विचार

सोनम वांगचुक ने अब तक क्यों सार्वजनिक नहीं किया सरकार से मिला लिखित आश्वासन, अब क्या होगी भूमिका यह भी तो बताएं!

यदि सोनम वांगचुक को सरकार के साथ हुई वार्ता का पूरा विवरण, लिखित आश्वासन का मूल पाठ आदि सार्वजनिक करनी चाहिए। और, छात्र धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तक आंदोलन जारी रखने का ऐलान कर चुके हैं, तो इस पर भी उन्हें स्पष्ट रूप से अपनी भूमिका बतानी चाहिए।

तस्वीर जंतर मंतर पर सोनम वांगचुक द्वारा अनशन शुरु करने वाले पहले दिन की है
तस्वीर जंतर मंतर पर सोनम वांगचुक द्वारा अनशन शुरु करने वाले पहले दिन की है 

सोनम वांगचुक द्वारा 27 दिन का अनशन समाप्त किए जाने के बाद एक दौर अवश्य समाप्त हुआ है, लेकिन संघर्ष नहीं। यदि छात्र संयुक्त संघर्ष समिति (कॉकरोच जनता पार्टी) और आंदोलन में शामिल छात्र नेतृत्व शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तक धरना और आंदोलन जारी रखने की घोषणा पर कायम है, तो इसका अर्थ स्पष्ट है—अनशन समाप्त हुआ है, आंदोलन नहीं। यही तथ्य इस पूरे घटनाक्रम को और अधिक जटिल तथा राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बना देता है।

इस आंदोलन का मूल्यांकन किसी एक व्यक्ति के निर्णय से नहीं, बल्कि उसके समूचे सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ में किया जाना चाहिए। यह आंदोलन किसी व्यक्ति की महत्वाकांक्षा का परिणाम नहीं था। इसकी पृष्ठभूमि में बार-बार होने वाले पेपर लीक, परीक्षा प्रणाली की विफलता, करोड़ों युवाओं के भविष्य से खिलवाड़, प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर गहरा संकट और व्यवस्था के प्रति बढ़ता अविश्वास था। वर्षों की तैयारी, परिवारों की जमा-पूँजी और युवाओं के सपने बार-बार लीक हुए प्रश्नपत्रों की भेंट चढ़ते रहे। अनेक छात्र मानसिक अवसाद में गए और कुछ ने आत्महत्या जैसा दुखद कदम भी उठाया। ऐसे समय में उठा यह आंदोलन केवल परीक्षा सुधार का नहीं, बल्कि न्याय और जवाबदेही का आंदोलन है।

दुर्भाग्य यह रहा कि सरकार ने प्रारंभ से ही इस जनाक्रोश को लोकतांत्रिक असहमति के रूप में स्वीकार करने के बजाय कानून-व्यवस्था की समस्या की तरह देखा। शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर पुलिस की बर्बर कार्रवाई, लाठीचार्ज, बल प्रयोग, हिरासतें और मुकदमे इस बात का प्रमाण हैं कि सत्ता ने पहले संवाद नहीं, दमन का रास्ता चुना। लोकतंत्र में असहमति का उत्तर पुलिस नहीं, राजनीति और संवाद होना चाहिए। यदि अंततः केंद्रीय मंत्री आधी रात को अस्पताल पहुँचकर अनशन समाप्त कराने लगे, तो यह प्रश्न स्वाभाविक है कि जब संवाद संभव था, तब पहले लाठियाँ क्यों चलीं? छात्रों को अपराधियों की तरह क्यों देखा गया?  

यहीं से सरकार की नीति और नीयत पर गंभीर संदेह पैदा होता है। क्या सरकार वास्तव में परीक्षा व्यवस्था में सुधार चाहती थी, या केवल बढ़ते जनदबाव को नियंत्रित करना उसका उद्देश्य था? क्या पुलिस कार्रवाई आंदोलन को तोड़ने की रणनीति थी? यदि नहीं, तो उसके लिए अब तक किसी अधिकारी की जवाबदेही क्यों तय नहीं हुई? यदि छात्रों पर दर्ज मुकदमे अन्यायपूर्ण थे, तो उन्हें दर्ज ही क्यों किया गया? इन प्रश्नों का उत्तर दिए बिना कोई भी सरकार लोकतांत्रिक संवेदनशीलता का दावा नहीं कर सकती। 

लेकिन प्रश्न केवल सरकार से नहीं हैं। सोनम वांगचुक और आंदोलन के नेतृत्व से भी हैं।

वांगचुक ने अनशन समाप्त करते समय 65 सांसदों के आग्रह का उल्लेख किया। यदि वास्तव में इतने सांसद इस पहल में सक्रिय थे, तो उनके नाम सार्वजनिक क्यों नहीं किए गए? क्या वे विपक्ष के थे? क्या उनमें सत्तापक्ष के सांसद भी शामिल थे? उनकी भूमिका क्या थी? लोकतंत्र में सार्वजनिक दावों के साथ सार्वजनिक प्रमाण भी अपेक्षित होते हैं। 

