विचार

अनेक देशों में युवा लगातार विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं, केवल भारत में आंदोलन सबसे बड़ा अपराध हो गया है

न्यू इंडिया में नेता समेत हरेक समर्थक अपने आप को चमत्कारी बताता है, चमत्कार का ढोंग करता है, और अपने आप को ही देश मानता है। इनमें से किसी के विरुद्ध आप बोलकर देखिये, तुरंत आईटी सेल की फौज के साथ ही मेनस्ट्रीम मीडिया इसे देश का अपमान बताने लगेगा।

अनेक देशों में युवा लगातार विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं, केवल भारत में आंदोलन सबसे बड़ा अपराध हो गया है
अनेक देशों में युवा लगातार विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं, केवल भारत में आंदोलन सबसे बड़ा अपराध हो गया है फाइल फोटो

वर्ष 2000 के बाद से दुनिया के हरेक कोने में तमाम सामाजिक समस्याओं को लेकर कुछ हिंसक और अधिकतर अहिंसक आंदोलन हो चुके हैं, और इनमें से लगभग सभी की अगुवाई युवा कर रहे हैं। पर्यावरण विनाश के विरुद्ध आंदोलन की कमान तो पूरी तरह से युवाओं ने ही संभाला है, और अब महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, भ्रष्टाचार, आर्थिक असमानता और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर भी भारत समेत अनेक देशों में युवा लगातार आंदोलन और प्रदर्शन कर रहे हैं। अनेक देशों में तो लंबे समय से सत्ता पर काबिज निरंकुश शासन को भी युवाओं ने उखाड़ फेंका है। इसका सबसे ताजा उदाहरण यूरोपीय देश सर्बिया है, जहां छात्रों के आंदोलन के आगे निरंकुश शासन और रूस के समर्थन को भी सत्ता से उतरना पड़ा।

इन सबसे परे, हमारे देश की स्थिति अन्य देशों से अलग है। यहां की सत्ता की निरंकुशता ही उसका अस्तित्व है। यहां आंदोलन दुनिया का सबसे बड़ा अपराध करार दिया जाता है– आंदोलन शब्द सुनते ही पुलिस, प्रशासन, अर्द्धसैनिक बल और सत्ता– सभी इसे कुचलने की कवायद में जुट जाते हैं। दूसरी तरफ युवाओं की एक बड़ी फौज ऐसी है जो सत्ता के समर्थन से प्रदर्शनकारियों पर खुले आम हिंसा का प्रयोग करती है, और दिन-रात सोशल मीडिया पर सत्ता द्वारा फैलाए गए झूठ का प्रचार करती है।

हमारा देश हरेक तरीके से दो हिस्सों में बंट गया है– एक में ऐसे युवा हैं जो शिक्षा, रोजगार और खुशहाल जीवन की मांग कर रहे हैं, इसके लिए आंदोलन कर रहे हैं– दूसरे हिस्से के युवा हरेक महीने पांच किलो अनाज को ही अपने जीवन की सफलता मान रहे हैं। वर्ष 1978 में ब्रिटेन की प्रधानमंत्री बनने से पांच महीने पहले एक इंटरव्यू में मार्गरेट थैचर ने ब्रिटेन की गरीबी के बारे में कहा था, अब देश में प्राथमिक स्तर पर गरीबी खत्म हो चुकी है, हम जिसे गरीबी कहते हैं वह लोगों के करण है क्योंकि उन्हें पता नहीं है कि किस तरह पैसों का इस्तेमाल करना है, या फिर किस तरह खर्च करना है। वर्ष 1996 में, प्रधानमंत्री के पद से हटने के 6 वर्षों बाद फिर एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, गरीबी आर्थिक नहीं है, बल्कि यह लोगों के व्यवहार से जुड़ी है।

जाहिर है, उनके अनुसार गरीबी का सामाजिक या राजनैतिक नीतियों से कोई सम्बन्ध नहीं है, केवल व्यक्तित्व से जुडी है। थैचर ने प्रधानमंत्री रहते अमीरों के टैक्स की दर को कम किया, आम जनता को मिलने वाली सरकारी सुविधाओं में कटौती की, अपनी नीतियों से छोटे उद्योगों और छोटे कारोबारियों को तबाह कर दिया और मजदूर संगठनों को प्रतिबंधित कर दिया। पूरी दुनिया, विशेष तौर पर दक्षिणपंथी और निरंकुश सत्ता, पूंजीवाद समर्थक थैचर की इन आर्थिक नीतियों की कायल है, और इसे थैचरोनोमिक्स का नाम दिया है– ऐसी ही नीतियां देश को दो हिस्सों में विभाजित करती हैं।

