विचार

संगीत की धुन पर जब लोक चेतना से कस ली मुट्ठी

लोक सांस्कृतिक चेतना ने जनता के अहिंसक प्रतिरोध को नए स्वर और तेवर दिए हैं।

70 के दशक में चमोली के रेणी गांव की महिलाओं ने इतिहास रचा था
70 के दशक में चमोली के रेणी गांव की महिलाओं ने इतिहास रचा था  

गांव रेणी, जिला चमोली, 26 मार्च 1974

एक लड़की दौड़ती-हांफती-चीखती हुई गौरा देवी के आंगन में पहुंची- ‘जंगल काटने को आ गए वो ..., हमारा जंगल काट रहे वो!’

उस दिन गांव के सारे पुरुष किसी काम से चमोली गए थे। गौरा परेशान हो गईं। पुरुषों की अनुपस्थिति में गांव की जिम्मेदारी उन्हीं पर थी। वह महिला मंगल दल की अध्यक्ष जो थीं। उन्होंने गांव की सभी औरतों को इकट्ठा किया और आनन-फानन जंगल की ओर दौड़ीं। कोई पचास मजदूर पेड़ काटने की तैयारी में थे। ठेकेदार का मुंशी और दो-चार बंदूकधारी भी साथ थे।

गौरा ने मजदूरों से कहा- ‘देखो, हम तुमसे विनती करते हैं, हमारा जंगल मत काटो। जंगल के बिना हम, हमारे गोरू कैसे ज़िंदा रहेंगे?’

मुंशी चीखा- ‘कटान शुरू करो ... औरतों, तुम भागो यहां से।’

गौरा अड़ गईं- ‘यह जंगल हमारा है। तुमने क्या सोचा, आज गांव के आदमी बाहर गए हैं तो तुम जंगल काट लोगे?’

औरतों के सामने बंदूकें तान दी गईं। गौरा जोश में आ गईं। उन्होंने साथियों से कहा- ‘चलो, सब एक-एक पेड़ को अंग्वाल्ठा डाल दो ... देखें, ये कैसे काटते हैं पेड़!’ मजदूर जिस पेड़ को काटने जाते, औरतें उससे चिपक जातीं- ‘पेड़ काटने से पहले हमें काटो।’

स्त्रियों को बहुत डराया-धमकाया गया, लेकिन वे डटी रहीं। अंतत: बंदूकें झुक गईं। मजदूर लौट गए। जंगल बच गया।

यह ‘चिपको’ के विचार का जमीन पर उतरना था। चण्डी प्रसाद भट्ट और कई कार्यकर्ता ‘चिपको’ का संदेश लेकर गांव-गांव घूमा करते थे। गौरा देवी ने भी उनकी बातें सुनी थीं। उन्होंने ‘चिपको आंदोलन’ करके दिखा दिया।

28 नवंबर 1977

नैनीताल में कुमाऊं के जंगलों की नीलामी थी। कुछ मास पूर्व चंद लड़कों ने हंगामा किया तो नीलामी टालनी पड़ी थी। इसलिए इस बार भारी पुलिस बंदोबस्त था। विरोध करने वालों की गिरफ्तारी की तैयारी थी, लेकिन वे कहीं छुपकर विरोध का तरीका सोच रहे थे। सुबह फ्लैट्स में दाढ़ी वाला एक युवक हुड़का बजाकर कुमाऊंनी में गीत गाने लगा-

‘आज हिमालय तुम्हें पुकार रहा है,

जागो-जागो ओ मेरे लाल

मत होने दो मेरी नीलामी,

मत होने दो मुझे हलाल।’

पुलिस-पीएसी वालों ने समझा कि कोई भिखारी होगा, लेकिन वह गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा’ नाम के कवि थे, जिन्होंने रात में ही एक पुराने गीत में नए बंद जोड़ लिए थे। गीत पहाड़ वालों को ललकार रहा था कि वन बचाओ, पहाड़ बचाओ। पूरे नैनीताल में खबर आग की तरह फैल गई। जब तक प्रशासन समझ पाता, नीलामी हॉल में जनता एकत्र हो गई। इतना जबर्दस्त विरोध हुआ कि नीलामी रद्द करनी पड़ी थी।

प्रतिरोध के ये तरीके लोक जीवन से ही उपज सकते थे। इतिहास गवाह है कि लोक सांस्कृतिक चेतना ने जनता के अहिंसक प्रतिरोध को नए स्वर और तेवर दिए हैं। स्वतंत्रता संग्राम के दौर में जुलूसों और धरना-प्रदर्शनों में कितने जोशीले गीत गाए जाते थे! वह सिलसिला आज तक जारी है।

