
अगर 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में बीजेपी की जीत राज्य के इतिहास में एक अहम मोड़ के तौर पर याद की जाएगी, तो वजह सिर्फ यह नहीं होगी कि पार्टी को भारी बहुमत (294 में से 207 सीटें) मिला, या यह कि उसने ममता बनर्जी के 15 साल के शासन का खात्मा कर दिया। बल्कि नतीजों के बाद भड़की हिंसा, विजेताओं के जश्न में दिखी अश्लीलता और शहर के मशहूर ‘न्यू मार्केट’ में मांस की दुकानों पर चले बुलडोजर के लिए भी याद किया जाएगा, जिसके संकेत शुरुआत में ही मिलने लगे थे कि राज्य किस दिशा में आगे बढ़ रहा है।
पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट का ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (एसआईआर) भी आसानी से भुलाया नहीं जाएगा। 23 और 29 अप्रैल को दो चरणों में हुए चुनावों तक भारत का चुनाव आयोग वोटर लिस्ट से लगभग 91 लाख नाम हटाने में कामयाब हो चुका था। यह राज्य के कुल वोटरों का लगभग 12 प्रतिशत है, जिसके बाद वोटरों की संख्या एसआईआर पूर्व की अपेक्षा लगभग 7.66 करोड़ से घटकर 6.8 करोड़ रह गई।
हटाए गए नामों का स्तर और तरीका बहुत कुछ कहता है: बीजेपी की जीती हुई 105 सीटों में, यानी उसकी कुल जीती सीटों में से आधी पर हटाए गए वोटरों की संख्या, पार्टी की जीत के अंतर से भी ज्यादा रही। इनमें 86 सीटें ऐसी थीं जिन्हें बीजेपी पहले कभी नहीं जीत सकी थी। बस इतना ही कहा जा सकता है कि यह आंकड़े चुनाव प्रक्रिया में भरोसा नहीं जगाते।
इस संदिग्ध एसआईआर ने एक और काम किया- इसने राज्य में मौजूद असली ‘सत्ता-विरोधी लहर’ से लोगों का ध्यान भटका दिया और नतीजों पर इसके असर को भी धुंधला कर दिया। निर्माण और अन्य क्षेत्रों में सालों से चले आ रहे ‘सिंडिकेट राज’, रोजगार के मौकों की कमी, राज्य की ‘कट मनी’ (हफ्ता वसूली) वाली संस्कृति और शासन की नाकामियों ने राज्य में टीएमसी की छवि अत्यंत खराब कर दी थी, और बदलाव की चाहत साफ महसूस की जा सकती थी। यह चाहत सभी समुदायों में थी, जिसमें निराश मुसलमानों और महिलाओं का बड़ा तबका भी शामिल था, जिन्हें आम तौर पर टीएमसी समर्थक माना जाता है। बीजेपी ने इसी असंतोष का फायदा उठाया, और चुनाव से पहले बड़े आर्थिक लाभ और ‘विकास’ के वादे तो किए ही। ऐसे में यह मानना अतिरेक नहीं होगा कि चुनावों में भारी मतदान भी बदलाव की इसी चाहत का एक आईना था।
और अगर यह मान लेना सही है कि एसआईआर ने टीएमसी के खिलाफ काम किया, तो यह मान लेना भी सही है कि तृणमूल कांग्रेस के प्रति लोगों में असली असंतोष न होता, तो बीजेपी की इतनी बड़ी जीत मुमकिन नहीं होती।
फिर भी, इन नतीजों पर एसआईआर का गहरा साया दिखता है। इस अविश्वसनीय तथ्य को नजरअंदाज करना आसान नहीं है कि तृणमूल के गढ़ इतने भयानक रूप से ढह गए। और यह भी कि अगर हम अब भी एक लोकतंत्र हैं, तो पूरी चुनावी प्रक्रिया की गहन और स्वतंत्र जांच-पड़ताल जरूरी है। एक ऐसे देश में, जहां वयस्क मताधिकार लागू है और जहां के चुनाव आयोग को यह सुनिश्चित करने का दायित्व सौंपा गया है कि ‘कोई भी पीछे न छूटे’, वहां लाखों मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से यकायक हटा देना कोई मामूली बात नहीं है।
