विचार

पश्चिम एशिया पर फिर मंडराते युद्ध के बादल

ट्रंप का यह खतरनाक और कुटिल खेल हो सकता है कि एमबीएस को मजबूरन इसराइल की झोली में धकेल दिया जाए। अपने ही एक पुराने सहयोगी को जान-बूझकर असुरक्षा की आग में झोंक देना ताकि वह डरकर अपनी कूटनीतिक निष्ठाएं बदल ले-यह जोखिम भरा दांव है।

फोटो: Getty Images
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लाल सागर के किनारे हूतियों की तेज बढ़त, बाब अल-मंदाब जलडमरूमध्य पर उनका नियंत्रण और सऊदी अरब पर मिसाइल एवं ड्रोन हमलों ने ईरान और अमेरिका के बीच भड़कते टकराव में नया मोर्चा खोल दिया है। यह यमन गृहयुद्ध का दोहराव भर नहीं है; यह अमेरिका-ईरान युद्ध के अगले खूनी दौर का संकेत है, और डॉनल्ड ट्रंप इस आग से बेहद खतरनाक सियासी खेल खेल रहे हैं।

युद्ध के शुरुआती महीनों में हूती लड़ाके सीधे टकराव से दूर रहे, जबकि हिजबुल्ला और इराक में मौजूद ईरान-समर्थक गुट लड़ाई में कूद पड़े थे। लेकिन संयम का वह दौर खत्म हो चुका है। हूतियों ने यमन के पश्चिमी तट के रणनीतिक रूप से अहम इलाकों पर तेजी से कब्जा जमाया है और बाब अल-मंदाब के आसपास अपनी पकड़ बेहद मजबूत कर ली है- यह वही जलमार्ग है जिससे होकर सामान्य दिनों में दुनिया के कुल व्यापार का करीब 10 फीसद हिस्सा गुजरता है। उन्होंने सऊदी जहाजों पर हमले बोले हैं और रियाद, यानबू समेत इस रेगिस्तानी मुल्क के अन्य ठिकानों पर मिसाइलें एवं ड्रोन दागे हैं।

भौगोलिक परिस्थितियों ने संकट को और भयावह बना दिया है। ईरान पहले ही होर्मुज जलडमरूमध्य से होने वाली जहाजों की आवाजाही को अस्त-व्यस्त कर चुका है। सऊदी अरब ने इसके जवाब में अपनी ‘ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन’ पर निर्भरता बढ़ा दी थी, जो पूर्वी तेल क्षेत्रों से कच्चे तेल को पूरे देश के आर-पार लाल सागर तट पर स्थित यानबू तक पहुंचाती है। लेकिन अब यह वैकल्पिक मार्ग भी खतरे की जद में है। इस पाइपलाइन पर हमले हुए हैं और हूती अब बाब अल-मंदाब से गुजरने वाले सऊदी तेल टैंकरों को निशाना बनाने की कहीं ज्यादा मजबूत स्थिति में आ गए हैं।

इस तरह सऊदी अरब अपने पूर्वी और पश्चिमी दोनों तेल-निर्यात मार्गों पर एक साथ भारी दबाव और घेराबंदी का सामना कर रहा है। इसके बावजूद, उसका सबसे बड़ा ‘सुरक्षा के बदले तेल’ वाला ऐतिहासिक साझेदार अमेरिका हाथ पर हाथ धरे खड़ा है। वह खुफिया जानकारियां तो दे रहा है, लेकिन ट्रंप ने सीधे सैन्य हस्तक्षेप से इनकार कर दिया है। इसके साथ ही, वाशिंगटन ओमान के जरिये हूतियों से गुप्त बातचीत में जुटा है। हूतियों ने अमेरिका को भरोसा दिलाया है कि उसके जहाजों पर हमले नहीं होंगे और उनका निशाना सिर्फ सऊदी अरब है। रियाद के हुक्मरानों के लिए यह स्थिति बेहद बेचैन करने वाली और पीठ में छुरा खाने जैसी है।

