शख्सियत

इंटरव्यू: पत्रकारिता छोड़ कर अध्यापन के क्षेत्र में अपनी नई पहचान बना रहे डॉ. नोमान क़ैसर

उर्दू विभाग, पटना कॉलेज, पटना विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफ़ेसर के रूप में डॉ. नोमान की नियुक्ति 4 अक्टूबर 2024 को हुई। इस से पूर्व लगभग 18 वर्षों तक उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में अनेक महत्वपूर्ण दायित्व निभाए।

डॉ. नोमान क़ैसर
डॉ. नोमान क़ैसर 

डॉ. नोमान क़ैसर का जन्म 31 दिसंबर 1977 को बिहार के ज़िला अररिया स्थित महल गांव में हुआ। उनके पिता का नाम मोहम्मद इलियास और माता का नाम शमीमा खातून है, जो इस नश्वर संसार को अलविदा कह चुके हैं। डॉ. नोमान क़ैसर का वास्तविक नाम नोमान आलम है और वह अध्ययन, कविता लेखन, संगीत तथा जनसेवा में रुचि में रखते हैं। उनका कहना है कि “पुस्तकें और कविता मेरे हृदय के निकट हैं, साहित्य मेरी प्रिय रुचि है, और अध्ययन तथा काव्य-रचना मुझे आध्यात्मिक आनंद प्रदान करते हैं।” साहित्य में डॉ. नोमान की रुचि का अनुमान उनकी प्रकाशित पुस्तकों ‘अदब कायनात’ (साहित्यिक निबंधों का संकलन, 2018), ‘निदा की तख़्लीक़ी सदा’ (संपादन, 2020) और ‘वह जो शम्स था सर-ए-आसमाँ’ (संपादन, 2021) से भली-भाँति लगाया जा सकता है। ‘निदा की तख़्लीक़ी सदा’ के लिए वर्ष 2020 में उन्हें उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी (लखनऊ) द्वारा पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।

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डॉ. नोमान क़ैसर ने आलिमियत की उपाधि जामिअतुल फ़लाह, बिलरिया गंज, आज़मगढ़ से प्राप्त की। इसके बाद बी.ए., एम.ए. और पीएच.डी. की डिग्रियाँ अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से प्राप्त हुईं। उनकी पीएच.डी. का विषय ‘बीसवीं शताब्दी में ग़ैर-अफ़सानवी नसर के इरतिक़ा में अलीगढ़ का हिस्सा’ था और उनके शोध-निर्देशक प्रोफ़ेसर शहाबुद्दीन साक़िब थे। जामिआ मिल्लिया इस्लामिया से उन्हें ‘राधाकृष्णन पोस्ट डॉक्टोरल फ़ेलोशिप’ भी प्राप्त हुई। वहां उनका शोध-विषय था ‘उर्दू नाविल के फ़रोग़ में ग़ैर-मुस्लिम क़लमकारों का हिस्सा’ और उनके मार्गदर्शक प्रसिद्ध एवं प्रतिष्ठित कवि तथा साहित्यकार प्रोफ़ेसर शहपर रसूल थे।

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डॉ. नोमान क़ैसर ने अध्यापन क्षेत्र में प्रवेश करने से पूर्व पत्रकारिता के क्षेत्र में अनेक महत्वपूर्ण दायित्व निभाए। वे 2006 से 2010 तक रोज़नामा ‘राष्ट्रीय सहारा’ में उप-संपादक रहे और 2010 से 2014 तक ‘आलमी सहारा’ उर्दू चैनल में एसोसिएट प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत रहे। ‘डीडी उर्दू’ के कार्यक्रम ‘किताब कायनात’ के वे निर्माता भी रहे। उर्दू विभाग, पटना कॉलेज, पटना विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफ़ेसर के रूप में डॉ. नोमान की नियुक्ति 4 अक्टूबर 2024 को हुई। वे कहते हैं कि “जब दिल्ली से विदा होने का समय आया तो हृदय और जिह्वा पर अनायास ज़ौक़ का यह शेर आ गया कौन जाए ज़ौक़ पर दिल्ली की गलियां छोड़कर।”

