
अशहद करीम उल्फ़त को उर्दू कविता और साहित्य से गहरा लगाव है। उनका वास्तविक नाम सैयद अशहद करीम है और उनका जन्म 23 अक्टूबर 1970 को बिहार के अहमदपुर स्थित रफीगंज में हुआ। डॉ. अशहद करीम के पिता का नाम सैयद अमजद करीम और माता का नाम शहनाज़ खातून है। उन्हें बचपन से ही उर्दू के प्रति रुचि रही, जिसका प्रमाण उनकी प्रकाशित पुस्तकें हैं। अब तक उनके 3 काव्य-संग्रह ‘खामोशी लब खोल रही है’ (2010), ‘हवा तेज़ है’ (2016) और ‘पानी के चिराग’ (2025) प्रकाशित हो चुके हैं। गैर-काव्य रचनाओं में ‘जदीद ग़ज़ल: एक तजज़ियाती मुतालआ’ (बिहार और झारखंड के संदर्भ में) 2007 में प्रकाशित हुआ, जबकि ‘उर्दू मसनवियों का मकालमाती निज़ाम’ (शोध) 2011 में और ‘तनक़ीद की लकीर पर फ़िक्शन की इबारत’ (आलोचना और शोध) 2017 में प्रकाशित हुआ।
डॉ. अशहद करीम को उर्दू साहित्य से तो प्रेम है ही, क्रिकेट और फुटबॉल से भी उन्हें बेहद लगाव है। यह अलग बात है कि उनकी कोशिशें खेलों के लिए कम और उर्दू साहित्य के लिए अधिक देखने को मिली हैं। उर्दू की सेवा के परिणामस्वरूप ही उन्हें ‘खामोशी लब खोल रही है’ काव्य-संग्रह के लिए ‘बिहार उर्दू अकादमी’ की ओर से और ‘हवा तेज़ है’ काव्य-संग्रह के लिए ‘उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी’ की ओर से सम्मानित किया गया। सार्वजनिक स्तर पर भी उन्हें कई पुरस्कार मिले हैं, विशेष रूप से फैजाबाद में अस्थायी नौकरी के दौरान कई समारोहों में उन्हें सम्मानित किया गया। गद्य संबंधी प्रयासों के लिए भी उन्हें ‘अल्लामा इक़बाल फाउंडेशन’ की ओर से ‘अल्लामा इक़बाल पुरस्कार’ प्राप्त हुआ। इसके अलावा ‘नारायण दास खत्री मेमोरियल ट्रस्ट’ की ओर से ‘फैजाबाद पुस्तक मेला 2018’ का स्मृति-चिह्न भी प्राप्त हुआ।
जहाँ तक डॉ. अशहद करीम की शैक्षिक यात्रा का प्रश्न है, उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा ‘करमा हाई स्कूल’ (रफीगंज) से उत्तीर्ण की और फिर ‘मिर्ज़ा ग़ालिब कॉलेज’ (गया) से इंटरमीडिएट और स्नातक की शिक्षा पूरी की। उन्होंने स्नातकोत्तर की डिग्री उर्दू भाषा में ‘मगध विश्वविद्यालय’ (बोधगया) से प्राप्त की और फिर इसी विश्वविद्यालय से उर्दू में पीएचडी की उपाधि भी प्राप्त की। उनके शोध का विषय ‘उर्दू मसनवियों का मकालमाती निज़ाम’ था, जिसे प्रोफेसर अलीमुल्लाह हाली के मार्गदर्शन में सफलतापूर्वक पूरा किया गया। ‘सरदार वल्लभभाई पटेल कॉलेज’ (भभुआ, कैमूर) में उनकी नियुक्ति सहायक प्रोफेसर के रूप में 25 जनवरी 2020 को हुई। तब से वे पूरी लगन के साथ उर्दू के छात्र-छात्राओं में भाषा और साहित्य की ज्योति जला रहे हैं।
‘सरदार वल्लभभाई पटेल कॉलेज’ का संक्षिप्त इतिहास बताइए। क्या अतीत में इस कॉलेज से कोई बड़ी हस्ती जुड़ी रही है?
‘सरदार वल्लभभाई पटेल कॉलेज’ भभुआ का एक प्रसिद्ध शिक्षण संस्थान है, जिसकी स्थापना 1957 में हुई। प्रसिद्ध शिक्षाविद् और भारतीय संविधान सभा के सदस्य बाबू गुप्तनाथ सिंह ने इस संस्थान का नाम लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल के नाम पर रखा। प्रारंभिक दौर में कुछ समय तक यह कॉलेज ‘बिहार विश्वविद्यालय’ (मुज़फ्फरपुर) का हिस्सा रहा, लेकिन 1 अप्रैल 1975 को मगध विश्वविद्यालय, बोधगया का हिस्सा बना और फिर 1992 में जब वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय (आरा) की स्थापना हुई, तो यह उस विश्वविद्यालय का हिस्सा बन गया।
इस कॉलेज में शिक्षा का शानदार माहौल है। साफ-सुथरा परिसर, हरियाली और शांत वातावरण यहाँ की विशेषताएँ हैं। यहाँ कला, सामाजिक विज्ञान और विज्ञान के स्नातक तथा कुछ स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों के अलावा बीसीए और बायोटेक्नोलॉजी की भी शिक्षा दी जाती है। इस कॉलेज में इग्नू और नालंदा ओपन यूनिवर्सिटी के कई महत्वपूर्ण पाठ्यक्रम भी संचालित हो रहे हैं।
इस कॉलेज के ‘उर्दू विभाग’ का अतीत कैसा रहा है और वर्तमान स्थिति क्या है?
