
हिंदी सिनेमा के पुराने दौर के गीत आज भी लोगों के दिलों में खास जगह रखते हैं। ऐसे ही सुनहरे दौर के एक बड़े गीतकार शकील बदायूंनी भी थे, जिनके गीतों में एक अलग ही मिठास और गहराई होती थी, जो सीधे दिलों तक पहुंचती थी। उन्होंने 20 अप्रैल 1970 को आखिरी सांस ली, लेकिन उनके गानों के बोल आज भी लोगों की जुबान पर हैं। उनकी जिंदगी की सबसे खास बात यह रही कि उन्होंने सुरक्षित रास्ता छोड़कर सपनों का रास्ता चुना और इतिहास रच दिया।
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शकील बदायूंनी का जन्म 3 अगस्त 1916 को उत्तर प्रदेश के बदायूं में हुआ था। उनका असली नाम शकील अहमद था, लेकिन अपने शहर के नाम को 'तखल्लुस' के तौर पर नाम के साथ रख लिया। बचपन से ही उन्हें पढ़ाई के साथ-साथ शायरी में रुचि होने लगी। आगे की पढ़ाई के लिए वह अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी पहुंचे, जहां उन्होंने मुशायरों में हिस्सा लेना शुरू किया और धीरे-धीरे पहचान बनाने लगे।
पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने दिल्ली में सप्लाई ऑफिसर की सरकारी नौकरी शुरू की। उस समय सरकारी नौकरी बड़ी सुरक्षित मानी जाती थी। लेकिन शकील बदायूंनी का मन गीत लिखने में रमता था। आखिरकार उन्होंने बड़ा फैसला लिया और अपनी नौकरी छोड़ दी। यह कदम जोखिम भरा था, लेकिन उन्होंने हिम्मत दिखाई और साल 1944 में मुंबई पहुंच गए। यही फैसला उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ बन गया।
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मुंबई पहुंचने के बाद उनकी मुलाकात फिल्म निर्माता ए.आर. करदार और महान संगीतकार नौशाद से हुई। उन्होंने पहली मुलाकात में ही अपनी शायरी से सबको प्रभावित कर दिया। उन्होंने एक लाइन लिखी, ''हम दर्द का अफसाना दुनिया को सुना देंगे…" यही लाइन उनके करियर की शुरुआत बन गई। उन्हें फिल्म 'दर्द' के लिए गीत लिखने का मौका मिला और उनके गाने लोगों को बहुत पसंद आए।
इसके बाद शकील बदायूंनी और नौशाद की जोड़ी ने हिंदी सिनेमा को कई यादगार गीत दिए। 'बैजू बावरा', 'मदर इंडिया' और 'मुगल-ए-आजम' जैसी फिल्मों के गाने आज भी अमर हैं। 'प्यार किया तो डरना क्या' और 'मन तड़पत हरि दर्शन को आज' जैसे गीतों में उनकी लेखनी की गहराई दिखी।
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शकील बदायूंनी की खासियत यह थी कि वह हर तरह के गीत लिख सकते थे। उन्होंने रोमांस, दर्द, भक्ति और देशभक्ति, हर भावना को अपने शब्दों में ढाला। उनके गीत आसान भाषा में होते थे, लेकिन उनका असर बहुत गहरा होता था। यही वजह है कि उनके लिखे गाने आज भी हर पीढ़ी को पसंद आते हैं।
अपने करियर में शकील बदायूंनी ने करीब 90 फिल्मों के लिए गीत लिखे और इतना ही नहीं तीन बार फिल्मफेयर पुरस्कार भी जीते। उन्हें 'चौदहवीं का चांद', 'हुस्नवाले तेरा जवाब नहीं' और 'कहीं दीप जले कहीं दिल' जैसे गीतों के लिए सम्मान मिला। 20 अप्रैल 1970 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
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