कई राज्यों, विशेष रूप से आदिवासी बहुल प्रदेशों के जनांदोलनों में लोक गीतों एवं स्वरचित गीतों के साथ लोक वाद्यों ने ऐसा समा बांधा कि देखने-सुनने वाले भी आंदोलनकारी बनते गए। प्रगतिशील संगठनों, उनकी ट्रेड यूनियनों और ‘इप्टा’ ने प्रतिरोध के गीतों को देश भर में लोकप्रिय बनाया। फैज़, साहिर, जाफरी, शैलेंद्र, ‘शलभ’, गोरख, ‘चीमा’, इत्यादि के गीत प्रत्येक आंदोलन को त्वरा और तेवर देते हैं। जुलूसों में तुरही, निशाण, ढोल-दमामा, आदि लोकवाद्य सत्ताधीशों के कान गुंजाते हैं। यही धारा प्रतिरोधी चेतना जगाने वाले नुक्कड़ नाटकों, नारों और पोस्टरों तक जाती है।

यह गांधी का ही दिखाया रास्ता है, जिसमें लोक चेतना ने और ताकत भर दी है।

जंतर मंतर के हालिया प्रदर्शन में ‘जेन ज़ी’ को भी ढपली लेकर गीत गाते देखना आह्लादकारी था। हाथों में रचनात्मक नारे एवं पोस्टर भी थे। विद्यार्थियों के इस प्रतिरोध ने निरंकुश और तानाशाही प्रवृत्ति वाली नरेन्द्र मोदी सरकार को झुकने पर मजबूर कर दिया। सत्ता का अहंकार चूर-चूर हुआ।

उसी समय यह सरकार मध्य प्रदेश में केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट का विरोध कर रहे आदिवासियों-ग्रामीणों के प्रतीकात्मक ‘चिता’ और ‘फांसी’ आंदोलन को कुचल रही थी। हजारों आदिवासियों को बिना पर्याप्त मुआवजा दिए उजाड़ने, जंगल काटने और पन्ना टाइगर प्रोजेक्ट तक को नुकसान पहुंचाने वाले इस प्रोजेक्ट के विरोध के लिए वे ‘जल-समाधि’ लेने जैसा अहिंसक प्रतिरोध कर रहे थे। उनका आंदोलन अब भी जारी है।

नर्मदा बचाओ आंदोलन में भी हमने प्रतिरोध के ऐसे तरीके देखे। हजारों आदिवासियों ने विस्थापन और अपर्याप्त मुआवजे के विरोध में सामूहिक जल-समाधि का प्रदर्शन किया। उन्होंने अपने अभिनव प्रतिरोध से कई मोर्चों पर जीत हासिल की। ऐसे प्रतिरोधों की सबसे बड़ी उपलब्धि सीधे-सादे ग्रामीणों-आदिवासियों का अपने अधिकारों के प्रति सचेत होना और अंतिम दम तक जूझने का संकल्प पाना था।

‘हमारे पास एक नदी है और तुम हमें हैंडपम्प दे रहे हो?’ एक सीधी-सादी आदिवासी महिला ने जब अफसरों के सामने कहा था तो उनकी बोलती बंद हो गई थी। ऐसी बात कोई शहरी आंदोलनकारी नहीं कह सकता था। यह प्रतिरोधी लोक चेतना थी- ‘दिल्ली में भी यमुना नदी है। आप बिजली बनाने के लिए उस पर बांध क्यों नहीं बना लेते? दिल्ली को क्यों नहीं डुबाते?’ इस मासूम लेकिन सशक्त प्रतिरोधी सवाल का किसी के पास कोई उत्तर हो सकता है भला?

नर्मदा आंदोलन के ही एक और सामान्य कार्यकर्ता, चिमलखेड़ी (महाराष्ट्र) के आदिवासी बिज्या जुगल वसावे ने कहा था- ‘हम उपवास और पदयात्रा जैसी रणनीतियों के बारे में पहले नहीं जानते थे। हमारे पास लड़ने को तीर-कमान जैसे पारंपरिक हथियार थे। लेकिन अब हमने वह सब छोड़ दिया और गांधी जी के सत्याग्रह का मार्ग पकड़कर अपने अंदर की आवाज़ और उठी हुई मुट्ठी को अपना नया हथियार बना लिया है।’

अपनी वाजिब मांगों के लिए उपवास, पदयात्रा एवं गीत-संगीत के साथ उठी हुई मुट्ठी से अधिक प्रभावशाली तरीका और क्या हो सकता है! आज हमारा लोकतंत्र और संवैधानिक मूल्य खतरे में हैं लेकिन जनता के पास प्रतिरोध के ऐसे नायाब अहिंसक तरीके हैं जिनके सामने कितनी भी क्रूर औरताकतवर सत्ता अधिक दिन नहीं टिक सकती।

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