विचार

मृणाल पाण्डे का लेखः टीवी पर कही बात भूसे की ढेरी में चिंगारी बन जाती है, आत्मगर्व से दमकता भाजपा नेतृत्व भूल गया

जिन दलगत प्रवक्ताओं ने सांप्रदायिक बंटवारे की आग लगाई है, वे अनपढ़-गंवार भी न थे। वे भले पढ़े-लिखे हों लेकिन देश को टीवी बहसों में और ट्वविटर पर अनाम लड़ैय्यों के मन में गैर-हिन्दुत्व विचारधारा की बाबत पहले से मौजूद कई हिंसक दुराग्रह लगातार दिखते रहे हैं।

रेखाचित्रः नवजीवन
रेखाचित्रः नवजीवन 

जिसका डर था, वही हुआ। बीजेपी की प्रवक्ता नूपुर शर्मा और बीजेपी के एक सदस्य नवीन कुमार जिंदल ने क्रमश: टीवी और ट्विटर पर इस्लाम को लेकर जो भड़काऊ बयान दिए, वे तुरत वायरल हुए और इससे पहले कि सरकार प्रतिवाद करती, उसने सारी दुनिया के मुस्लिम समुदायों में आग लगा दी। जब तक यह आग देश के भीतर दिखती रही, अमृत महोत्सव मनाने और तरह-तरह के शिलान्यासों में व्यस्त आत्मगर्व से दमकते भाजपा नेतृत्व ने कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी। लेकिन वे भूल गए कि आज की टीवी और सोशल मीडिया की दुनिया में कोई भी बयान तुरत भूसे की ढेरी में चिंगारी बन कर घूम जाता है। वैसे ही इस समय दुनिया युद्ध की ज्वाला से घिरी-घिराई और अपनी आर्थिक, भौगोलिक दशा को लेकर तनाव में है। ऐसे में कोई तल्ख बात टीवी के पर्दों या घट-घट व्यापी सोशल मीडिया पर फूट निकलती है, तो दूर तलक जाती है और देखते-देखते सदियों से बनाए गए सौहार्दमय रिश्ते-नाते और वाणिज्य-व्यापार पर पानी फिर जाता है।

टी एस एलियट की कविता है: थिंक नाउ हिस्ट्री हैज मेनी कनिंग पैसेजेस, कंट्राइव्ड कॉरीडोर्स एंड इशूज, डिसीव्ड विथ व्हिस्परिंग ऐमबिशन्स गाइड्स अस बाई वैनिटीज़.. (जेरोन्शन) (इतिहास के उन अनेक धूर्त गलियारों और मुद्दों पर सोचना जरूरी है जो कानाफूसी से जागी महत्वाकांक्षाओं और अहंवादिता के रूप में हम को छलते हैं।)

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इतिहास के वे धूर्त गलियारे अब जाग रहे हैं। एक-एक कर। फिर भी पैगंबर के विरुद्ध की गई निहायत आपत्तिजनक टिप्पणियों पर दस दिन तक सरकार के गृह या सूचना प्रसारण मंत्रालयों से, जैसी उम्मीद थी, कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं जारी हुई, न ही आरोपियों के विरुद्ध कोई कड़़ी कार्र्वाई सामने आई। प्रधानमंत्री जी तो इन पंक्तियों के लिखे जाने तक मौन ही हैं जबकि उनके विपक्षी भी मानते हैं कि उनके कद-बुत को देखते हुए उनकी तरफ से मन की बात या लिखित संदेशों में इस घटना की निंदा होती और चेतावनी भी, तो उनका तुरत और गंभीर संज्ञान लिया जाता।

अब, जब दुनिया के लगभग सभी इस्लाम बहुल देश इस मुददे पर लामबंद होते दिखाई दे रहे हैं, सरकार ने आग में पानी डालने के लिए एक पत्र जारी किया है कि सरकार का इन बयानों से कोई लेना-देना नहीं है। बीजेपी ने भी बयान जारी कर कहा कि वे दोनों सदस्य पार्टी से निष्कासित कर दिए गए हैं। वे वैसे भी पार्टी के मुख्य सोच का प्रतिनिधित्व नहीं करते थे। बताया गया है कि वे तो बस हाशिये के लोग (फ्रिंज एलीमेंट्स) थे। लिहाजा उनकी बातों को भाजपा की आधिकारिक सोच न समझा जाए।

