विचार

जब उठ खड़े हुए कॉकरोच

यह आंदोलन बिना कोई असर छोड़े खत्म हो जाएगा, या सत्ता इसे कुचल देगी, या मांगें पूरी होते ही यह ठंडा पड़ जाएगा? या कुछ इस तरह चौंकाएगा जिसका हम अभी अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते? किसी के पास इसका स्पष्ट जवाब नहीं था। लेकिन कुछ ऐतिहासिक हो रहा था।

फोटो: विपिन
फोटो: विपिन  

ठीक-ठीक याद नहीं कि ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ वाले वायरल ट्रेंड पर पहली बार नज़र कब गई। बेशक, तमाम लोगों की तरह नीट पेपर लीक से उपजे संकट पर मेरी भी नज़र तो थी ही। वैसे भी, मौजूदा सरकार के दौर में बार-बार होने वाले पेपर लीक के तमाशों की हमें आदत सी हो चुकी थी और हम इससे थक चुके थे। 2014 के बाद से, भारत में परीक्षा में पेपर लीक की दर्जनों, बल्कि संभवतः सौ से ज़्यादा घटनाएं हम देख चुके हैं।

‘द वायर’ में प्रकाशित एक विश्लेषण के अनुसार, 2015 और 2026 के बीच परीक्षा में धोखाधड़ी के 148 मामले दर्ज हुए, जो 2015 से पूर्व की दर से लगभग दोगुना है। ‘न्यूज़लॉन्ड्री’ ने पेपर लीक के उन मामलों का विश्लेषण किया, जिनमें एफआईआर हुई थी या परीक्षाएं रद्द हुई थीं। विश्लेषण के अनुसार, इन घोटालों ने कम से कम 6.5 करोड़ उम्मीदवारों का जीवन प्रभावित किया था। लेकिन वह खास ज़ख्म बाद में लगा।

जिस चीज़ ने मुझे वाकई और लगभग तत्काल अपनी ओर खींचा, ज़्यादा गंभीर था। भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा एक्टिविस्ट्स को “कॉकरोच” और “परजीवी” कहने के बाद (जिस आरोप से उन्होंने बाद में इनकार किया) अपनी नई-नई मजाहिया वेबसाइट पर सीजेपी संस्थापक ने इस आंदोलन को ‘आलसी और बेरोज़गार लोगों की आवाज़’ के तौर पर पेश किया और पांच मुख्य मांगें रखीं।

ताकतवर लोगों के अपमानजनक शब्द उन्हीं पर वापस उछालने का यह बेबाक अंदाज़ मुझे अच्छा लगा। ये मांगें परीक्षा मात्र से जुड़े घोटालों से कहीं आगे की बातों पर इशारा करती थीं: भारत की उदारवादी लोकतांत्रिक व्यवस्था का धीरे-धीरे और लगभग न के बराबर महसूस होने वाला पतन। उन्होंने इशारा कुछ जजों के पक्षपाती रवैये, एसआईआर प्रक्रिया के ज़रिये चुनाव आयोग के कामकाज, सत्ताधारी दल द्वारा राजनीतिक दल-बदलुओं की खुलेआम खरीद-फरोख्त, मीडिया के बड़े हिस्से की हद से ज़्यादा और बेशर्मीभरी पक्षपातपूर्ण भूमिका, और विधानसभाओं में 50 प्रतिशत महिला आरक्षण की आड़ में परिसीमन (डिलिमिटेशन) को आगे बढ़ाने जैसी खतरनाक चाल की ओर था। असल में, वे देश के लोकतांत्रिक संस्थानों के धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ने की बात कर रहे थे- ऐसा पतन जो किसी भी ईमानदार सोच वाले व्यक्ति को साफ़ दिखाई देता है।

आभासी ही क्यों न रहा हो, इन मुद्दों पर इतने युवाओं को एक साथ आते देखना अंदर ही अंदर अच्छा लगा। देश के युवाओं पर केन्द्रित इस प्लेटफ़ॉर्म ‘कॉकरोच जनता पार्टी’, को लाखों लोगों द्वारा इंस्टाग्राम पर फ़ॉलो किया जाना भी खास था। बार-बार उनके पेज पर जाकर देखता कि फ़ॉलोअर्स किस तरह बढ़ रहे हैं। लेकिन, तमाम अन्य लोगों की तरह, मैंने भी इसे ज़्यादा महत्व नहीं दिया। खुद से यही कहता रहा कि ऑनलाइन नाराज़गी की ऐसी लहरें इसी तरह उठती हैं और फिर इंटरनेट की कभी न थमने वाली लहरों में गुम हो जाती हैं!

