विचार

आकार पटेल का लेख: बेरोजगारी और असमानता पर कब करेंगी सरकारें चर्चा, या फिर लोगों का गुस्सा फूटने का करेंगी इंतजार!

आंकड़े बता रहे हैं कि हालात खराब हैं। इससे आम लोग कितने तकलीफ में हैं इसका पूरी तरह आंकलन किया ही नहीं गया क्योंकि राजनीति तो किन्हीं और मुद्दों पर केंद्रित है। आबादी का बड़ा हिस्सा खामोशी से तकलीफें सहन कर रहा है और चंद लोग लगातार अमीर होते जा रहे हैं।

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सत्ता संभालने के कुछ दिन बाद ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोद ने लोकसभा में कहा था कि मनरेगा को केवल इसलिए जारी रखा जाएगा, जिससे यह साफ हो जाएगा कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार ने कितना खराब काम किया था। उन्होंने कहा था, "मेरी राजनीतिक सूझबूझ कहती है कि मनरेगा को कभी बंद मत करो।" उन्होंने विपक्षी दलों का मजाक उड़ाते हुए कहा था, "मैं ऐसी गलती नहीं कर सकता क्योंकि मनरेगा आपकी विफलताओं का एक जीता-जागता स्मारक है। आजादी के 60 साल बाद आपको लोगों को गड्ढे खोदने के लिए भेजना पड़ा, यह आपकी विफलताओं का स्मारक है और मैं गाजे-बाजे के साथ इस स्मारक का ढोल पीटता रहूंगा।" लेकिन उन्होंने किया क्या....उन्होंने इस योजना को स्वाभाविक रूप से मरने दिया क्योंकिउनका तो दावाथा कि वे लोगं को लिए बेहतर नौकिरियां पैदा करेंगे।

इसके लिए उन्होंने इस योजना के मद में फंड को कम करके और कम से कम लोगों तक इस योजना की पहुंच करके किया। सरकार के कामकाज संभालने के बाद केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कहा था कि मनरेगा को देश के एक तिहाई से भी कम जिलों मे तक सीमित किया जाएगा। इसके अलावा एक काम और मोदी सरकार ने किया। और वह यह कि मनरेगा की मजदूरी के भुगतान में देरी शुरु कर दी, जबकि प्रावधान यह था कि मजदूरों को 15 दिन में पैसा मिल जाना चाहिए। लेकिन भुगतान में देरी 2014 में 74 दिनों तक पहुंच गई। मोदी सरकार के कामकाज संभालने के 6 माह बाद दिसबंर 2014 में सिवाए 5 राज्यों के बाकी सभी राज्यों को मनरेगा के मद में 2013 के मुकाबले कम पैसा मिला।

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जैसे-जैसे भारत की अर्थव्यवस्था कमजोर होती गई और बेरोजगारी बढ़ने लगी, मोदी सरकार ने उसी मनरेगा में ज्यादा निवेश करना शुरु कर दिया जिसे प्रधानमंत्री ने नाकामियों का स्मारक कहा था। 2014-15 में मनरेगा के मद में 32,000 करोड़, 2015-16 में 37,000 करोड़, 2017-18 में 55,000 करोड़, 2018-19 में 61,000 करोड़, 2019-20 में 71,000 और 2020-21 में 1,10,000 करोड़ का प्रावधान किया। ‘नाकामियों का स्मारक’ इस तरह आकार में करीब तीन गुना हो गया।

इतना होने पर भी यह योजना उस आबादी की नौकरी की मांग नहीं पूरी कर पा रही है जो बेरोजगार है।

मौजूदा वित्त वर्ष में इस अनुमान के साथ कि मांग कम है, इस योजना के लिए सिर्फ 73,000 करोड़ रुपए का बजट रखा गया, लेकिन इस साल के पहले 5 महीने में ही कुल बजट का 80 फीसदी खर्च हो चुका है। और काम के लिए लोगों की मांग बढ़ती ही जा रही है।

मनरेगा के तहत लोगों को ग्रामीण इलाकों में कम से कम 100 दिनों के रोजगार की गारंटी 200 रुपए दिहाड़ी पर देने की बात है। यह गारंटी सभी रजिस्टर्ड परिवारों को लिए है। यानी परिवार को साल में 20,000 रुपए की आमदनी होगी।

