बात कीजिए। परीक्षा तंत्र को दुरुस्त कीजिए। पेपर लीक करने वालों को सजा दीजिए, न कि उन छात्रों को जिनके पर्चे लीक हुए हैं। याद रखें, संवाद और समझाइश से पुनर्संतुलित हुई सत्ता बची रहती है, लाठी के दम पर बचाई गई सत्ता ढह जाती है।

मैंने कल रात जंतर-मंतर के वे फुटेज फिर से देखे-पट्टियों में बंधे सिर, उधार मांगकर लाए गए मेगाफोन और बेसुरा ही सही, पर पूरे दिल से राष्ट्रगान गाते युवा! मुझे वर्ड्सवर्थ की याद आ गई, जो पुरानी व्यवस्था को ढहाती एक पीढ़ी को देखकर लिख रहे थे: ‘उस भोर का साक्षी बनना ही परम आनंद था, लेकिन युवा होना तो साक्षात जन्नत का अहसास था।’ 

यह भोर इन्हीं युवाओं की है। हम बाकी लोगों में कम-से-कम इतनी शालीनता तो होनी चाहिए कि हम उनके उजाले के आड़े न आएं।

(संजय हेगड़े सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता हैं)

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