विचार

आम बजट 2026: धनी वर्ग के लिए और कार्पोरेट के हित में 'सुधार-सुधार' की रट

2026 का बजट आर्थिक नीतियों के विराधाभासों को और बढ़ाने वाला है और सुधार-सुधार की जो रट लगाई जा रही है, वह बेमानी है।

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Getty Images Hindustan Times

पहली फरवरी को 2026 के लिए पेश केन्द्रीय बजट और उससे एक दिन पहले के आर्थिक सर्वे में बार-बार एक शब्द का जिक्र आता है- सुधार। सर्वे के हर चैप्टर में इसका जिक्र है और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जोर देकर कहते हैं कि ‘आज भारत रिफॉर्म एक्सप्रेस पर सवार है’। आखिर ‘सुधार’ का मतलब क्या है? क्या इसका मतलब नीति निर्माताओं की सोच की तरह ही संकीर्ण है, या फिर इसका आशय कुछ व्यापक है?

सर्वे में पहले से चल रहे सुधारों पर जोर दिया गया है - पीएलआई (प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव), उदार एफडीआई (फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट), लॉजिस्टिक्स का आधुनिकीकरण, टैक्स को आसान बनाना, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार, श्रम कानूनों में बदलाव, कौशल विकास अभियान, महिला श्रम बल की बेहतर भागीदारी, बुनियादी ढांचे का विस्तार, और कारोबार शुरू करने और बंद करने में आसानी। संदेह नहीं कि यह प्रभावशाली सूची है, जिसे हालिया आर्थिक वृद्धि और जीडीपी विकास को 7 फीसद के संभावित स्तर तक ले जाने का श्रेय दिया जाता है। लेकिन, इस मामले में सावधानी जरूरी है। क्या ये सुधार सच में नतीजे दे रहे हैं?

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पहली बातः आईएमएफ (इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड) ने बार-बार कहा है कि भारत के जीडीपी आंकड़ों में विश्वसनीयता की कमी है। इसने भारत के अर्थव्यवस्था को मापने के तरीके में तमाम खामियां गिनाईं, खासकर अनौपचारिक क्षेत्र के मामले में। ज्यादातर उपलब्ध आंकड़े औपचारिक क्षेत्र के हैं। इसलिए विकास की असली तस्वीर नहीं आती। सर्वे में इस बारे में कुछ नहीं कहा गया है। यह न तो जीडीपी आंकड़ों में गलतियों के बारे में कोई सफाई देता है और न यह साफ करता है कि सुधारों से अच्छी ग्रोथ हुई या नहीं।

दूसरी बातः दावों के बावजूद, जीडीपी में मैन्युफैक्चरिंग का हिस्सा घटकर तकरीबन 12 फीसद रह गया है। पीएलआई स्कीम अपने लक्ष्य से बहुत पीछे है, चार सालों में आवंटित फंड का मुश्किल से 10 फीसद ही बांटा गया। इसी तरह, कौशल विकास स्कीम भी लक्ष्य से पीछे है, कुशल मजदूरों को सही नौकरियां नहीं मिल रही हैं। ईएलआई (एम्प्लॉयमेंट लिंक्ड इंसेंटिव) के तहत शुरू की गई स्कीम, जिन्हें बड़े धूमधाम से घोषित किया गया था, मुश्किल से शुरू हो पाई हैं। इसे छिपाने के लिए, मामूली रोजगार और बिना वेतन वाले काम को गिना जा रहा है - ये ऐसे तरीके हैं जो आईएलओ की परिभाषा के खिलाफ हैं। एनएचएफएस आंकड़ों की गलत तुलना के आधार पर गरीबी कम होने का दावा किया जा रहा है।

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तीसरी बातः बजट में घोषित टैक्स कटौती संगठित क्षेत्र और अमीर लोगों के हित में है। आयकर छूट सीमा बढ़ाकर 12.75 लाख रुपये करने से सिर्फ आबादी के शीर्ष 1-2 फीसद लोगों को ही फायदा होता है। मध्यम वर्ग, खासकर 7 लाख से 12 लाख रुपये की आय वाले लोगों को बहुत कम फायदा है। प्रत्यक्ष कर संग्रह में तकरीबन 2 लाख करोड़ रुपये की कमी आई है, जिससे शिक्षा और स्वास्थ्य पर सार्वजनिक खर्चे पर असर पड़ा है। 

चौथी बातः जीएसटी में कटौती से मुख्य रूप से संगठित क्षेत्र को मदद मिलती है, यानी उन्हें जो सबसे ज्यादा जीएसटी देते हैं। इसका असर यह होता है कि उनके उत्पाद असंगठित क्षेत्र की तुलना में सस्ते हो जाते हैं। इसलिए, ज्यादा मांग संगठित क्षेत्र की ओर जाने से खपत बढ़ सकती है, लेकिन असंगठित क्षेत्र की आय पर इसका बुरा असर पड़ता है।

पांचवीं बातः भारत में काले धन की बड़ी अर्थव्यवस्था कर और नियामक ढांचे से बच जाती है जिससे सुधारों की प्रभावशीलता कम हो जाती है। जीडीपी के मुकाबले प्रत्यक्ष कर का अनुपात 6.5 फीसद है जो दुनिया के चंद सबसे कम है। इससे पता चलता है कि हमारे यहां काले धन का विस्तार कैसा है। यह संभावित विकास दर को भी कम करता है जिसे आर्थिक सर्वे में शामिल नहीं किया गया है।