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पटना कॉलेज और उसके उर्दू विभाग के इतिहास पर संक्षेप में प्रकाश डालिए। इस विभाग से अनेक विद्वान व्यक्तित्व जुड़े रहे हैं, उनके बारे में भी कुछ बताइए।

पटना कॉलेज बिहार का एक प्राचीन, ऐतिहासिक और प्रतिष्ठित शैक्षिक संस्थान है, जिसकी स्थापना 9 जनवरी 1863 को हुई थी। यह संस्थान न केवल उच्च शिक्षा का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है, बल्कि बिहार के अनेक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों और शैक्षिक संस्थानों की आधारशिला भी माना जाता है। प्रारंभ में यह संस्थान कलकत्ता विश्वविद्यालय से संबद्ध था, किंतु 1 अक्टूबर 1917 को पटना विश्वविद्यालय की स्थापना के बाद इसे उससे संबद्ध कर दिया गया। पटना विश्वविद्यालय बिहार का पहला तथा भारत-पाक उपमहाद्वीप का ग्यारहवाँ सबसे प्राचीन विश्वविद्यालय है। प्रारंभ में यह एक संबद्ध विश्वविद्यालय था, जो विद्यालय स्तर से लेकर उच्च शिक्षा तक की परीक्षाओं की देखरेख करता था, किंतु 1952 में इसे शिक्षण एवं आवासीय विश्वविद्यालय का विधिवत दर्जा प्रदान कर दिया गया।

उर्दू विभाग, पटना कॉलेज का इतिहास अत्यंत गौरवशाली है। अतीत में उर्दू के अनेक बड़े साहित्यकार इस विभाग से जुड़े रहे हैं। पटना कॉलेज में उर्दू विभाग की स्थापना लगभग 1920 के आसपास हुई। प्रोफ़ेसर अज़ीमुद्दीन अहमद इसके प्रथम विभागाध्यक्ष बने (वे उर्दू के प्रसिद्ध आलोचक प्रोफ़ेसर कलीमुद्दीन अहमद के पिता थे)। उनके बाद विभाग का नेतृत्व प्रतिष्ठित कथाकार एवं शोधकर्ता प्रोफ़ेसर अख़्तर ओरैनवी ने किया। विभाग के अन्य अध्यापकों में प्रोफ़ेसर मोहम्मद सदरुद्दीन, प्रोफ़ेसर मोहम्मद मतीउर्रहमान, प्रोफ़ेसर मुमताज़ अहमद, अल्लामा जमील मज़हरी, प्रोफ़ेसर एम. वाई. ख़ुर्शीदी, पद्मश्री कलीम आजिज़, प्रोफ़ेसर सुरैया जबीं, प्रोफ़ेसर एजाज़ अली अरशद और प्रोफ़ेसर अशरफ़ जहाँ जैसे उर्दू साहित्यकारों की एक आकाशगंगा है, जिनके ज्ञान और चिंतन की सुगंध से उर्दू जगत सुवासित और आलोकित है।

आप अध्यापन क्षेत्र में आने से पहले उर्दू पत्रकारिता से जुड़े हुए थे। पत्रकारिता के क्षेत्र से निकलकर शिक्षक बनने का अनुभव कैसा रहा?

जी हां, अध्यापन के पेशे से जुड़ने से पहले मैंने वर्षों तक पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्य किया। इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया, दोनों से मेरा संबंध रहा। व्यावहारिक और पत्रकारिक जीवन की शुरुआत उर्दू दैनिक ‘राष्ट्रीय सहारा’ से की, जिसके बाद ‘आलमी सहारा उर्दू’ चैनल और फिर ‘डीडी उर्दू’ से लगभग 10 वर्षों तक जुड़ा रहा। ‘राष्ट्रीय सहारा’ से यह संबंध मेरे लिए अत्यंत सुखद अनुभव सिद्ध हुआ। पढ़ना, लिखना और विद्वानों तथा साहित्यिक हस्तियों से मिलना हमेशा मेरे लिए हृदयगत आनंद का कारण रहा है और सौभाग्य से पत्रकारिता का पेशा इन तीनों तत्वों का सुंदर समन्वय है।