सऊदी अरब में अमेरिकी सैन्य ठिकाने हैं, वह अमेरिकी हथियारों का सबसे बड़ा खरीदार है और उसने अपनी पूरी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति वाशिंगटन के साथ रिश्तों की धुरी पर खड़ी की। लेकिन ट्रंप का अपना चुनावी गणित है, जिसमें वह अमेरिका में होने वाले मध्यावधि चुनावों के ऐन पहले युद्ध का नया मोर्चा खोलने के सियासी नुकसान का नफा-नुकसान तौल रहे हैं। वैसे भी, ट्रंप के नजरिये में बीते कल हुए समझौते आज की राह में अड़ंगा नहीं बन सकते।

क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान इस कड़वी हकीकत को बखूबी जानते हैं। साल 2019 में जब अबकैक स्थित सऊदी तेल प्रतिष्ठानों पर ड्रोन हमले हुए थे, तब भी ट्रंप ने सैन्य मदद से मना कर दिया था। उस कड़वे तजुर्बे ने ही रियाद को तेहरान के साथ संबंध सुधारने और अपनी सुरक्षा साझेदारियों का दायरा बढ़ाने के लिए मजबूर किया था।

सऊदी अरब देख रहा है कि अमेरिकी सुरक्षा गारंटी का व्यवहार में कोई मतलब नहीं रहा। ट्रंप ने खाड़ी सहयोगियों को ईरान के साथ युद्ध के खौफनाक नतीजों से अकेले निपटने के लिए छोड़ दिया है। हूतियों के खिलाफ सीधे युद्ध में न कूदने के उसके फैसले के पीछे गहरा सियासी गणित काम कर रहा है। इसराइल में 27 अक्तूबर को आम चुनाव होने हैं। नेतन्याहू कड़े मुकाबले में फंसे हैं। उनकी पूरी राजनीतिक पहचान और प्रासंगिकता इस दावे पर टिकी है कि केवल उनके पास ही ईरान से टकराने और इस अशांत क्षेत्र में इसराइल को महफूज रखने का संकल्प और तजुर्बा है।

हूतियों के खिलाफ सीधे उतरने से ट्रंप की यह हिचकिचाहट सऊदी अरब पर दबाव बढ़ाती है कि वह सैन्य मदद के लिए कहीं और नजरें दौड़ाए। इसराइल के पास वह खुफिया तंत्र, वायुसेना और मिसाइल-रोधी रक्षा क्षमताएं हैं जिनकी रियाद को सख्त दरकार है। अगर सऊदी अरब हूतियों के खिलाफ इसराइल से मदद मांगने को मजबूर होता है, तो नेतन्याहू इस सहयोग को इस बात के सबूत के तौर पर भुना सकते हैं कि समूचे क्षेत्र की सुरक्षा के लिए इसराइल अपरिहार्य हो चुका है।

ट्रंप की रणनीति चुनावी समय के एक दूसरे पहलू पर भी टिकी है। ईरान युद्ध अमेरिका में बेहद अलोकप्रिय हो चुका है और यही वजह है कि घरेलू मोर्चे पर ट्रंप की अपनी लोकप्रियता रसातल में पहुंच गई है। पश्चिम एशिया में युद्ध के मोर्चे को और फैलाना नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों में उनकी पहले से धुंधली संभावनाओं को और गर्त में धकेलना होगा। इसलिए वह फिलहाल कदम पीछे खींच रहे हैं, लेकिन उन्हें यह कहते सुना गया है कि ईरान संघर्ष मध्यावधि चुनावों के ‘तुरंत बाद’ खत्म हो जाएगा। इसका सीधा मतलब यह है कि वह युद्ध की आंच को दोबारा भड़काने के लिए शायद चुनावों के गुजरने का इंतजार कर सकते हैं।

बहरहाल, ईरान एक और बड़े दौर के लिए कमर कसता दिख रहा है; उसके पास यह मानने के पुख्ता कारण हैं कि ट्रंप कूटनीति का रास्ता चुनेंगे या अपने वादों का सम्मान करेंगे, इस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। हालांकि पाकिस्तान और कतर के जरिये कुछ राजनयिक चैनल अब भी खुले हैं, लेकिन ईरान के सैन्य नेतृत्व ने सख्त चेतावनी दी है कि नए अमेरिकी हमलों का जवाब समूचे क्षेत्र में अमेरिकी हितों पर बड़े पैमाने पर जवाबी तबाही से दिया जाएगा।

