
डॉ. इम्तियाज़ अहमद अलीमी का संक्षिप्त परिचय:
डॉ. इम्तियाज़ अहमद अलीमी (मूल नाम इम्तियाज़ अहमद) का जन्म 5 फ़रवरी 1986 को उत्तर प्रदेश के जनपद बलरामपुर स्थित एक छोटे से गाँव मलदा में हुआ। उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा मलदा गाँव में ही धार्मिक शिक्षण संस्था ‘दारुल उलूम उस्मानिया अफ़ज़ल-उल-मदारिस’ से प्राप्त की, और फिर धार्मिक एवं आधुनिक शिक्षा की प्रतिष्ठित संस्था ‘दारुल उलूम अलीमिया’, जमदा शाही बस्ती से आलिमियत की सनद प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से 2008 में बी.ए. ऑनर्स विशिष्ट अंकों के साथ पूरा किया, जिसके लिए उन्हें ‘यूनिवर्सिटी मेडल’ से सम्मानित किया गया। 2010 में जेएनयू (नई दिल्ली) से उर्दू में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की, जबकि 2012 में जामिया मिल्लिया इस्लामिया (नई दिल्ली) से एम.फिल. किया। एम.फिल. का विषय ‘शफ़क़ की नावेल-निगारी’ था, जो उर्दू कथा-साहित्य के एक महत्वपूर्ण नाम शफ़ीक़ अहमद ख़ाँ शफ़क़ की रचनाओं का शोधपरक अध्ययन है। जामिया मिल्लिया इस्लामिया से ही उन्होंने 2013 में बी.एड. पूरा किया, और फिर 2019 में प्रोफेसर कौसर मज़हरी की निगरानी में इसी ऐतिहासिक संस्थान से पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। पीएच.डी. का विषय था ‘उर्दू नावेल: मौज़ूआत व असालीब (1960 से वर्तमान तक)’।
इम्तियाज़ अहमद अलीमी का शिक्षण एवं व्यावसायिक सफ़र भी उनकी शैक्षणिक रुचियों की तरह विविधतापूर्ण है। वे 2019 में दिल्ली विश्वविद्यालय के दयाल सिंह कॉलेज में अतिथि संकाय के रूप में संबद्ध रहे। जनवरी 2020 से मार्च 2021 तक वे एनसीईआरटी, नई दिल्ली के शिक्षा एवं भाषाविज्ञान विभाग में सहायक शिक्षक रहे। इसके बाद 2021 से 2022 तक वे इसी संस्थान में कोर्स एडमिनिस्ट्रेटर और फिर 2022 से मार्च 2023 तक सीआईईटी (एनसीईआरटी) में अकादमिक सलाहकार, उर्दू के रूप में सेवाएँ देते रहे। 2023 में कुछ समय के लिए जामिया इस्लामिया सनाबिल दिल्ली में भी अध्यापन से जुड़े और उसी वर्ष सितंबर से फ़रवरी 2024 तक जामिया मिल्लिया इस्लामिया के सीनियर सेकेंडरी स्कूल में पीजीटी, उर्दू व्याख्याता के रूप में शिक्षण सेवाएँ प्रदान कीं। इसी दौरान वे उर्दू अकादमी दिल्ली से प्रशिक्षक के रूप में भी संबद्ध रहे। 1 मार्च 2024 से वे ‘कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज’ के उर्दू विभाग में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं।
रचना और संपादन की बात करें तो इम्तियाज़ अहमद अलीमी की पहली पुस्तक ‘शफ़क़ बहैसियत नावेल-निगार’ 2014 में प्रकाशित हुई, जिसमें उन्होंने उर्दू कथा-साहित्य के एक महत्वपूर्ण रचनाकार के उपन्यासों का आलोचनात्मक एवं शोधपरक अध्ययन किया। 2018 में उन्होंने ‘जामा-ए-गुल’ शीर्षक से तारिक़ मतीन के काव्य का चयन प्रकाशित किया। उनकी तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण कृति ‘नया उपन्यास, नया परिप्रेक्ष्य’ 2021 में प्रकाशित हुई, जिसमें इक्कीसवीं सदी में उर्दू उपन्यास की नई दिशाओं, विषयों और शैलियों पर प्रकाश डाला गया है। इस पुस्तक पर उन्हें ‘उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी’ का पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। उनकी शोध और आलोचनात्मक गतिविधियों का केंद्र मुख्यतः कथा-साहित्य है, हालांकि वे किसी एक साहित्यिक प्रवृत्ति के बंधन में नहीं हैं।
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आप जिस कॉलेज से जुड़े हैं, उसका संक्षिप्त इतिहास बताएं। इस कॉलेज से कौन-कौन सी प्रसिद्ध हस्तियाँ जुड़ी रही हैं?