भले ही यह ब्रिटेन की बात हो, पर आज भारत समेत लगभग पूरी दुनिया इन्हीं आर्थिक और सामाजिक नीतियों पर चल रही है। इन नीतियों से गरीबी बढी और आर्थिक असमानता भी। पूरे दुनिया में यही हो रहा है। मार्गरेट थैचर ने अपने आप को वर्किंग क्लास का मसीहा बताया था, पर उनकी नीतियों की सबसे अधिक मार इसी वर्ग पर पड़ी थी। हमारे देश में भी प्रधानमंत्री, उनके मंत्रियों या फिर उनके समर्थकों के हिसाब से देश में गरीब नहीं हैं, बेरोजगार नहीं हैं, भूखे नहीं हैं, कोई आर्थिक असमानता नहीं है, कोई शोषित नहीं है। दरअसल हम दो देशों में विभाजित हो गए हैं– एक इंडिया है जहां हमलोग रहते हैं और बेरोजगारी, भूख, गरीबी, शोषण और प्रताड़ना झेलते हैं। दूसरा प्रधानमंत्री के सपनों का न्यू इंडिया है, जहां गौतम अडानी हैं, मुकेश अंबानी हैं, कोई भी समस्या नहीं है, सब केवल अमृत पीते हैं, कोई गरीब नहीं है, बेरोजगार नहीं है, भूखा नहीं है।

इंडिया का किसान बदहाल है, पर न्यू इंडिया का किसान आबाद है। इंडिया को अपनी विरासत, विविधता और इतिहास पर गर्व है, पर न्यू इंडिया में इन सबको नया नाम देने की और अपना ही इतिहास मिटाने की होड़ लगी है। न्यू इंडिया के मुगल गार्डन को अमृत उद्यान कहा जा रहा है– अब वहां फूलों से अमृत बरसने लगे हैं और फूलों की खुशबू सौ गुना से अधिक बढ़ गयी है। सत्ता जितनी भी गरीबों के विकास की परियोजनाओं पर अपनी पीठ लगातार थपथपाती है, उतनी ही न्यू इंडिया के पूंजीपतियों को और अमीर और इंडिया के गरीबों को पहले से अधिक गरीब बना देती है।

गरीबी पर हमारे कट्टरपंथियों और बीजेपी समर्थकों का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर विचार सीधा सा है– हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी 18 घंटे काम करते हैं, कभी छुट्टी नहीं लेते, फिर गरीबी कैसे हो सकती है– गरीबी की बातें करने वाले उनका अपमान करना चाहते हैं, उनकी अन्तरराष्ट्रीय छवि धूमिल करना चाहते हैं, यह बड़ी साजिश है, यह देश का अपमान है, यह देश की जनता का अपमान है। सत्ता भी भारत की गरीबी, बेरोजगारी, आर्थिक असमानता, पर्यावरण विनाश, सामाजिक असमानता, धर्मान्धता और मौलिक अधिकारों से जुड़ी हरेक रिपोर्टों को खारिज करता रहता है और बड़ी बेशर्मी से इसे देशी-विदेशी साजिश का हिस्सा बताता है। फिर सत्ता की फौज और मीडिया इन रिपोर्टों का चीरहरण करने में जुट जाता है। जब इंडिया पर गंभीर समस्या आती है, न्यू इंडिया का मीडिया जनता को धर्म, उन्माद, आस्था, पाकिस्तान, नए हथियारों के जखीरे में उलझा देता है।

न्यू इंडिया में नेता समेत हरेक समर्थक अपने आप को चमत्कारी बताता है, चमत्कार का ढोंग करता है, और अपने आप को ही देश मानता है। इनमें से किसी के विरुद्ध आप बोलकर देखिये, तुरंत आईटी सेल की फौज के साथ ही मेनस्ट्रीम मीडिया इसे देश का अपमान बताने लगेगा। देश में सत्ता का विरोध भारत की आजादी, भारतीय संवैधानिक संस्थाओं, ईमानदारी, देश के आगे बढ़ने की कहानी और देश की आकांक्षाओं पर हमला करार दिया जाता है।

न्यू इंडिया की मानसिकता इंडिया पर इस कदर हावी है कि सबको कंगाल करते, हक और आवाज को छीनते लोग ही हमें ईश्वर नजर आने लगे हैं। हम भी यह मान बैठे हैं कि गरीबी समेत हमारी हरेक समस्याएं हमारी अपनी देन हैं, सरकारी नीतियों की नहीं। हम छोटे-मोटे चमत्कार पर आवाज उठाते हैं, पर सत्ता के विशालकाय चमत्कार पर शांत रहते हैं और अपने दमन को भी ईश्वर का वरदान मानते हैं।