हूती केवल ईरान के हाथों में नाचने वाली कठपुतली नहीं हैं। उनकी अपनी कट्टर विचारधारा, घरेलू जनाधार और स्वतंत्र रणनीतिक मकसद हैं। लेकिन उनके इस आक्रामक अभियान से तेहरान की सौदेबाजी की ताकत निसंदेह कई गुना बढ़ गई है। खबरें हैं कि सऊदी अरब के पास मिसाइल-रोधी इंटरसेप्टर हथियारों का टोटा पड़ गया है और उसने ब्रिटेन, फ्रांस, पाकिस्तान तथा मिस्र से फौरी इमदाद मांगी है। खुद अमेरिका का अपना हथियारों का जखीरा महीनों से चल रहे युद्ध के कारण दबाव में आ चुका है।

मोहम्मद बिन सलमान इस युद्ध की तबाही की कीमत को अच्छी तरह समझते हैं। सऊदी अरब के आर्थिक कायाकल्प का उनका खाका ‘विजन 2030’ पूरी तरह राजनीतिक स्थिरता, विदेशी निवेश और तेल के निर्बाध व भरोसेमंद निर्यात पर निर्भर है। ईरान के साथ सुलह, यमन में सऊदी दखल को समेटना और देश के सुरक्षा ढांचे की नए सिरे से ओवरहालिंग-ये सब उसी क्षेत्रीय युद्ध को टालने की कोशिशें थीं जो उनके आर्थिक सपनों को चकनाचूर कर सकता है।

तमाम सावधानियों के बावजूद सऊदी अरब खुद को अकेला और असुरक्षित पा रहा है। यहां तक कि तुर्किए और पाकिस्तान के साथ उसके नए सुरक्षा समझौतों (मक्का पैक्ट) से भी कोई ठोस सैन्य सुरक्षा छतरी नहीं मिल सकी है। खाड़ी में ईरान रियाद पर दबाव बना सकता है; और दूसरे छोर पर यमन से हूती उसे कभी भी दहला सकते हैं। वाशिंगटन सीधे तौर पर मैदान में उतरने से इनकार कर रहा है। ऐसे हालात सऊदी अरब को न चाहते हुए भी इसराइल से मदद मांगने को मजबूर करते हैं।

नेतन्याहू का इसमें साफ राजनीतिक स्वार्थ है कि वह यह दिखा सकें कि इसराइल के साथ हाथ मिलाने से ही अरब सरकारों को ईरान और उसके सहयोगियों से सुरक्षा मिल सकती है। लेकिन इसराइल से सीधी सैन्य सहायता स्वीकार करना एमबीएस के लिए ऐसा सियासी बारूदी मैदान है जहां कदम-कदम पर खतरा है। खासकर जब फिलिस्तीन का सवाल अरब जनता के जेहन में इतने चरम पर हो, तो इसराइल के पाले में खड़े दिखना तुर्किए और पाकिस्तान के साथ सऊदी अरब की साझेदारियों को हमेशा के लिए तबाह कर सकता है।

ट्रंप का यह खतरनाक और कुटिल खेल हो सकता है कि एमबीएस को मजबूरन इसराइल की झोली में धकेल दिया जाए। अपने ही एक पुराने सहयोगी को जान-बूझकर असुरक्षा की आग में झोंक देना ताकि वह डरकर अपनी कूटनीतिक निष्ठाएं बदल ले-यह जोखिम भरा दांव है। वाशिंगटन इस दबाव से भड़कने वाले अनपेक्षित नतीजों को कभी पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर पाएगा।

(अशोक स्वैन स्वीडन की उप्सला यूनिवर्सिटी में पीस एंड कॉन्फ्लिक्ट रिसर्च के प्रोफेसर हैं)

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