
हिन्दी में संत कवियों की लंबी परंपरा रही है। उसमें संत रविदास न सिर्फ अपने संतत्व बल्कि जीवन और सृजन में भी समता, स्वतंत्रता, न्याय, बंधुत्व और मनुष्यता के सबसे प्रखर और निडर पैरोकार रहे हैं। अकारण नहीं कि ज्यादातर आलोचक उनको हिन्दी प्रदेश का पहला ऐसा संत कवि बताते हैं, जिसने सम्यक आजीविका पर जोर देकर लोगों को नेक कमाई की शिक्षा दी और उसे ही धर्म मानने को कहा : 'स्रम को ईस्वर जानि कै जो पूजै दिन रैन, रैदास तिनि संसार मा सदा मिलै सुख चैन!'
इससे भी बड़ी बात यह कि उन्होंने अपनी रचनाओं में आदर्श समाज और अच्छे राज्य की जो अवधारणा पेश कीं, वह हू-ब-हू हमारे संविधान के संकल्पों जैसी है। मिसाल के तौर पर- ऐसा चाहौं राज मैं जहं मिलै सभन को अन्न, छोट बड़ो सभ सम बसैं रैदास रहै प्रसन्न! वह जिस समतामूलक राज्य की कल्पना करते थे, उसे उन्होंने बेगमपुरा नाम दिया था : बे-गम यानी दु:खों से मुक्त।
ऐसे राज्य की उनकी चाह उन्हें वसुधैव कुटुंबकम की भावना से आगे ही नहीं, इस सतर्क तर्क तक भी ले जाती है कि जब सभी लोग हाड़-मांस और खून के ही बने हैं, तो परस्पर भिन्न या छोटे-बड़े कैसे हो सकते हैं? वह पूछते हैं : जब सभ कर दोउ हाथ पग दोउ नैन दोउ कान, रविदास पृथक कइसे भए हिन्दू औ मूसलमान?
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जानकारों के अनुसार, विक्रम संवत् 1441 से 1455 के बीच रविवार को पड़ी किसी माघ पूर्णिमा के दिन उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में मंडेसर तालाब के किनारे मांडव ऋषि के आश्रम के पास स्थित मांडुर नामक उसी गांव में उनका जन्म हुआ था, जो अब मंडुआडीह कहलाता है। उनके पिता संतोषदास, रग्घू अथवा राघव थे, जबकि माता कलसां अथवा करमा और जीवनसंगिनी लोना।
तत्कालीन सामाजिक गैरबराबरी और ऊंच-नीच की जाई हिकारत की निगाहों ने उनकी माता को तो तिरस्कारपूर्वक ‘घुरबिनिया’ जैसी अपमानकारी संज्ञा दे ही डाली थी, तो सदियों से चले आ रहे इस अपमान से वह स्वयं भी कुछ कम नहीं पीड़ित हुए। इसी का फल था कि आगे चलकर वह भक्ति काव्यधारा की उस बहुजन-श्रमण परंपरा के निर्माता संत कवियों में से एक बने, जो हमारी सामाजिक व्यवस्था के ऊंच-नीच, विषमता और परजीविता के पोषक सारे अमानवीय मूल्यों को दरकिनार कर मनुष्यमात्र की समता की हिमायत करती रही है।
बाबासाहब डॉ. भीमराव आम्बेडकर के शब्दों में कहें तो यह परंपरा क्रांतिकारी भी है और साहसिक भी। इस परंपरा के आलोक में संत रविदास के लिखे या कहे को कहीं से भी पढ़ना शुरू किया जाए, उनकी यह केन्द्रीय चिंता सामने आए बिना नहीं रहती कि जाति का रोग, जो मनुष्य को जन्म के आधार पर ऊंचा या नीचा ठहराता है, मनुष्यता को निरंतर खाए जा रहा है। वह कहते हैं कि आदमी के आदमी से जुड़ने में यह जाति ही सबसे बड़ी बाधा है और ‘रैदास ना मानुष जुड़ सके, जब लौं जाय न जात।’
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ऐसा कहे बगैर वह रह भी कैसे सकते थे, जब उनके समय में ऊंच-नीच और छुआ-छूत जैसी सामाजिक बीमारियों ने न सिर्फ सहज मनुष्यता का मार्ग अवरुद्ध कर रखा था, बल्कि अन्त्यज करार दी गई जातियों को सर्वाधिक त्रास झेलने को अभिशप्त कर रखा था। वह इन व्याधियों को धर्म और संस्कृति का चोला पहन कर आती और स्वीकृति पाती देखते, तो कुछ ज्यादा ही त्रास पाते थे।
ऐसे में स्वाभाविक ही था कि वह अपनी रचनाओं में पीड़ित के रूप में उनका प्रतिरोध करते और उनके कवच-कुंडल बने पाखंडों और कुरीतियों के विरुद्ध मुखर होते। पीड़ित के रूप में उनका तत्कालीन धर्म और संस्कृति को उस रूप में न लेना भी, जिसमें रामझरोखे बैठकर मुजरा लेने वाले दूसरे संतकवि लेते थे, कतई अस्वाभाविक नहीं है। उन कवियों से अलग, प्रतिरोधी और वैकल्पिक नजरिये के साथ सामने आकर उस श्रमण संस्कृति से ऊर्जा ग्रहण करते दिखाई देना भी नहीं, जो उन दिनों की मेहनत-मजदूरी करने वाली जनता का एकमात्र अवलंब थी।