अभिजीत दिपके आखिरकार 6 जून 2026 को भारत लौटे, तो हमारे जैसे अनेक लोगों को उनकी सुरक्षा की चिंता थी। हम देख चुके थे कि पूर्व में विरोध-प्रदर्शनों से जुड़े कार्यकर्ता किस तरह किसी न किसी बहाने निशाना बने, हिरासत में लिए गए या उनकी आवाज़ दबा दी गई। याद है कि पढ़ाई-लिखाई में अच्छा प्रदर्शन करने वाला यह छात्र हाथों में आम्बेडकर की किताब लिए एयरपोर्ट से निकला था और जान-बूझकर आम्बेडकर का ज़िक्र किया था। संदेश बहुत ढका-छिपा नहीं था, इस वजह से काफ़ी पसंद आया।

अभिजीत और उनके कुछ साथियों ने दिल्ली के जंतर-मंतर से अपना अभियान शुरू किया- जिसमें उनके आस-पास वामपंथी छात्र कार्यकर्ता भी मौजूद थे और नीट घोटाले को लेकर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग कर रहे थे। मुझे थोड़ी उम्मीद तो जगी, लेकिन सतर्क भी था। हमारी पीढ़ी ने देखा है कि किस तरह नागरिक समाज के विरोध-प्रदर्शनों के तेज़ी से उठने वाले ज्वार का कई बार दक्षिणपंथी ताकतें किस तरह अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर लेती हैं।

कई दोस्त इसकी तुलना अन्ना हजारे आंदोलन से कर रहे थे और उनकी नज़र में यह महज एक ‘बफ़र’ या दिखावे का आंदोलन था। शक करने की वजहें भी थीं। लोगों ने उस आंदोलन के बाद अपनी उम्मीदें धराशाई होते देखी थीं; मौजूदा सरकार के सत्ता में आने की राह बनाने में जिसकी बड़ी भूमिका रही। लेकिन एक बड़ा फ़र्क भी था, जिसे वे शायद नज़रअंदाज़ कर रहे थे। अन्ना आंदोलन से सिर्फ़ बीजेपी को फ़ायदा हो सकता था, क्योंकि तब वही मुख्य विपक्षी पार्टी थी। जो आंदोलन ख़ुद बीजेपी के ख़िलाफ़ हो, वह दक्षिणपंथी ताक़तों की मदद कैसे कर सकता है?

एक और अहम फ़र्क था। मुझे अन्ना आंदोलन अच्छी तरह याद है। उसमें चीज़ें पहले से तय या ‘स्टेज-मैनेज्ड’ लग रही थीं, आरएसएस की लामबंदी स्पष्ट थी, और मीडिया लगातार एक ही नैरेटिव आगे बढ़ा रहा था। लेकिन यहां, मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सीजेपी के इस आंदोलन के प्रति आलोचनात्मक, बल्कि विरोधी रुख़ अपनाए हुए था। फिर भी, जैसा कि अचानक शुरू हुए ऐसे किसी भी आंदोलन को देखकर होना चाहिए, और जिसे बड़े पैमाने पर समर्थन मिल रहा हो, मुझे शक था। इसलिए भी कि उसके मुख्य चेहरे कुछ महीने पहले तक ज़्यादातर लोगों के लिए अनजान थे।

शुरुआत में यह बढ़त धीमी रही। देश भर में अभिजीत की रैलियों और सभाओं में अच्छी-खासी भीड़ जुटती, लेकिन किसी को अंदाज़ा नहीं था कि आगे चलकर आंदोलन कितना बड़ा रूप ले लेगा। 20 जून से उन्होंने जंतर-मंतर पर दोस्तों, साथियों और अलग-अलग तरह के लोगों के एक छोटे से समूह के साथ अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया; जो धीरे-धीरे बढ़ता गया। तब तक, यह राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींचने लगा था और विपक्षी दलों, नागरिक समाज के समूहों और आम नागरिकों का लगातार आना-जाना जारी था।