इसी प्रकार, सरकार द्वारा दिए गए कथित लिखित आश्वासनों का पूरा पाठ अब तक सार्वजनिक नहीं किया गया है। यदि सरकार ने छात्रों पर दर्ज मुकदमे वापस लेने, परीक्षा प्रणाली में सुधार, पेपर लीक पर कठोर कार्रवाई, प्रभावित परिवारों के लिए राहत और संसद में चर्चा का लिखित वचन दिया है, तो देश को यह जानने का अधिकार है कि वास्तव में सहमति किन बिंदुओं पर बनी है। लोकतंत्र में गोपनीय समझौते नहीं, सार्वजनिक जवाबदेही विश्वास पैदा करती है।

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का है। आंदोलन की शुरुआत इसी मांग से हुई थी। यदि सोनम वांगचुक ने अपना अनशन समाप्त कर दिया, लेकिन छात्र संगठन अभी भी उसी मांग पर डटे हुए हैं, तो यह संकेत देता है कि आंदोलन के भीतर भी रणनीतिक स्तर पर भिन्न दृष्टिकोण उभर रहे हैं। यह कोई असामान्य स्थिति नहीं है; बड़े जनांदोलनों में नेतृत्व और आधार के बीच रणनीतिक मतभेद सामने आते रहे हैं। लेकिन ऐसे मतभेदों पर भी पारदर्शिता आवश्यक होती है।

यही कारण है कि अब सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि वांगचुक ने अनशन क्यों समाप्त किया। बड़ा प्रश्न यह है कि क्या अनशन समाप्त करने का निर्णय आंदोलन की सामूहिक सहमति से लिया गया था, या यह उनका स्वतंत्र निर्णय था? यदि छात्र संगठन अपनी मूल मांगों पर पहले की तरह अडिग हैं, तो यह स्पष्ट है कि संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है।  

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक चिंता पारदर्शिता के अभाव को लेकर है। पहले सरकार की चुप्पी, फिर पुलिस दमन, उसके बाद अचानक आधी रात की वार्ता, अनशन की समाप्ति, 65 सांसदों का उल्लेख, लेकिन न सांसदों की सूची सार्वजनिक, न लिखित समझौते का पूरा पाठ, न वार्ता का अधिकृत विवरण। दूसरी ओर, छात्र संगठन का यह कहना कि आंदोलन जारी रहेगा। यह पूरा परिदृश्य स्वाभाविक रूप से अनेक प्रश्नों को जन्म देता है।  

यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि प्रश्न उठाना किसी षड्यंत्र सिद्धांत का समर्थन करना नहीं है। लेकिन जब लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपारदर्शी हो जाती है, तब संदेह की गुंजाइश स्वयं पैदा होती है। लोकतंत्र में विश्वास तथ्यों से पैदा होता है, रहस्यों से नहीं।

यदि वास्तव में सरकार ईमानदार है, तो उसे अपने सभी लिखित आश्वासनों को सार्वजनिक करना चाहिए, छात्रों पर दर्ज मुकदमे तत्काल वापस लेने चाहिए, पुलिस दमन की स्वतंत्र जाँच करानी चाहिए, दोषी अधिकारियों की जवाबदेही तय करनी चाहिए और परीक्षा सुधार की समयबद्ध कार्ययोजना देश के सामने रखनी चाहिए।

उधर, यदि सोनम वांगचुक इस आंदोलन की नैतिक ऊँचाई को बनाए रखना चाहते हैं, तो उन्हें भी सरकार के साथ हुई वार्ता का पूरा विवरण, लिखित आश्वासन का मूल पाठ और 65 सांसदों की सूची सार्वजनिक करनी चाहिए। यदि छात्र धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तक आंदोलन जारी रखने का निर्णय ले चुकी है, तो इस स्थिति पर भी उन्हें स्पष्ट रूप से अपनी भूमिका बतानी चाहिए। लोकतांत्रिक आंदोलनों की सबसे बड़ी पूँजी जनता का विश्वास होता है, और विश्वास की पहली शर्त है—पूर्ण पारदर्शिता।  

अंततः यह संघर्ष केवल एक मंत्री के इस्तीफे या एक अनशन की समाप्ति का नहीं है। यह उस भारत की लड़ाई है जहाँ युवाओं का भविष्य सुरक्षित हो, परीक्षा व्यवस्था विश्वसनीय हो, शांतिपूर्ण विरोध पर लाठियाँ न बरसें, सरकार संवाद से चले और जनांदोलन भी जनता के प्रति पूरी तरह जवाबदेह रहें।

यदि सरकार अपने वादों पर अमल करती है, पुलिस दमन की जवाबदेही तय होती है और शिक्षा व्यवस्था में वास्तविक सुधार होते हैं, तो यह आंदोलन लोकतंत्र की एक सार्थक उपलब्धि माना जाएगा। लेकिन यदि आश्वासन कागज़ों तक सीमित रह जाते हैं, पुलिस की बर्बरता भुला दी जाती है, रहस्य बने रहते हैं और छात्र फिर सड़कों पर संघर्ष करते रह जाते हैं, तो इतिहास इस पूरे प्रकरण को लोकतंत्र में विश्वास के संकट और राजनीतिक अपारदर्शिता के एक और उदाहरण के रूप में दर्ज करेगा।

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