यूनाइटेड किंगडम में युवाओं के बीच किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार 13 से 27 वर्ष के बीच के 73 प्रतिशत युवा प्रजातंत्र को बेहतर व्यवस्था और 26 प्रतिशत युवा अपने देश को सशक्त प्रजातंत्र मानते हैं। टीवी चैनल, चैनल 4 द्वारा कराए गए व्यापक सर्वेक्षण में यहां तक तो प्रजातंत्र का बेहतर भविष्य नजर आता है, पर आधे से अधिक युवा, यानि 52 प्रतिशत, एक ऐसा सशक्त नेता चाहते हैं जिसपर चुनावों और संसद की बाध्यता नहीं हो। पारंपरिक दृष्टि में युवाओं का रुझान निरंकुश सत्ता में है, पर उनकी नजर में यही प्रजातंत्र का स्वरूप है। युवाओं के प्रजातंत्र की परिभाषा यहीं समाप्त नहीं होती– 33 प्रतिशत युवा तो सत्ता में सेना को देखना चाहते हैं। कुल 47 प्रतिशत युवाओं के अनुसार समाज और व्यवस्था में व्यापक बदलाव की जरूरत है और विद्रोह ही इसका एकमात्र विकल्प है।

युवाओं के विचार लैंगिक समानता के संदर्भ में भी तेजी से बदल रहे हैं। सर्वेक्षण में 45 प्रतिशत पुरुष प्रतिभागियों के अनुसार समाज में लैंगिक समानता का पाठ इस कदर पढ़ाया गया है कि अब लैंगिक समानता की जरूरत पुरुषों को है। 58 प्रतिशत प्रतिभागियों के लिए समाचारों के लिए मेनस्ट्रीम मीडिया से बेहतर सोशल मीडिया है और 42 प्रतिशत युवाओं के आदर्श सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स हैं, जिनमें से लगभग सभी कट्टरवादी दक्षिणपंथी विचारधारा के हैं।

जाहिर है, युवाओं के बीच प्रजातंत्र की परिभाषा बदल रही है– उनके प्रजातंत्र और निरंकुश सत्ता के बीच का अंतर तेजी से मिट रहा है। वर्ष 2023 में ओपन सोसाइटी बैरोमीटर नामक संस्था ने एक अंतरराष्ट्रीय सर्वेक्षण किया था, जिसमें भारत समेत 30 देशों के प्रतिभागी शामिल किए गए थे। इन देशों की सम्मिलित आबादी 5.5 अरब है, और ये देश सभी महाद्वीप और आयवर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस सर्वेक्षण में कुल 86 प्रतिशत प्रतिभागियों ने प्रजातंत्र को शासन की सबसे अच्छी व्यवस्था और 72 प्रतिशत प्रतिभागियों ने मानवाधिकारों का समर्थन करते हुए इसे प्रजातंत्र के लिए आवश्यक बताया था। पर, इस सर्वेक्षण में भी 18 से 35 वर्ष के बीच के महज 57 प्रतिशत प्रतिभागियों ने प्रजातंत्र का समर्थन किया था।

साइंस नामक जर्नल में युवाओं के बीच प्रजातंत्र की लोकप्रियता से संबंधित अंतरराष्ट्रीय अध्ययन प्रकाशित हुआ था। यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड, नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर और एमॉरी यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों द्वारा संयुक्त रूप से किए गए अध्ययन में 6 देशों– अमेरिका, इटली, मिस्र, भारत, थाईलैंड और जापान– के प्रतिभागियों को शामिल किया गया था। इस अध्ययन के अनुसार लगभग सभी प्रतिभागी प्रजातंत्र में रहना चाहते थे और प्रजातंत्र के लिए स्वतंत्र मतदान और नागरिक स्वतंत्रता को आवश्यक मानते हैं। प्रतिभागियों के अनुसार, लैंगिक और आर्थिक समानता भी प्रजातंत्र को मजबूत करती है। अधिकतर प्रतिभागियों ने संवैधानिक संस्थाओं और न्यायपालिका की आजादी को भी प्रजातंत्र के लिए आवश्यक बताया। इस अध्ययन के अनुसार कहीं भी युवाओं के बीच प्रजातंत्र के बदलते स्वरूप के प्रमाण नहीं मिले।

प्रजातंत्र से संबंधित अनेक अध्ययन किए जा रहे हैं और इनके नतीजे भी अलग-अलग आ रहे हैं। इन सबसे परे, धरातल पर पूरी दुनिया में प्रजातंत्र लगातार पिछड़ता जा रहा है और निरंकुश सत्ता का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है। जीवंत प्रजातंत्र के गढ़ रहे यूरोपीय देशों में भी प्रजातंत्र पर खतरे बढ़ते जा रहे हैं। सोशल मीडिया को समाचारों का मुख्य स्त्रोत मान चुके युवा प्रजातंत्र के राष्ट्रवादी कट्टर दक्षिणपंथी स्वरूप को ही जीवंत प्रजातंत्र मान बैठे हैं और ऐसा ही प्रजातंत्र इस दौर में दुनिया पर काबिज है।

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