सरदार वल्लभभाई पटेल कॉलेज में उर्दू विभाग 1957 में कॉलेज की शुरुआत के साथ ही स्थापित हुआ। यहाँ उर्दू विभाग की स्थापना का उद्देश्य सभ्यता, संस्कृति और साहित्यिक विरासत में उर्दू भाषा का विकास था। इस विभाग ने भाषा, कविता और इतिहास के प्रति उत्साही छात्रों को लगातार अपनी ओर आकर्षित किया है और भाषाई उत्कृष्टता के केंद्र के रूप में विकास की मंजिलें भी तय करता रहा है। पहली बार श्रीमान अमानुल्लाह धागी ने उर्दू विभागाध्यक्ष के रूप में अपनी सेवाएँ दीं। उनके बाद श्रीमान मुहम्मद इलियास खान, श्रीमान फसीहुज़-ज़माँ, डॉ. मुहम्मद शमीम अहमद और डॉ. मुहम्मद एस. एस. शहाबुद्दीन ने उर्दू विभागाध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली। वर्तमान में यह जिम्मेदारी मैं निभा रहा हूँ और छात्रों में उर्दू भाषा के प्रति प्रेम पैदा करने के प्रयास जारी हैं।
उर्दू विभाग में समय-समय पर शिक्षकों की कमी के कारण समस्याएँ पैदा हुईं, फिर भी डॉ. मुहम्मद शमीम अहमद ने लंबे समय तक विभाग का विकास किया। बाद में वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय के पीजी विभाग की जिम्मेदारियों के कारण उन्हें यहाँ से जाना पड़ा। डॉ. फसीहुज़-ज़माँ का कार्यकाल भी उत्साहवर्धक रहा, जो मगध विश्वविद्यालय से उर्दू विभागाध्यक्ष और डीन ऑफ फैकल्टी के पद पर रहते हुए सेवानिवृत्त हुए। 2013 के बाद लगभग 7 वर्षों का एक अंतराल रहा, और फिर मेरी नियुक्ति हुई। मैंने इस विभाग के सामने मौजूद चुनौतियों को स्वीकार किया और तब से विभाग को सक्रिय बनाने तथा उर्दू को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयासरत रहा हूँ। 2020 में परिस्थितियाँ इसलिए भी खराब थीं, क्योंकि कोरोना ने तबाही मचा रखी थी। ईश्वर का शुक्र है कि मेरी लगातार कड़ी मेहनत रंग लाई और परिस्थितियाँ धीरे-धीरे बेहतर होती चली गईं। उर्दू से तो मैं प्रेम करता ही था, भभुआ शहर और ‘सरदार वल्लभभाई पटेल कॉलेज’ से भी मेरा लगाव बढ़ता गया। छात्रों को शिक्षा की ओर आकर्षित किया, विशेष रूप से उर्दू साहित्य के प्रति उनमें रुचि पैदा की। इसका परिणाम है कि आज उर्दू के छात्र-छात्राओं की उपस्थिति संतोषजनक है। सुखद बात यह है कि मेरे मार्गदर्शन में उर्दू के कुछ छात्र रोजगार भी प्राप्त कर चुके हैं।
आप कॉलेज में उर्दू विभागाध्यक्ष हैं और इस विभाग के अकेले शिक्षक हैं। यानी शिक्षण और गैर-शिक्षण, सभी जिम्मेदारियाँ आपको अकेले ही निभानी पड़ती होंगी। यह आपके लिए कितना कठिन होता है?