‘कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज’ पश्चिम बंगाल के प्राचीन और महिलाओं के प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों में गिना जाता है। इसकी स्थापना महिलाओं को उच्च शिक्षा के अवसर प्रदान करने के उद्देश्य से की गई थी। यह कॉलेज 1963 से शैक्षणिक, साहित्यिक और सामाजिक क्षेत्रों में उल्लेखनीय सेवाएँ दे रहा है। यहाँ उर्दू, हिंदी, अंग्रेज़ी और बांग्ला जैसी विभिन्न भाषाओं के अतिरिक्त मानविकी, सामाजिक विज्ञान तथा अर्थशास्त्र विभाग सक्रिय हैं और छात्राओं के सर्वांगीण व्यक्तित्व निर्माण पर विशेष ध्यान दिया जाता है। मैं अपने अब तक के अवलोकन और पिछले दो वर्षों के शिक्षण अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि पूरे कॉलेज में सबसे अधिक सक्रिय और गतिशील विभाग हमारा ‘उर्दू विभाग’ ही है। उर्दू विभाग की छात्राएँ प्रतिदिन कक्षाएँ भी करती हैं और अन्य गतिविधियों में भी पूरे उत्साह के साथ भाग लेती हैं। उन्हें पाठ्यक्रम से इतर भी कोई कार्य दिया जाता है तो निर्धारित समय पर उसे भली-भाँति पूरा करती हैं।
जहाँ तक इस संस्थान से अनेक शिक्षाविदों, साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों और सामाजिक हस्तियों की संबद्धता का प्रश्न है, तो फिलहाल जिन्हें मैं जानता हूँ उनमें डॉ. नईम अनीस साहब (पूर्व अध्यक्ष, उर्दू विभाग और वर्तमान मानद महासचिव ‘द मुस्लिम इंस्टीट्यूट’) हैं, जिन्होंने उर्दू विभाग और कॉलेज दोनों को शैक्षणिक एवं साहित्यिक जगत में परिचित कराने में उल्लेखनीय योगदान दिया। उनके अतिरिक्त वर्तमान अध्यक्ष, उर्दू विभाग डॉ. मोहम्मद इम्तियाज़ अहमद तथा अन्य शिक्षकों में डॉ. सैयद वमीक़ुल इरशाद अली अल-क़ादरी, श्रीमती शीरीन ज़फ़र और श्रीमती मुमताज़ आरा भी हैं, जिन्होंने छात्राओं के मार्गदर्शन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वास्तव में जो भी इस विभाग से जुड़ा रहा, उसने कॉलेज की शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों में बढ़-चढ़कर भाग लिया और विभाग को नई ऊँचाइयाँ प्रदान कीं। इन्हीं प्रयासों का परिणाम है कि आज हमारा कॉलेज कोलकाता के महत्वपूर्ण शैक्षणिक केंद्रों में गिना जाता है।
यह कॉलेज केवल महिलाओं के लिए है। क्या आपने यहाँ की परिस्थितियों या व्यवस्थाओं में सहशिक्षा वाले कॉलेज से कुछ भिन्नता पाई?
निस्संदेह ‘कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज’ का शैक्षणिक वातावरण, प्रशासनिक प्राथमिकताएँ और छात्राओं के पारस्परिक संबंधों की प्रकृति सहशिक्षा वाले कॉलेजों से कुछ हद तक भिन्न है। यहाँ कार्य करते हुए मैंने महसूस किया कि इस संस्थान की सभी गतिविधियों का केंद्र छात्राओं का शैक्षणिक, बौद्धिक और व्यक्तिगत विकास है। सबसे महत्वपूर्ण अंतर यह है कि कॉलेज की पूरी व्यवस्था छात्राओं की आवश्यकताओं और समस्याओं को ध्यान में रखकर बनाई गई है। प्रशासन छात्राओं की सुरक्षा, मानसिक संतुलन और शैक्षणिक उन्नति को विशेष महत्व देता है। यही कारण है कि यहाँ एक सुरक्षित, शांत और मैत्रीपूर्ण शैक्षणिक वातावरण स्थापित है, जिसमें छात्राएँ बिना झिझक अपनी राय व्यक्त करती हैं और विभिन्न शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाती हैं।
सहशिक्षा वाले कॉलेजों में छात्र और छात्राओं के बीच प्रतिस्पर्धा तथा पारस्परिक संवाद का एक अलग वातावरण होता है, जबकि कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज में छात्राओं को नेतृत्व क्षमता विकसित करने के अधिक अवसर प्राप्त होते हैं। छात्र संघ, सेमिनार, वाद-विवाद, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और अन्य सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों का नेतृत्व प्रायः छात्राओं के हाथ में होता है, जिससे उनमें आत्मविश्वास, निर्णय क्षमता और नेतृत्व कौशल विकसित होता है।
एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष शिक्षकों और छात्राओं के बीच शैक्षणिक एवं प्रशिक्षणात्मक संबंध का है। छात्राएँ प्रायः अपने शैक्षणिक, सामाजिक और व्यावसायिक मुद्दों के संबंध में शिक्षकों से खुलकर बातचीत करती हैं। इस वातावरण में शिक्षक केवल अध्यापन तक सीमित नहीं रहते बल्कि मार्गदर्शन और परामर्श की भूमिका भी निभाते हैं। प्रशासनिक स्तर पर भी कुछ अंतर स्पष्ट हैं। उदाहरण के लिए महिलाओं के स्वास्थ्य, स्वच्छता, सुरक्षा और मानसिक कल्याण से संबंधित विशेष व्यवस्थाएँ और कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। महिलाओं के अधिकार, लैंगिक समानता, आत्मनिर्भरता, कैरियर निर्माण और सामाजिक चेतना से संबंधित कार्यशालाएँ और व्याख्यान भी अपेक्षाकृत अधिक आयोजित होते हैं।