वास्तविकता यह है कि पत्रकारिता में मेरी बहुत रुचि नहीं थी, बल्कि पारिवारिक परिस्थितियाँ और आर्थिक आवश्यकताएँ मुझे इस क्षेत्र में ले आई थीं। यही कारण है कि लगभग 18 वर्षों तक पत्रकारिता से जुड़े रहने के बावजूद मेरा मन अध्यापन की ओर ही आकर्षित रहा। अतः जब ईश्वर की कृपा से सहायक प्रोफ़ेसर के पद पर नियुक्ति हुई तो ऐसा प्रतीत हुआ मानो मेरी एक दीर्घकालिक अभिलाषा पूर्ण हो गई हो।

यद्यपि दिल्ली से गहरा लगाव स्थापित हो चुका था, किंतु शिक्षा और अध्यापन का क्षेत्र अपनी आध्यात्मिकता, पवित्रता और सार्थकता के कारण सदैव मेरे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। यह केवल ज्ञान के हस्तांतरण का नाम नहीं, बल्कि मानवीय मस्तिष्क और विचारों के निर्माण, चरित्र के विकास तथा समाज के सुधार का एक पवित्र दायित्व है, जिसका संबंध पैग़म्बरों की परंपरा से है। संभवतः यही कारण है कि यह पेशा मुझे अत्यंत प्रिय है और इसके लिए मैं किसी भी अन्य व्यस्तता और पेशे का त्याग करने के लिए तैयार हूं।

उर्दू विभाग के छात्र-छात्राओं में उर्दू के प्रति किस प्रकार का रुझान देखते हैं? क्या उनके भीतर आपको उर्दू से प्रेम का भाव दिखाई देता है, या फिर ऐसे छात्रों की संख्या अधिक है जो केवल डिग्री प्राप्त करना चाहते हैं?

मेरे विचार से इस प्रश्न का जितना संबंध छात्रों से है, उतना ही अध्यापकों से भी है। छात्र गीली मिट्टी के समान होते हैं, उन्हें जिस साँचे में ढाला जाए, जिस प्रकार का संस्कार दिया जाए, वे उसी रूप में ढल जाते हैं। यदि अध्यापक योग्य और रसिक है, उसे कविता और साहित्य की समझ है, तो वह छात्रों में साहित्य के प्रति रुचि उत्पन्न कर सकता है। यह संभव नहीं कि कक्षा के सभी छात्र साहित्य-प्रेमी बन जाएँ, किंतु यदि 25 प्रतिशत छात्रों में भी साहित्य के प्रति रुचि विकसित हो जाए तो यह बड़ी उपलब्धि होगी। मुझे यह दावा बिल्कुल नहीं है कि मैंने छात्रों में साहित्य का गहरा रस विकसित कर दिया है, किंतु मुझे इस बात का संतोष अवश्य है कि उर्दू विभाग, पटना कॉलेज में छात्रों की एक बड़ी संख्या ऐसी है जो भाषा और साहित्य के प्रति गंभीर है। भौतिकवाद और उपभोक्तावाद के इस युग में उर्दू भाषा और साहित्य की शिक्षा प्राप्त करना उनके लिए किसी भी प्रकार से हानिकारक नहीं है। छात्रों को हीन भावना से बाहर निकालना और उनमें उर्दू के प्रति आत्मविश्वास उत्पन्न करना अत्यंत आवश्यक है।

अधिकांश कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में उर्दू विभाग की स्थिति अत्यंत दयनीय है। आपके यहाँ क्या स्थिति है? क्या कॉलेज प्रशासन इस विभाग की समस्याओं पर ध्यान देता है?