28 जून को एक्टिविस्ट और शिक्षाविद सोनम वांगचुक भी इसमें शामिल हो गए और वामपंथी छात्र नेताओं के साथ भूख हड़ताल शुरू कर दी, जिससे बड़ी संख्या में लोग जुटने लगे। अब आंदोलन को नज़रअंदाज़ करना और भी मुश्किल हो गया। वे किसी भी तरह लोगों की भावनाओं को गहराई से छू चुके थे।

लेकिन लगभग एक महीना होते-होते सब कुछ बदल गया। उनके आह्वान पर 20 जुलाई को संसद मार्च के लिए हज़ारों छात्र और युवा पहुंच गए। स्कूल-कॉलेज के छात्रों ने मानो राजधानी को ही घेर लिया था। देशभर से सामने आए वीडियो बता रहे थे कि यह अन्ना आंदोलन से कहीं ज़्यादा बड़े स्तर का था और मीडिया पर बंदिश तथा सुनियोजित दमन के बावजूद जारी रहा। छोटे शहरों में जिस तरह यह खमोशी से फैला, लंबे अतीत में मैंने नहीं देखा था।

अपने खिलाफ लाठीचार्ज, वॉटर कैनन, आंसू गैस और पैलेट गन के बेरहम इस्तेमाल के बावजूद दिल्ली में प्रदर्शनकारी जिस तरह से डटे हुए थे, कुछ लोग इसकी तुलना बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों में युवा उभार वाले विरोध-प्रदर्शनों से कर रहे हैं। स्वतःस्फूर्त होने, दायरे और विस्तार के पैमाने से तुलना बेतुकी नहीं लगती। फिर भी, भारत जैसे विशाल देश में, पड़ोसी देशों वाले प्रदर्शनों के पैमाने पर कुछ भी होना मुश्किल है। अभिजीत और अन्य लोग भले ही लगातार इनकार करते रहे हों कि उनकी मंशा संसदीय प्रक्रिया से हटकर सरकार गिराने की है, तुलना जारी है।

इस विरोध के नतीजों के बारे में कुछ कहना या इसकी सटीक तुलना करना जल्दबाजी होगी। लेकिन समझना जरूरी है कि इसके उठने की वजह सिर्फ़ इसकी तात्कालिक मांगों तक में सीमित नहीं है। प्रदर्शनकारी शायद पूर्ण दक्षिणपंथी वर्चस्व और मोदी को एक लोक-लुभावन नेता के तौर पर पेश किए जाने के विरोधाभास को समझ रहे हैं, जबकि उनकी अपनी ज़िंदगी की हक़ीक़त इस छवि के बिल्कुल उलट है। यह इंटरनेट और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में बड़ी हुई पीढ़ी है; और अनिश्चितता से जूझते हुए भी दुनिया के बारे में पिछली किसी भी पीढ़ी की अपेक्षा कहीं ज़्यादा जानकारी रखती है। और उदारवादी लोकतांत्रिक संस्थाओं के कमज़ोर पड़ने का मतलब ही यह है कि सड़कों पर उतरकर विरोध-प्रदर्शन ही इस अनिश्चित और मुश्किल हालात से बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता बचा था।

क्या मुझे इस विरोध-प्रदर्शन को लेकर उम्मीद भरे नज़रिये से सोचना चाहिए? क्या यह बिना कोई असर छोड़े खत्म हो जाएगा, या सत्ता की ताकत इसे कुचल देगी, या अपनी फ़ौरी मांगे पूरा होते ही यह ठंडा पड़ जाएगा? या यह हमें कुछ इस तरह चौंकाएगा जिसका हम अभी अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते? मुझे नहीं लगता कि किसी के पास इसका स्पष्ट जवाब है। लेकिन एक बात से तो इनकार नहीं किया जा सकता, यहां तक कि मुखर आलोचक भी इसे नकार नहीं सकते: हम कुछ ऐतिहासिक घटित होते हुए देख रहे हैं।

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