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इस योजना के तहत देश के करीब 13 करोड़ परिवार रजिस्टर्ड हैं, जोकि देश के कुल करीब 25 करोड़ परिवारों के आधे के आसपास है। 2016 में करीब 24 लाख जॉब कार्ड की कमी थी, लेकिन नोटबंदी के बाद जॉब कार्ड की संख्या 18 लाख बढ़ गई थी। इसका सीधा अर्थ है कि जब भी आर्थिक संकट आता है तो परेशान और गरीब भारतीय मनरेगा का ही सहारा लेते हैं जीवन चलाने के लिए। एक तरफ जहां मनरेगा में स्थिति कुछ बेहतर दिखती है वहीं गैर-मनरेगा नौकरियों में हालात एकदम अलग हैं।

अशोका यूनिवर्सिटी से संबद्ध सेंटर फॉर इकोनॉमिक डेटा एंड एनालिसिस (सीईडीए) के एक अध्ययन से सामने आया है कि पिछले साल मनरेगा की मांग में 1.5 करोड़ की बढ़ोत्तरी हुई है। यानी नोटबंदी के बाद जितनी मांग बढ़ी थी उससे आठ गुना ज्यादा। लेकिन दुर्भाग्य से देश के बड़े राज्यों में सरकारें उन लोगों को रोजगार नहीं दे पा रही हैं जिन्हें इसकी जरूरत है। उत्तर प्रदेश में प्रति रजिस्टर्ड परिवार को औसतन सिर्फ 18 दिन का रोजगार मिल रहा है, बिहार में सिर्फ 11 दिनों का। यानी यूपी में परिवारों को सिर्फ 3600 रुपए और बिहार में सिर्फ 2000 रुपए सालाना आमदनी हो रही है। क्या इतने पैसे से कोई परिवार काम चला सकता है। हकीकत यह है कि 95 फीसदी से के करीब रजिस्टर्ड परिवारों को पिछले साल 100 दिन का काम नहीं मिला।

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यह स्थिति है जिसमें आज हम हैं। सेडा के सर्वे में जो दूसरी बात सामने आई वह यह कि युवाओं को कहीं और स्थाई रोजगार नहीं मिल रहा है और वे भी अब मनरेगा के तहत काम तलाश रहे हैं। 18 से 30 वर्ष के 20 फीसदी युवा 2018 में मनरेगा के तहत काम तलाश रहे थे, इनकी संख्या करीब दो गुना होकर इस साल 37 फीसदी पहुंच गई है।

सरकार के अपने आंकड़े भी बताते हैं कि 15 वर्ष और उससे अधिक उम्र के ऐसे लोग जो काम कर रहे हैं, उनकी संख्या कुल कार्यबल का 40 फीसदी है। अमेरिका में यह संख्या 60 फीसदी है, जबकि थाईलैंड में 70 फीसदी और चीन में 70 फीसदी से ज्यादा है। भारत में काम में शामिल होने वाले लोगों का प्रतिशत पाकिस्तान और बांग्लादेश से भी कम है। तो क्या भारतीय कामचोर हैं? नहीं, हकीकत यह है कि काम ही नहीं है।

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सेंटर फॉर मॉनिटरिंग दि इंडियन इकोनॉमी – सीएमई ने कहा है कि 2016 में देश की काम करने लायक आबादी में से सिर्फ 42 फीसदी ही के पास काम था। लेकिन 2017 में इसमें गिरावट आई और आंकड़ा 41 फीसदी पहुंच गया, इसके अगले साल 2018-19 में 39 फीसदी और 2019 में 36 फीसदी पहुंच गया। आज की तारीख में जितने भारतीय काम कर रहे हैं उनकी संख्या आज से पांच साल पहले से भी कम है, हालांकि इस दौरान देश की आबादी में 7 करोड़ का इजाफा हो चुका है।

यह समस्या ऐसी नहीं है जो आसानी से खत्म हो जाएगा क्योंकि ये आंकड़े दिन ब दिन खराब ही होते जा रहे हैं। इस सबके का जितना असर पड़ चुका है और अब भी कितना असर हो रहा है, इसका पूरी तरह आंकलन किया ही नहीं गया क्योंकि देश की राजनीति तो किन्हीं और ही मुद्दों पर केंद्रित है। भारत सदा से ही एक गरीब देश रहा है जहां बड़ी आबादी खामोशी से तकलीफें सहन करती रही है, जबकि चंद लोग लगातार अमीर होते जा रहे हैं। आज भी हालात हजारों साल पहले से बहुत ज्यादा नहीं बदले हैं। सवाल है कि क्या देश की अधिकतर आबादी इसी तरह खामोशी से सहन करती रहेगी, वह भी तब जब असमानता साफ तौर पर हमारे सामने है। अगर इस सवाल का जवाब नहीं हैं तो यह जरूरी हो जाता है कि देश इस बारे में बात करे, चर्चा करे, न कि लोगों की सहनशीलता के जवाब देने और गुस्से के फूट पड़ने का इंतजार करे।

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