
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आरक्षण को लेकर बिहार में एनडीए सरकार के भीतर के मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं। शनिवार को बिहार में स्थिति उस समय देखने लायक हो गई, जब केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने मोदी सरकार में ही मंत्री जीतन राम मांझी और उनके बेटे राज्य मंत्री संतोष सुमन पर आरक्षण प्रणाली में बदलाव की मांग को लेकर सीधा हमला बोला। इसके बाद मांझी ने भी चिराग पर पलटवार करते हुए निशाना साधा।
चिराग पासवान ने एससी/एसटी आरक्षण में 'क्रीमी लेयर' प्रावधान लागू करने की मांग का विरोध करते हुए कहा कि ऐसे कदम की वकालत करने वालों को पहले अपने पदों से इस्तीफा दे देना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आरक्षण नीति आर्थिक स्थिति पर आधारित नहीं है, बल्कि सदियों से चले आ रहे सामाजिक भेदभाव, बहिष्कार और अस्पृश्यता को दूर करने के लिए बनाई गई है। उन्होंने कहा कि ढांचे में किसी भी तरह के बदलाव का प्रस्ताव अत्यंत संवेदनशील है और इसे संसद में बहस के लिए पेश किया जाना चाहिए, न कि इसे राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित कर दिया जाना चाहिए।
चिराग पासवान ने मांझी परिवार पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि मैं 'ऊपरी' तबकों के लिए आरक्षण की बात नहीं कर रहा हूं। मैं एससी और एसटी के लोगों को आरक्षण देने की बात कर रहा हूं। उनके बारे में लोग पूछते हैं, "क्रीमी लेयर' का प्रोविज़न क्यों नहीं है?" ठीक है, तो उन्हें इसे छोड़ देना चाहिए- उन्हें रिज़र्वेशन का फ़ायदा लेना बंद कर देना चाहिए... अगर जीतन राम मांझी को लगता है कि ये उपाय लागू होने चाहिए, तो क्या उन्हें पहले इस्तीफ़ा नहीं देना चाहिए? उन्हें 'क्रीमी लेयर' कॉन्सेप्ट लाने दें- आखिरकार, वह भी उसी कैटेगरी में आएंगे, है ना? उन्हें इस्तीफ़ा दे देना चाहिए, और उनके बेटे को- जो बिहार में मंत्री हैं- को भी इस्तीफा दे देना चाहिए।"
वहीं चिराग पासवान के बयान पर पलटवार करते हुए केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने कहा, " इस रुख की वजह से लोग आरक्षण के फायदों से दूर हो जाएंगे। हालांकि, हमारा मानना है कि यह बंटवारा बड़े पैमाने पर लोगों के हित में जरूरी है। क्योंकि उन्हें हमारे गरीब लोगों की परवाह नहीं है, इसलिए उन्हें इस्तीफ़ा दे देना चाहिए।"
दरअसल जीतन राम मांझी और संतोष सुमन अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति आरक्षण में उप-वर्गीकरण और 'कोटा के भीतर कोटा' की मांग कर रहे हैं। उनका तर्क है कि इसका लाभ सभी समुदायों को समान रूप से नहीं मिला है। संतोष सुमन ने कहा कि उनकी मांग का उद्देश्य आरक्षण को समाप्त करना नहीं बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि वंचित समूहों को उनका हिस्सा मिले। चिराग ने इसके जवाब में कहा कि आरक्षण को आर्थिक स्थिति के नजरिए से देखने से इसका मूल उद्देश्य कमजोर हो सकता है। उन्होंने किसी भी बदलाव से पहले व्यापक संवैधानिक और संसदीय बहस की मांग की।
यह असहमति बिहार की दलित राजनीति के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि चिराग और मांझी-सुमन खेमा दोनों ही खुद को हाशिए पर पड़े समुदायों के हिमायती के रूप में पेश करना चाहते हैं, लेकिन आरक्षण प्रणाली के भविष्य पर उनके विचार बिल्कुल अलग हैं। इन घटनाक्रमों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या एनडीए के घटक दल इस संवेदनशील मुद्दे पर एकमत हो पाएंगे या बिहार में सत्तारूढ़ एनडीए में मतभेद और गहरे हो जाएंगे।
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