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पर यह बात गले से तनिक मुश्किल से उतरती है। वजह यह कि नूपुर शर्मा ने यह बयान एक बड़़े चैनल में बहस के दौरान दिया जिसमें वह बतौर भाजपा की अधिकृत प्रवक्ता शामिल थीं। नवीन कुमार जिंदल भी बयान जारी करते समय दिल्ली भाजपा के प्रवक्ता तथा मीडिया के प्रमुख थे। जो लोग भाजपा का कठोर भीतरी अनुशासन जानते हैं, समझते हैं कि मीडिया के ही प्लेटफॉर्म से जुड़े आधिकारिक प्रवक्ताओं का चयन बहुत सावधानी से शीर्ष स्तर पर किया जाता है। उनकी विषयानुसार रेगुलर जवाब-तलबी तथा दैनिक ब्रीफिंग होती रहती है। इसलिए उनका पार्टी की निर्देशित लक्ष्मण रेखाएं तोड़ कर रैडिकल बयानबाजी कर बैठना लगभग असंभव है।

दूसरी बात, अब नूपुर शर्मा भले बचाव में कहती हों कि उनको दूसरे बहसबाज द्वारा अपने भगवान की खिल्ली उड़़ाए जाने से गुस्सा आ गया लेकिन इस सबकी पृष्ठभूमि भी देखिए। इधर महीनों से देश भर में भगवाधारी साधु- समाज और साध्वियों ने अल्पसंख्य समुदाय के खिलाफ एक धर्मयुद्ध छेड़ रखा है। कभी हरिद्वार, कभी कर्नाटक, तो कभी उत्तर प्रदेश से अभद्र बयान सार्वजनिक होते रहते हैं। लेकिन कड़़ी कार्रवाई के नाम पर प्रतिवादियों के बीच से पत्रकारों, इतिहास के प्रोफेसरों और छात्र नेताओं के खिलाफ गंभीर धाराओं के तहत चार्जशीट दाखिल होती रहीं, देशद्रोही बता कर बुलडोजर से मकानात तोड़़े गए, हलाल मीट, हिजाब और नमाज अदायगी पर तमाम तरह के विवाद उपजते चले गए जिनमें क्षेत्रीय समर्थक भी कूद पड़़े। इस सबका भी मौजूदा घटनाक्रम का माहौल रचने में हाथ है। जिन बयानों पर कानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए थी, उन पर टीवी या सोशल मीडिया पर दंगल जारी रहे। इससे कानून, प्रशासन और भाषा सबका अवमूल्यन हुआ है। आज हर दल और विभिन्न विशेषज्ञों के बीच टीवी के नाटकीय वाद-विवाद भी लगभग हर बार उजड्ड बकवासों में तब्दील हो गए हैं जिनमें न कोई निष्कर्ष सामने आते हैं, न ही गहरे देश को जोड़ने वाले विचार।

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क्या यह सयानापन था कि हर चैनल में न्योते गए अतिपरिचित ‘टी वी फ्रेंडली’ किंतु कानून-प्रशासन की सीमित समझ रखने वाले बड़बोले नूपुर शर्मा सरीखे प्रतिनिधि विषय के जानकारों पर स्कूली सवालों की बौछार करें? और उनका जवाब पूरी तरह सुने बगैर पैगंबर के निजी जीवन पर कड़वे कटाक्ष सहित अपने दल का इतिहास विवेचन और इस्लाम के अनुयायियों के प्रतिगामी होने का दावा पेश कर दें? इससे शक होता है कि इस तरह की बहस एक प्रायोजित नाटक होती है। उसके पीछे एक चतुर मकसद रहता है कि बातचीत को राष्ट्रीय चिंता के असल मुद्दों की बजाय जातिगत, लिंगगत और सांप्रदायिक आक्षेपों में उलझा दिया जाए ताकि बाहर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का व्यापार चलता रहे और टीवी के शाब्दिक दंगल को देखते लोग एक ऐसा दर्शक समूह माने जाने लगें जिनकी कोई निजी राय या रुझान नहीं? पर आज सोशल मीडिया के युग में इन बहसों को देख-सुन रहे लोगों को भी अपनी बात कहने का मंच मिल गया है। अफसोस यह कि जब इन दर्शकों का आक्रोश ट्विटर, इंस्टा या फेसबुक पर फूटता है, तो उनकी भाषा में भी अक्सर उसी अभद्रता और हिंसा की प्रतिध्वनि सुनाई देती है जो टीवी के पैनलों में सुनाई देती हैं।