वोट देने का अधिकार हमारे संविधान की आधारशिला है। वोटर लिस्ट की समय-समय पर सफाई भी जरूरी है, लेकिन इस प्रक्रिया में विवादित आधारों पर लोगों को बाहर करने के बजाय, असली नागरिकों को शामिल करने को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। हालांकि कलकत्ता हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी एसआईआर के कुछ पहलुओं की निगरानी की, लेकिन क्रियान्वयन में भारी कमियां फिर भी रह गईं। चुनाव खत्म होने पर भी लगभग 27 लाख अपीलें अनसुनी रह गईं।
पहले भी कहा जा चुका है कि कई अहम चुनावों में वोटर लिस्ट से हटे नामों की संख्या जीत के अंतर से ज्यादा थी। सिर्फ भवानीपुर का ही उदाहरण लें: ममता बनर्जी, यहां बीजेपी के शुभेंदु अधिकारी से लगभग 15,000 वोटों से हार गईं, और यहां वोटर लिस्ट से हटाए गए नामों की संख्या लगभग 45,000 थी। टीएमसी के अन्य मंत्रियों के साथ भी ऐसा ही हुआ।
जहां एक ओर एसआईआर से पहले के आधार स्तर की तुलना में मतदाताओं की संख्या में कुल मिलाकर 12 प्रतिशत की कमी आई, वहीं इसका असर मुख्य रूप से शहरी इलाकों और अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में दिखा। विभिन्न संगठनों के विश्लेषण बताते हैं कि इसका सबसे ज्यादा असर मुसलमानों पर पड़ा है; राज्य की कुल आबादी में उनकी हिस्सेदारी लगभग 27 प्रतिशत है (2011 की जनगणना के अनुसार), जबकि मतदाता सूची से हटाए गए लगभग 91 लाख नामों में से लगभग 34 प्रतिशत नाम मुसलमानों के थे।
अनुमान है कि ‘सुनवाई के लिए लंबित’ 27 लाख मामलों में से लगभग 17 लाख (यानी 63 प्रतिशत) मुसलमानों से जुड़े हैं। मुर्शिदाबाद जिले में, जहां मुसलमानों की आबादी काफी ज्यादा है, मतदाता सूची से हटाए गए नामों की संख्या को लेकर अलग-अलग अनुमान हैं, जो 4 लाख से लेकर 7 लाख के बीच बताए जा रहे हैं। मालदा और उत्तर 24 परगना जिलों में भी बड़ी संख्या में नाम हटे हैं।
कोलकाता स्थित डेटा एनालिटिक्स संस्था, ‘सबर इंस्टीट्यूट’ के अनुसार, कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में यह असंतुलन और भी ज्यादा था। उदाहरण के लिए, नंदीग्राम में, जहां मुस्लिम आबादी लगभग 25 प्रतिशत है, कई पूरक सूचियों से नाम हटाने के 95 प्रतिशत से ज्यादा मामले इन्हीं लोगों के थे।
मटियाब्रुज और अन्य मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों में भी ऐसा ही ट्रेंड दिखा। महिलाओं को, विशेषकर अल्पसंख्यक और कामकाजी पृष्ठभूमि वाली महिलाओं को खासतौर से लक्ष्य कर सूची से हटाया गया। कहा गया कि आमतौर पर ऐसा नामों में बेमेल होने या वर्षों से चली आ रही दस्तावेजी समस्याओं के कारण हुआ।
इन सब के बावजूद, चुनाव आयोग यही कहता रहा कि प्रक्रिया पूरी तरह से निष्पक्ष थी और इसका मकसद सिर्फ अवैध और डुप्लीकेट वोटर हटाना था। आयोग ने ‘शांतिपूर्ण चुनाव’ करवाने का श्रेय भी खुद को दिया और कहा कि जिन इलाकों में सबसे ज्यादा नाम हटाए गए थे, वहां रिकॉर्ड संख्या में वोट पड़ना संकेत है कि असली वोटर बिना किसी डर के चुनाव में हिस्सा लेने आगे आए। जरा इस बात को भी समझने की कोशिश कीजिए!
(शायंतन घोष ‘बैटलग्राउंड बंगाल’ और ‘द आम आदमी पार्टी’ जैसी किताबों के लेखक हैं)
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