
कोरोना महामारी ने मोहम्मद आरिफ खान ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में उनके जैसे लाखों लोगों के कारोबार पर ताला लगा दिया था, लेकिन निराशा को कुफ्र समझने वाले फिर से खड़े हुए और अपनी मेहनत से जीवन के लिए नई राह तलाश की।
इंसान अपने जीवन में कई सपने देखता है, लेकिन हर सपना पूरा हो जाए, यह जरूरी नहीं। खास तौर से अगर सपना आजीविका से जुड़ा हुआ नहीं है, तो फिर उसका पूरा होना असंभव ही समझ लीजिए। जाहिर है डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक या व्यापारी बनने का सपना अगर कोई देखता है तो मेहनत और गहरी लगन से सफलता जरूर मिल जाती है। लेकिन अगर किसी ने आजीविका से अलग हटकर कुछ ऐसा करने की कोशिश की, जिससे हृदय को शांति मिले या समाज की सेवा हो सके, तो फिर रास्ते बेहद कठिन हो जाते हैं। कुछ ऐसा ही सपना उत्तर प्रदेश के जौनपुर निवासी मोहम्मद आरिफ खान ने 2012 में देखा था, जिसकी पूर्ति 2024 में कुछ इस तरह हुई कि वह इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते थे। सपना था जौनपुर में बैंक्वेट हॉल खोलने का, जो इस समय ‘तंदूरी दरबार’ के नाम से पूरे क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान बना चुका है। नाम से यह एक रेस्तरां लगता है, लेकिन बैंक्वेट हॉल का यह नाम रखने के पीछे एक खास वजह छिपी है, जिससे पर्दा हम आगे उठाएंगे।
बैंक्वेट हॉल का सपना देखने और फिर उसे साकार करने वाले मोहम्मद आरिफ खान का जन्म 2 अगस्त 1978 को जौनपुर में हुआ था। उन्होंने बनारस स्थित ‘विद्यापीठ विश्वविद्यालय’ से 2002 में उर्दू विषय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। उर्दू साहित्य से प्रेम रखने वाले मोहम्मद आरिफ को हमेशा यह कसक महसूस होती थी कि जौनपुर में कोई ऐसा बैंक्वेट हॉल नहीं है, जहाँ स्थानीय लोग साहित्यिक कार्यक्रम बेहतर ढंग से आयोजित कर सकें या फिर किसी खुशी के अवसर पर उत्सव का आयोजन कर सकें। इस कसक का एहसास उन्हें 2012 में बेहद शिद्दत के साथ हुआ, जब वे साहित्यिक और राजनीतिक गतिविधियों का हिस्सा रहते थे। छोटी सी सभा आयोजित करने के लिए भी उन्हें ऐसी जगह नहीं मिल पाती थी, जहां सम्मानित व्यक्तियों के साथ गंभीर बातचीत हो सके। यही वह अवसर था जब उन्होंने संकल्प लिया कि परिस्थितियां बेहतर हुईं तो स्वयं बैंक्वेट हॉल की नींव रखेंगे। हालांकि एक ओर ‘आजीविका की चिंता’ और दूसरी ओर ‘दिल की इच्छा’, यह सपना कैसे पूरा हो, उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था।
वास्तव में 2002 के बाद से ही मोहम्मद आरिफ खान आजीविका के लिए अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े, लेकिन कभी असफलता हाथ लगी और कभी सफलता के बावजूद कुछ ऐसी परिस्थितियां पैदा हुईं कि सब कुछ छोड़कर घर बैठना पड़ गया। सबसे पहले उन्होंने कंप्यूटर के महत्व को समझते हुए हार्डवेयर का पाठ्यक्रम किया और एक हार्डवेयर केंद्र शुरू किया। 2003-04 में बिहार के एक गैर-सरकारी संगठन से भी जुड़े और ‘वैश्विक कंप्यूटर साक्षरता मिशन’ की फ्रेंचाइजी लेकर जौनपुर में ही कंप्यूटर का ज्ञान फैलाना शुरू कर दिया। इस दौरान मोहम्मद आरिफ ने मेहनत तो बहुत की, लेकिन जिस परिणाम की उम्मीद थी, वह प्राप्त नहीं हुआ। 2005 में उन्होंने दिल्ली के लिए प्रस्थान किया और रेडीमेड परिधान की एक बड़ी कंपनी में नौकरी कर ली। अपना कारोबार करने का शौक होने के कारण दिल्ली में उनका मन नहीं लगा, इसलिए रेडीमेड परिधान कंपनी से एक समझौता कर 2008 में वापस जौनपुर आ गए और अपनी परिधान की दुकान शुरू कर दी। यह फ्रेंचाइजी प्रणाली उनके लिए बहुत लाभदायक साबित हो रही थी, लेकिन अचानक कंपनी ने पूरे भारत में फ्रेंचाइजी व्यवस्था बंद करने की घोषणा कर दी। यानी सफलता की सीढ़ियां चढ़ रहे मोहम्मद आरिफ अचानक फिसलकर जमीन पर आ गए।