जहाँ तक शिक्षण संबंधी जिम्मेदारी का प्रश्न है, इसका उल्लेख मैं पहले ही कर चुका हूँ। हालाँकि कुछ बातें विचारणीय अवश्य हैं। जाहिर है, अकेले किसी विभाग को चलाना अनगिनत कठिनाइयों से भरा काम है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि मैंने शिक्षण सेवाओं और उर्दू विभागाध्यक्ष के अलावा भी कई जिम्मेदारियाँ निभाई हैं। उदाहरण के लिए, खेलों से जुड़ी जिम्मेदारियाँ भी मैंने कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर निभाईं, जो एक बिल्कुल अलग अनुभव रहा। मैं वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय की क्रिकेट टीम का प्रबंधक रहा, चयन समिति में रहा और कॉलेज के खेलों से जुड़ी सभी जिम्मेदारियाँ भी 2 वर्षों तक निभाईं। फिर उर्दू की शिक्षण संबंधी जिम्मेदारियों को देखते हुए इस सिलसिले को रोकना पड़ा।
मेरी हमेशा कोशिश रही है कि पाठ्यक्रम की शिक्षा के अलावा भी बच्चों में साहित्यिक रुचि पैदा की जाए। इसका परिणाम यह हुआ कि जिला स्तर की प्रतियोगिताओं में छात्रों ने अच्छा प्रदर्शन किया। कॉलेज की पत्रिका में पहले उर्दू के छात्रों की भागीदारी नहीं होती थी, मैंने इसे अनिवार्य किया और बच्चों से अच्छे लेख लिखवाए। छात्रों में कविता के प्रति भी रुचि पैदा करने का प्रयास किया। उरूज़ जैसे नीरस विषय को भी अब कुछ बच्चे रुचि के साथ पढ़ते हैं। शोधार्थी भी मेरे मार्गदर्शन में अपने शोध कार्य को अच्छी तरह पूरा कर रहे हैं। जहाँ तक कठिनाइयों की बात है तो ग़ालिब के शब्दों में:
मुश्किलें इतनी पड़ीं मुझ पर कि आसाँ हो गईं
सच तो यह है कि यदि आप काम करना चाहते हैं तो आसानी पैदा कर ही लेंगे, वरना शिकायतें करते-करते समय गुज़ारना कोई मुश्किल नहीं है। मैं यहाँ उर्दू भाषा में स्नातकोत्तर शिक्षा के लिए भी पूरी तरह प्रतिबद्ध हूँ और प्राचार्य महोदय से माँग की है कि बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए इस कॉलेज में स्नातकोत्तर शिक्षा की व्यवस्था की जाए। वे इस बारे में गंभीरता से विचार भी कर रहे हैं।
बिहार में उर्दू भाषा के संरक्षण के लिए कई आंदोलन चल रहे हैं। उर्दू की इस बदहाली के लिए आप किसे जिम्मेदार मानते हैं?
बिहार में उर्दू भाषा के लिए वैसे तो कई आंदोलन चल रहे हैं, लेकिन मेरे विचार से इनमें बहुत कम ऐसे आंदोलन हैं जो व्यावहारिक रूप से प्रयासरत हैं और जिनकी मेहनत में ईमानदारी शामिल है। मुझे एक घटना याद आ रही है। भभुआ में उर्दू जागरूकता के संबंध में एक कार्यक्रम था और पटना से आए एक दिखावटी प्रतिनिधि उसका नेतृत्व कर रहे थे। मुझे इसकी कोई जानकारी नहीं थी। सासाराम के किसी कॉलेज के राजनीति विज्ञान के एक प्रोफेसर भी उनके साथ थे, जिनसे संयोगवश मेरी भी जान-पहचान थी। उनका फोन आया कि– मैं भभुआ के एक कार्यक्रम में शामिल हूँ, आपसे मिलने का इच्छुक हूँ। पहुँचने पर पता चला कि कार्यक्रम उर्दू जागरूकता के संबंध में है। मुझे भी इस कार्यक्रम में कुछ बोलने के लिए कहा गया। जब मैंने कार्यक्रम के बारे में अनभिज्ञता व्यक्त की तो उन महोदय को बहुत बुरा लगा। ऐसा नहीं है कि सभी ऐसे हैं। जो लोग जमीनी स्तर पर उर्दू के लिए काम कर रहे हैं, निस्संदेह वही उर्दू के सच्चे सेवक हैं। भाषा अपने चाहने वालों से जीवित रहती है। उर्दू के संबंध में जिनकी जो जिम्मेदारियाँ बनती हैं, यदि वे उन जिम्मेदारियों का निर्वहन कर रहे हैं तो वही उर्दू के सच्चे सैनिक और अच्छे सेवक हैं।
जो ज़र्रा जिस जगह है वहीं आफ़ताब है
उर्दू साहित्य पर आपकी गहरी नजर है। क्या कहानी और काव्य-साहित्य के वर्तमान परिदृश्य से आप संतुष्ट हैं?
वर्तमान उर्दू साहित्य बेहद सक्रिय है। आवश्यकता इस बात की है कि हम इसे स्वीकार करें। वर्तमान युग किसी की रचनात्मक शक्ति को स्वीकार करने में बेहद कंजूस और पाखंडी रवैया रखता है। आज हम आधुनिक रचनात्मक दृष्टियों से दूर हैं, नए मस्तिष्कों को पढ़ना नहीं चाहते और यह सुखद बात नहीं है। मीर और ग़ालिब का व्यक्तित्व और काव्य श्रेष्ठतम है, लेकिन जब ग़ज़ल इक्कीसवीं सदी में प्रवेश कर चुकी है तो इक्कीसवीं सदी की कविता भी पढ़नी होगी। वर्तमान दौर की कविता, आलोचना, कथा-साहित्य और लेख… सब कुछ नए सिरे से पढ़ने की माँग करता है। नई रचनाओं को पढ़े बिना कुछ लोग अपने अहंकार के भ्रम में उन्हें दरकिनार कर देना चाहते हैं। सच तो यह है कि मैं आधुनिक रचनात्मक शक्ति से पूरी तरह संतुष्ट हूँ। यही भविष्य के सूरज, चाँद और चमकते सितारे हैं।
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