हालाँकि कुछ अवसरों पर सहशिक्षा वाले संस्थानों की तुलना में छात्र और छात्राओं के बीच प्रत्यक्ष शैक्षणिक एवं बौद्धिक आदान-प्रदान के अवसर कम होते हैं। वर्तमान समय में जब व्यावहारिक जीवन में पुरुषों और महिलाओं को साथ काम करना पड़ता है, तो इस स्थिति में सहशिक्षा का वातावरण अधिक विविध अनुभव प्रदान करता है। फिर भी कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज विभिन्न अंतर-विश्वविद्यालयीय कार्यक्रमों, सेमिनारों, सम्मेलनों और सामाजिक गतिविधियों के माध्यम से इस कमी को काफी हद तक दूर करने का प्रयास करता है।
3. आपने पहले एनसीईआरटी और दिल्ली उर्दू अकादमी में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ निभाई हैं, मदरसों और स्कूलों में भी शिक्षण सेवाएँ दी हैं। सभी स्थानों की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उर्दू का भविष्य कैसा देखते हैं?
मेरे अनुभव के अनुसार उर्दू भाषा का भविष्य उज्ज्वल है, बशर्ते हम इसे आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने का गंभीर प्रयास करें। मदरसों, स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में उर्दू की शिक्षा जारी है और नई पीढ़ी में भी उर्दू साहित्य, पत्रकारिता, अनुवाद और रचनात्मक लेखन के प्रति रुचि मौजूद है। डिजिटल मीडिया ने उर्दू के प्रसार के लिए नई राहें खोली हैं। आज उर्दू केवल एक भाषा नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक विरासत और ज्ञान-संपदा है, जिसका महत्व भविष्य में भी बना रहेगा। आवश्यकता इस बात की है कि उर्दू को रोजगार, शोध और प्रौद्योगिकी से जोड़ा जाए और छात्राओं का उचित मार्गदर्शन करते हुए उन्हें हर प्रकार की प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराई जाए। इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए समय-समय पर उन्हें प्रेरित करते रहना चाहिए ताकि वे अपने लक्ष्य तक पहुँच सकें।
4. कॉलेज में उर्दू विभाग की ओर से उर्दू के प्रचार-प्रसार के लिए किस प्रकार के प्रयास किए जाते हैं? क्या छात्राएँ साहित्यिक गतिविधियों में भाग लेती हैं?
‘कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज’ का उर्दू विभाग उर्दू भाषा और साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए विभिन्न शैक्षणिक और साहित्यिक गतिविधियों का आयोजन करता है। सेमिनार, कार्यशाला, मुशायरा, परिचर्चा, निबंध-लेखन और भाषण प्रतियोगिताएँ समय-समय पर आयोजित की जाती हैं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विषयों पर शैक्षणिक बैठकों का भी आयोजन किया जाता है ताकि छात्राओं में आलोचनात्मक और शोधपरक चेतना विकसित हो। यह प्रसन्नता की बात है कि छात्राएँ इन गतिविधियों में अत्यंत उत्साह के साथ भाग लेती हैं। उनकी रचनात्मक क्षमताओं को उभारने और उर्दू भाषा से उनके संबंध को मजबूत बनाने में ये कार्यक्रम महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
5. कोरोना के बाद शिक्षण क्षेत्र में आए डिजिटल क्रांति को आप किस दृष्टि से देखते हैं?
कोरोना के बाद शिक्षा के क्षेत्र में डिजिटल प्रौद्योगिकी का उपयोग असाधारण रूप से बढ़ा है। ऑनलाइन कक्षाएँ, डिजिटल पुस्तकालय, ई-लर्निंग प्लेटफ़ॉर्म और वर्चुअल सेमिनारों ने शिक्षण प्रक्रिया को नई दिशा प्रदान की है। मेरी दृष्टि में यह परिवर्तन एक सकारात्मक प्रगति है क्योंकि इससे शिक्षा तक पहुँच आसान हुई है और शिक्षण संसाधनों का विस्तार हुआ है। हालाँकि पारंपरिक कक्षा की महत्ता अपनी जगह बनी हुई है, क्योंकि शिक्षा केवल जानकारी के हस्तांतरण का नाम नहीं बल्कि शिक्षक और विद्यार्थी के बीच बौद्धिक और मानवीय संबंध की भी अपेक्षा करती है। इसलिए भविष्य की शिक्षा में पारंपरिक और डिजिटल दोनों तरीकों के समन्वय को अधिक प्रभावी और उपयोगी मानता हूँ।
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