यह भी उनका साहस ही था, जिसके कारण वह कई और कदम आगे बढ़कर यह तक कह पाए कि उनके तईं बेदीन होना और पराधीन होना एक ही बात है और ‘पराधीन को दीन क्या, पराधीन बेदीन’ की व्यवस्था देते हुए अपने सारे साहित्य को बेदीन, हीन और पराधीन लोगों से प्रीति और मिताई की गाथा बना दिया। जो भी विसंगति या व्यवस्था इस प्रीति और मिताई के आड़े आई, उसको झाडने और झिंझोड़ने में उन्होंने कतई कोई कोर-कसर नहीं रखी। मनुष्य-मनुष्य में भेद करने वाले हर सिद्धांत, कर्मकांड, आडंबर और विश्वास को भरपूर ठोकर लगाई।
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उनका साफ मानना था कि ईश्वर को जप-तप, व्रत-दान, पूजा-पाठ, गृहत्याग और इन्द्रिय दमन आदि के मार्फत नहीं पाया जा सकता। न ही जटाएं बढ़ाकर गुफाओं और कंदराओं में खोजने से। वह मिलेगा तो बस मानव प्रेम में, क्योंकि वह प्रेम में ही निवास करता है।
इसलिए, जैसा कि पहले बता आए हैं, उन्होंने लोगों से सम्यक आजीविका और नेक कमाई को ही अपना धर्म एवं श्रम को ईश्वर मानकर दिन-रात उसे ही पूजने एवं पसीने को पारस मानने को कहा और बताया कि संसार में सुख पाने और चैन से रहने का बस यही एक रास्ता है! इससे भी बड़ी बात यह कि अनेक परउपदेशकुशलों की तरह उनकी यह सीख अन्यों के लिए ही नहीं थी। वह स्वयं भी श्रम करके ही जीवन-यापन करते और श्रम करके जीने को सबसे बड़ा मूल्य मानते थे।
उनका यह भी मानना था कि मानवीय नैतिकता के किसी भी नियम से मनुष्य मनुष्य के बीच के जाति और धर्म आधारित पार्थक्य को सही नहीं ठहराया जा सकता और इस बात को वह अपनी बौद्धिक प्रतिभा, तर्कशक्ति, अनुभव और विवेक से सिद्ध करके बार-बार कहते हैं। कहते ही नहीं, खुद को मंदिर-मस्जिद से दूर रखकर हिन्दू-मुस्लिम दोनों से प्रेम करते और बार-बार जोर देकर कहते थे कि हिन्दुओं और मुसलमानों में कोई भेद नहीं है। जिन तत्वों से हिन्दू बने हैं, उन्हीं तत्त्वों से मुसलमान और दोनों के जन्म का तरीका भी एक ही है -हिन्दू तुरुक महि नाहि कछु भेदा दुई आयो इक द्वार। प्राण पिण्ड लौह मास एकहि रविदास विचार।
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अपनी जाति और पेशे को लेकर भी रविदास के मन में कोई हीनताबोध का भाव नहीं है। इस कारण उनकी अन्त्यज श्रमजीवी की जिंदगी भी कुछ कम सामाजिक संदेश नहीं देती, जिसे लेकर उनके वक्त में ही कई मिथक गढ़ डाले गए थे। इनमें सबसे ज्यादा प्रचारित मिथक ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ वाला है, जबकि दूसरा वह, जिसमें वह उनकी गरीबी से करुणाविगलित एक संत के दिए पारस पत्थर से लोहे को सोने में परिवर्तित कर अपनी गरीबी दूर करने के बजाय श्रमजीवियों के लिए उनके पसीने को ही पारस पत्थर बताते और उस पर ही भरोसा करने को कहते हैं।
कई किंवदंतियां हैं, जो रविदास को चमत्कारिक व्यक्तित्व से परिपूर्ण तो सिद्ध करती हैं लेकिन प्रगतिशील विचारक और क्रांति द्रष्टा महापुरुष की उनकी छवि से न्याय नहीं करतीं। परंपरावादी ठहराने लगती हैं, सो अलग।
दलित विचारक अंगनेलाल के अनुसार, ऐसी किंवदंतियां उन लोगों ने गढ़ दी हैं, जिनके पास रविदास के इस प्रश्न का उत्तर नहीं था : एकै चाम एक मल-मूतर एक खून एक गूदा, एक बूंद से सभ उत्पन्ने को बाभन को सूदा? अंगनेलाल के अनुसार, इससे खीझे हुए लोग चाहते थे कि रविदास की अपनी परंपरा का स्वतंत्र विकास न हो और वह खुद हारकर उनकी परंपरा में चले जाएं। लेकिन रविदास अविचलित रहे।
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