उर्दू विभाग, पटना कॉलेज की पिछले 10 वर्षों की कार्यप्रणाली यदि संतोषजनक नहीं रही, तो इसके लिए विश्वविद्यालय और कॉलेज प्रशासन से अधिक निर्णयकर्ता उत्तरदायी हैं। क्योंकि वहाँ 2003 के बाद कोई नियुक्ति नहीं हुई थी। जो अध्यापक थे, उनमें से अधिकांश सेवानिवृत्त हो चुके थे। उनकी सेवानिवृत्ति के बाद वहाँ की शैक्षिक स्थिति में काफ़ी गिरावट आ गई। किंतु इसके बावजूद पटना विश्वविद्यालय ने बिहार के विश्वविद्यालयों में अपनी शैक्षिक प्रतिष्ठा बनाए रखने का प्रयास किया। पटना कॉलेज के उर्दू विभाग में अतिथि संकाय और अंशकालिक अध्यापकों की सेवाएँ ली गईं और ज्ञान का दीप बुझने से बचाया गया। यह कॉलेज प्रशासन की रुचि ही है कि वर्तमान में पटना कॉलेज में 3 स्थायी और एक अंशकालिक अध्यापक अध्यापन कार्य कर रहे हैं।

पटना कॉलेज में 2020 में डॉ. बाल्मीकि राम की नियुक्ति हुई तो उन्होंने विभाग की सक्रियता पर विशेष बल दिया। उन्होंने छात्रों और उर्दू विभाग के बीच टूट चुके संबंध को पुनः स्थापित किया। मैं मानता हूँ कि विभागाध्यक्ष के रूप में यह उनकी बड़ी उपलब्धि है। उनके अतिरिक्त डॉ. अब्दुल बासित हमीदी और डॉ. नरगिस फ़ातिमा के प्रयासों से पटना कॉलेज में उर्दू का समग्र वातावरण संतोषजनक है। मैं भी इस दिशा में अपनी ओर से पूर्ण सक्रियता का परिचय देता हूँ।

आपने राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में लंबा समय बिताया है और वहाँ साहित्यिक गतिविधियों का हिस्सा भी रहे हैं। अब बिहार की राजधानी पटना में उर्दू की सेवा कर रहे हैं। आपने उर्दू भाषा को कहाँ अधिक समृद्ध पाया?

मैंने जीवन की आवश्यकताओं और आर्थिक जरूरतों के कारण मीर और ग़ालिब की धरती अर्थात शाहजहानाबाद में अपने जीवन के लगभग 18 वर्ष बिताए। वहाँ की साहित्यिक, सांस्कृतिक और सभ्यतागत संस्थाओं को निकट से देखने और समझने का अवसर मिला। साहित्यिक व्यक्तित्वों से मिलने और उनकी संगति से लाभ प्राप्त करने का अवसर भी वहीं उपलब्ध हुआ। दिल्ली केवल भारत का हृदय ही नहीं, बल्कि संस्कृति और सभ्यता का उद्गम-स्थल भी है। यह नगर उर्दू संस्कृति, सभ्यता और भाषायी बहुलता की दृष्टि से विश्व में विशिष्ट स्थान रखता है। यहाँ जेएनयू, डीयू और जामिआ मिल्लिया इस्लामिया जैसे केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं, जहाँ समय-समय पर उर्दू के सेमिनार और संगोष्ठियाँ आयोजित होती रहती हैं। राष्ट्रीय परिषद, दिल्ली उर्दू अकादमी, ग़ालिब इंस्टिट्यूट और ग़ालिब अकादमी के अतिरिक्त अनेक संस्थाएँ और संगठन हैं, जिनके बैनर तले नियमित रूप से साहित्यिक और काव्यात्मक कार्यक्रम आयोजित होते रहते हैं।

शाहजहानाबाद की तुलना में अज़ीमाबाद एक छोटा नगर है, इसके बावजूद यहाँ भी उर्दू कविता और साहित्य का वातावरण विद्यमान है। यहाँ भी समय-समय पर साहित्यिक और काव्य गोष्ठियाँ आयोजित होती रहती हैं। इसलिए यह कहा जा सकता है कि दिल्ली के बाद बिहार ऐसा राज्य है जहाँ उर्दू-प्रेमियों की बड़ी संख्या निवास करती है। बिहार के उर्दू-प्रेमी इस प्रिय भाषा से न केवल प्रेम करते हैं, बल्कि इसके प्रचार-प्रसार के लिए भी सदैव प्रयासरत रहते हैं।

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