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छठी बातः नए लेबर कोड और मनरेगा को बदलने से किसानों और ट्रेड यूनियन वाले मजदूरों की पहले से ही कम मोलभाव की ताकत और कमजोर हो जाएगी। ये दोनों बदलाव पक्के तौर पर ईयू और अमेरिका के दबाव में किए गए हैं, क्योंकि दोनों ही भारतीय बाजारों में पहुंच चाहते हैं। कृषि उपज की कीमतें न्यूनतम समर्थन मूल्य (जिन फसलों के लिए घोषित किया गया है) से और नीचे गिर जाएंगी और गैर-खेती वाले उत्पादकों का मुनाफा कम हो जाएगा।

ये सुधार न सिर्फ बिजनेस, बल्कि अमीरों के हित साधने वाले हैं। हवाई यात्रा और महंगी डीलक्स ट्रेनों को बढ़ावा दिया जा रहा है, जबकि आम लोगों को ट्रेनों और बसों में ठूंस दिया जाता है। एलीट प्रोजेक्ट्स और निजीकरण के जरिये निजी कारोबार को बढ़ावा दिया जा रहा है। बजट में पांच यूनिवर्सिटी टाउन बनाने की घोषणा की गई - यह भी एक धोखा है, क्योंकि मौजूदा शीर्ष यूनिवर्सिटी को खत्म किया जा रहा है।

सरकार का लोकतंत्र विरोधी रवैया तब बिल्कुल साफ हो जाता है जब वह आरटीआई को कमजोर करने, नीतियों की जांच करने और नीति बनाने वाले ऊंचे पदों पर बैठे लोगों के जन-विरोधी रवैये को उजागर करने के लोगों के अधिकारों में कटौती करने का प्रस्ताव लेकर आती है। देश के अमीर लोग मजदूरों के कितने खिलाफ हैं, यह बात तब फिर से साफ हो गई जब हमारी संवैधानिक अदालत के एक बड़े अधिकारी ने खुलेआम फैक्ट्रियों के बंद होने और अपर्याप्त औद्योगीकरण के लिए मजदूरों को जिम्मेदार ठहराया। यह तर्क हमारे संविधान में सभी को जीने लायक मजदूरी देने के वादे को पूरी तरह नजरअंदाज करता है।

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बजट रोजगार बढ़ाने के तरीके के तौर पर पर्यटन को बढ़ावा देता है। क्या इससे व्यावसायीकरण नहीं बढ़ेगा और स्थानीय संस्कृति खत्म नहीं हो जाएगी? सरकार बात तो स्वदेशी और आत्मनिर्भरता की करती है, लेकिन इसके साथ ही मुक्त व्यापार को भी बढ़ावा देती है। हमारे कमजोर अनुसंधान और विकास (आर एंड डी) आधार को देखते हुए, क्या यह आशंका नहीं पैदा होती कि भारत दलदल में फंस जाएगा जैसा कि पिछले मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) के मामले में हुआ? चीन बिना एफटीए ही हम पर हावी हो जाता है। इस चुनौती का सामना करने के लिए शिक्षा पर ध्यान देने की जरूरत है, लेकिन इस सेक्टर में कम निवेश और गैर-वैज्ञानिक विचारों को बढ़ावा देने से इनोवेशन की प्रेरणा कमजोर होती है।

साफ है, भारत मांग की समस्या से जूझ रहा है। इसके लिए सरकार को असमानता कम करने वाली नीतियां बनानी होंगी। लेकिन बजट ठीक इसका उल्टा करता है, उन्हीं को ज्यादा देता है जो ग्रोथ का फायदा उठा रहे हैं। हाशिये पर पड़े लोगों को अच्छी क्वालिटी की नौकरी चाहिए, लेकिन इस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है क्योंकि ज्यादा संसाधन तो संगठित क्षेत्र में लगाए जा रहे हैं।

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भाई-भतीजावाद को बढ़ावा देने से निवेश का माहौल खराब होता है। जब शासक बिजनेस में अपने पसंदीदा लोगों को चुनते हैं, तो बाकी लोग असुरक्षित महसूस करते हैं। हैरानी नहीं है कि ज्यादा नेट वर्थ वाले लोग देश छोड़कर जा रहे हैं।

सच्चे सुधारों से सबको बराबर का मौका मिलेगा, हाशिये पर पड़े समूहों को सही मौके मिलेंगे, अनौपचारिक कामगारों को ताकत मिलेगी और शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्र में सरकारी निवेश बढ़ेगा। यहां तो एक दुःष्चक्र चल पड़ा है- जो लोग सिस्टम से फायदा उठा रहे हैं, वे और ज्यादा मांग रहे हैं और उन्हें मिल भी रहा है। दूसरी ओर, हाशिये पर पड़े लोग और बुरी स्थिति में पहुंच रहे हैं। यही बढ़ती असमानता की जड़ है और इसीलिए तथाकथित सुधार से होना-जाना कुछ नहीं। 

(अरुण कुमार जेएनयू में अर्थशास्त्र के पूर्व प्रोफेसर और ‘इंडियन इकोनॉमीज ग्रेटेस्ट क्राइसिस: इम्पैक्ट ऑफ द कोरोनावायरस एंड द रोड अहेड’ किताब के लेखक हैं)

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