
राष्ट्रवादी जी के पजामे को बार-बार नीचे खिसकने की गंदी आदत थी। चाहे वे कितनी ही होशियारी और सावधान बरतें, पजामा नीचे खिसके बिना मानता नहीं था। शक था कि राष्ट्रवाद के विरुद्ध यह सेकुलरों का षड़यंत्र है मगर सरकार ने कभी इसकी जांच सीबीआई से करवाने की आवश्यकता नहीं समझी!
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खुशकिस्मती से राष्ट्रवादी जी इतने जागरूक थे कि पजामे के नीचे गिरने से ऐन पहले स्थिति संभाल लेते थे। नाड़ा दुबारा कस लेते थे। ऐसी चुनौती घंटे-दो घंटे में एक बार आ जाती थी और सफलतापूर्वक संभाल ली जाती थी।
वे राष्ट्रवादी थे तो राष्ट्र हित में उन्हें बार -बार भाषण देना पड़ता था। यह उनका राष्ट्रीय कर्तव्य था लेकिन जब भाषण अपने शिखर पर पहुंचने लगता था, तभी पजामे को न जाने कैसे यह पता चल जाता था और वह नीचे खिसकने के लिए दौड़ने लगता था। उन्हें भाषण बीच में रोक कर नाड़ा कसने पर ध्यान केंद्रित करना पड़ता था। इस दृश्य का आनंद मंच पर बैठे और मंच से नीचे बैठे या खड़े लोग लेते थे, कुछ सीटियां बजाकर अपनी खुशी जाहिर करते थे मगर ध्यानस्थ होकर वह अपना काम करते रहते और बुरा माने बगैर भाषण पुनः आरंभ कर देते थे।
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यहां तक स्थिति आ जाती थी कि जब वह भाषण देने खड़े होते थे तो नीचे से कुछ श्रोता चिल्लाते थे- 'पहले नाड़ा कस लो '। कुछ इसका विरोध करते थे, नहीं राष्ट्रवादी जी,अभी नहीं, भाषण के बीचोंबीच उचित समय पर कसिएगा।
वह मुस्कुराते थे और दूसरी तरह के श्रोताओं की मांग को पूरा करते हुए अधबीच में नाड़ा कसते थे। ऐसा भी कभी-कभी होता था कि उनसे पहले के वक्ता को आमंत्रित करने के समय कार्यक्रम का संयोजक उन्हें चेतावनी दे देता था कि इनके बाद आपको बोलना है, इस बीच आप ठीक से नाड़ा कस लें। ऐसा करने पर भी होनी होकर ही रहती थी।
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उनके भाषण से पहले भीड़ यह देखने के लिए जुटती थी कि इनका नाड़ा कब ढीला होगा? इस दृश्य को देखने की आशा में श्रोता- दर्शक आते थे और राष्ट्रवादी जी उन्हें निराश नहीं करते थे! राष्ट्रवाद के सामने उपस्थित तमाम दुराशाओं के बीच इस तरह वह आशा के एकमात्र द्वीप बने हुए थे। कुछ लोग मानते थे कि वह अपनी छवि बनाने के लिए मंच पर जान- बूझकर ऐसी हरकत करते हैं। इस तर्क में भी जान थी।
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जनता ने उनका उपनाम नाड़ावाला रख रखा था और राष्ट्रवादी जी इतने अधिक राष्ट्रवादी थे कि उन्होंने इसे सहर्ष कुबूल कर लिया था।अब उनका पूरा नाम नहीं लिया जाता था। नाड़ावाला कहते ही श्रोताओं में हर्ष की लहर दौड़ जाती थी और वह बड़ी शान से मुस्कुराते हुए सब श्रोताओं को नमस्कार करते हुए माइक संभाल लेते थे और तालियों के थमने का इंतजार करते थे। उनके आने पर इतनी तालियां बजती थीं कि इतनी तो प्रधानमंत्री के भाषण के पहले और बाद में भी नहीं बजती थीं।
पार्टी का एक वर्ग इस कारण उनके खिलाफ हो चला था। वह इन्हें पार्टी से निकालने की मांग करने लगा था मगर इस डर से कि वह कहीं पलटकर धर्मनिरपेक्ष न हो जाएं, इस कारण सुस्त पड़ जाता था। राष्ट्रवादियों ने हाईकमान की चेतावनी के बाद उन्हें निकालने की यह मुहिम बंद-सी कर रखी थी।
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प्रधानमंत्री तक उनकी यह ख्याति पहुंची तो एक सभा में भाषण देने के लिए राष्ट्रवादी जी को बुलाया गया। आश्वस्त हो जाने के बाद कि बंदा इस प्रकार राष्ट्रवाद का प्रचार- प्रसार में राष्ट्रीय स्तर पर उपयोगी साबित हो सकता है, उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया गया। उनसे कहा गया कि आपका एकमात्र काम हर रैली में प्रधानमंत्री के आगमन से पहले अपने भाषण के दौरान कम से कम दो बार नाड़ा कसने के लिए भाषण रोकना और ताली बजवाना है। बाकी मंत्री पद का काम आपको गाड़ी -बंगला की सुविधा प्रदान करने के लिए दिया गया है। काम की आप बिलकुल चिंता न करें और चिंता करेंगे तो पद गंवा बैठेंगे। बस जहां कहा जाए, वहां दस्तखत कर दें!शेष काम प्रभु पर छोड़ें।
अब तो पूरे देश में उनकी धूम मच गई थी। अनेक राष्ट्रवादी यह शैली अपनाने लगे थे मगर जो बात ओरिजनल में होती है, वह नकलों में नहीं थी।ऐसे नकलबाजों का विकास जिला स्तर से आगे नहीं हो सका था। इस तरह पार्टी बढ़ने लगी, राष्ट्रवाद का विकास होने ल
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