यह समय मोहम्मद आरिफ खान के लिए एक बड़ी परीक्षा वाला साबित हुआ। उन्हें अपने पिता के प्लास्टिक सामान बनाने वाली मशीन से जुड़े कारोबार में हाथ बंटाना पड़ा, ताकि खाली न बैठना पड़े। लेकिन उन्हें इस पारिवारिक कारोबार में बिल्कुल रुचि नहीं थी, इसलिए बहुत सोच-विचार के बाद विदेशों में सामान निर्यात करने का इरादा किया। इसके लिए बाजार का अनुमान लगाने के उद्देश्य से लगभग एक वर्ष तक वे विभिन्न खाड़ी देशों में रहे। 2016 में उन्होंने सब्जियां और मसाले दुबई व शारजाह आदि भेजना शुरू कर दिया। इस कारोबार में उन्हें दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की मिली और वे एक तरह से संतुष्ट हो गए। एक छोटी-सी टीम बनाकर अपना कारोबार तेजी से फैला रहे थे कि अचानक 2019 में कोरोना महामारी ने सब कुछ तहस-नहस कर दिया। मोहम्मद आरिफ खान ने बताया कि उड़ानें कई महीनों तक बंद रहीं, जिसने कारोबार को पूरी तरह ठप कर दिया। उन्हें 30 से 35 लाख रुपये का नुकसान उठाना पड़ा और ऐसा लगा जैसे सब कुछ खत्म हो गया।
कोरोना महामारी ने मोहम्मद आरिफ खान ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में उनके जैसे लाखों लोगों के कारोबार पर ताला लगा दिया था। अधिकांश लोग इस झटके को सहन नहीं कर पाए, लेकिन निराशा को कुफ्र समझने वाले फिर से खड़े हुए और अपनी क्षमता व मेहनत से जीवन के लिए नई राह तलाश की। मोहम्मद आरिफ खान ने भी स्वयं को संभाला और कुछ नया करने के जज्बे के साथ कदम आगे बढ़ाया। इस बार उन्होंने रेस्तरां खोलने की तैयारी की और बहुत योजना के साथ सितंबर 2022 में इसकी शुरुआत हुई। रेस्तरां का नाम रखा गया ‘तंदूरी दरबार’, जो कम समय में ही स्थानीय लोगों की पसंद बन गया। यहां के स्वादिष्ट व्यंजनों ने लोगों को इस कदर दीवाना बना दिया कि जौनपुर ही नहीं, आसपास के क्षेत्रों से भी शादी और अन्य समारोहों के लिए ऑर्डर्स मिलने लगे। कुछ लोगों ने सलाह दी कि पास में ही अगर कोई हॉल बन जाए तो बहुत सुविधाएं मिल जाएंगी। यही वह अवसर था जब मोहम्मद आरिफ खान को बैंक्वेट हॉल का सपना पूरा होता दिखाई दिया। उन्होंने बिना देर किए आसपास के लोगों से बातचीत शुरू की और खुशी की कोई सीमा नहीं रही, जब रेस्तरां से लगी जगह उन्हें बैंक्वेट हॉल के लिए मिल गई। तुरंत उन्होंने उस जगह का नवीनीकरण शुरू किया और एक दीवार तोड़कर रेस्तरां को उससे जोड़ दिया। जब बैंक्वेट हॉल का नाम रखने की बारी आई तो मोहम्मद आरिफ के मन में केवल ‘तंदूरी दरबार’ ही चल रहा था, क्योंकि यह नाम जौनपुर में हर खास और आम की जुबान पर चढ़ चुका था।
नवंबर 2024 वह यादगार क्षण था, जब बैंक्वेट हॉल का उद्घाटन हुआ। अब यह बैंक्वेट हॉल और रेस्तरां एक-दूसरे के लिए अनिवार्य बन चुके हैं। 2 वर्षों में यहां लगभग 150 छोटे-बड़े समारोह आयोजित हो चुके हैं और खास बात यह है कि साहित्यिक कार्यक्रमों के लिए मोहम्मद आरिफ खान कोई राशि नहीं लेते हैं। कई अवसरों पर तो भोजन की भी निःशुल्क व्यवस्था करते हैं। यह उनके समर्पण का भी प्रमाण है और साहित्य के प्रति उनके प्रेम का भी। सुखद बात यह है कि ‘आजीविका’ के रूप में रेस्तरां और ‘दिल की इच्छा’ बैंक्वेट हॉल, दोनों ही कम समय में सफलता का परचम लहराने के साथ-साथ आर्थिक लाभ का साधन भी बन रहे हैं।
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