हमारे उपमहाद्वीप में हर तरह के धर्मों के आने और अन्य धर्मों के साथ सहअस्तित्व कायम कर एक बहुलतावादी लोकतांत्रिक राज्य के गढ़ जाने का एक लंबा इतिहास है। जिन दलगत प्रवक्ताओं ने सांप्रदायिक बंटवारे की आग लगाई है, सुनते हैं, वे अनपढ़-गंवार भी न थे। वे भले ही पढ़़े-लिखे हों लेकिेन देश को टीवी बहसों में और ट्विटर पर उनके और उनके दलों के मीडिया प्रकोष्ठ के अनाम लड़ैय्यों के मन में गैर-हिन्दुत्व विवारधाराओं की बाबत पहले से मौजूद कई हिंसक दुराग्रह लगातार दिखते रहे हैं। जो उनका प्रतिवाद करें, उनके विरुद्ध उनकी टोकाटाकी इस कदर बढ़ती गई है जैसे उनसे कोई नागरिक भिन्न राय रख ही नहीं सकते। जैसे, एक बड़़े मंत्री जी ने नारा भी लगाया था कि वे सब देश के गद्दार हैं और फिर पत्थरबाजी शुरू हो गई थी।

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बाइबिल कहती है कि ईश्वर ने मनुष्य को सुनने को जहां दो-दो कान दिए, जीभ सिर्फ एक ही दी है ताकि इंसान जितना बोले, उससे दूना सुन सके। लेकिन मिनट नूडल्स, फास्टफूड, ट्विटर, फेसबुक और हर मिनट ब्रेकिंग न्यूज पर पले चंचल युग में रायबहादुर प्रवक्ताओं और उनकी डोरी का संचालन करते नेताओं में राज-समाज के गहरे सुख-दुख सुनने का समय या धीरज कहां बचा है? ‘क्षमा करें’ या ‘पहले आप’ सरीखे फिकरों की बजाय ‘अब जरा मुझे भी तो बोलने दीजिए’ या (धमकी भरे सुर में), ‘अब तक बस आप ही लगातार बोले जा रहे (रही) हैं, अब मेरी बारी है और मुझे अपनी बात कहने का पूरा हक है!’ जैसे वाक्य इन दिनों भजन की टेक की तरह तमाम टीवी बहसों का अविभाज्य हिस्सा बन चुके हैं।

जब हरिद्वार से बेंगलुरु तक मुसलमानों और इस्लाम के भारत आगमन पर इतना जहर उगला जा रहा था, तो इसे गर्व से वोट बैंकों का ध्रुवीकरण करनेवाला हथियार मानने वाले शायद यह भूल गए थे कि खैबर के पार की दुनिया भी इस्लाम बहुल है और उससे हमारे ऐतिहासिक सांस्कृतिक ही नहीं, बहुत गहरे आर्थिक और राजनयिक हित स्वार्थ भी जुड़़े हुए हैं। अमीरात की एक तिहाई आबादी भारतीयों की है और वह भारत का तीसरा सबसे बड़़ा व्यापारिक साझीदार है। अनिवासी भारतीय जो भारी मात्रा (लगभग 80 बिलियन डालर) में विदेशी मुद्रा हर साल भेजते हैं, उसका एक तिहाई खाड़़ी के ही पांच देशों- अमीरात, सऊदी, कतर, कुवैत और ओमान से आता है। यही नहीं, हम जो कच्चा तेल आयात करते हैं, उसका 60 फीसदी खाड़़ी से ही आता है।

यह सही है कि भारत के मजदूर, खाद्यान्न और उड़़ान क्षेत्र में साझेदारी खाड़़ी देशों के लिए भी कीमत रखते हैं। लेकिन जैसा कि हमने पिछले दशकों में बार-बार यूरोप और अमेरिका में देखा, अपने पैगंबर या धार्मिक ग्रंथ के अपमान का आभास होने पर वे पूर्व परिचित मित्र देश से भी बहुत कठोर तरह से बदला लेते हैं। जिस तरह खाड़ी यात्रा पर पधारे हमारे माननीय उपराष्टट्रपति महोदय का डिनर अचानक कैंसिल किया गया और नाना खाड़ी देशों में भारतीय राजदूतों को बुलाकर उनको उच्चतम स्तर से इन विवादित बयानों की कड़ी निंदा की गई उससे सारे देश का माथा झुका है, कोई माने या ना माने।

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