
भारत में वामपंथ का आखिरा किला भी ढह गया है। केरल चुनाव के अब तक के परिणाम बता रहे हैं कि पिनाराई विजयन की सीपीआईएम के नेतृत्व वाली लेफ्ट गठबंधन की सरकार चुनाव हार गई है। कांग्रेस ने केरल में दस साल के बाद शानदार वापसी की है। सीपीआईएम की अगुआई वाले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) को सिर्फ 35 सीटों पर जीत मिलती दिख रही है। जबकि कांग्रेस नीत यूडीएफ 99 सीट पर जीत के साथ सरकार बनाने के लिए अग्रसर है।
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केरल में पिनाराई विजयन सरकार भारत में वामपंथी विचारधारा वाली आखिरी सरकार थी। इससे पहले पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में लेफ्ट पार्टियों का गढ़ पहले ही ढह चुका है। पश्चिम बंगाल में साल 2011 में जमीन आंदोलन के रथ पर सवार होकर आई ममता बनर्जी की आंधी ने सीपीआईएम का सूपड़ा साफ कर दिया। इसके बाद 2018 में त्रिपुरा में लेफ्ट के 25 साल के शासन को बीजेपी ने खत्म कर दिया।
लेकिन देश में तमाम सामाजिक और राजनीति परिवर्तनों के बावजूद केरल में लेफ्ट ने अपना खूंटा गाड़े रखा और लगातार पिछले दो विधानसभा चुनाव जीतकर इस दक्षिणी राज्य में अपनी मजबूती का संकेत दिया। लेकिन इस बार कांग्रेस की आंधी में केरल में भी लेफ्ट का खूंटा उखड़ गया। इसी के साथ पहली बार ऐसा होगा जब देश के किसी भी राज्य में कोई भी वामपंथी सरकार नहीं होगी?
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आजादी के बाद केरल में ही साल 1957 में पहली बार देश के किसी राज्य में लेफ्ट की सरकार बनी थी। देश के सबसे दक्षिणी राज्य केरल में तब ईएमएस नंबूदरीपाद लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई दुनिया की पहली मार्क्सवादी सरकार के मुख्यमंत्री बने थे। इसी के साथ यह भारत की पहली गैर कांग्रेसी सरकार भी थी। नंबूदरीपाद दो साल 1957 से 1959 तक मुख्यमंत्री रहे। इसके बाद सात साल तक देश में कोई लेफ्ट सरकार नहीं रही। इसके बाद 1967 में केरल में ही नंबूदरीपाद दोबारा जीतकर सीएम बने। केरल की ये लेफ्ट सरकार 1977 तक चली।
तब तक देश के दूसरे राज्य पश्चिम बंगाल में भी लेफ्ट ने अपना खाता खोल दिया था। ज्योति बसु के नेतृत्व में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) ने साल 1977 में पहली बार बंगाल में सरकार बनाई। इसके बाद बंगाल में साल 2011 तक सीपीएम के नेत़ृत्व वाली वामपंथी सरकार ही सत्ता में रही। उसी साल ममता बनर्जी की टीएमसी ने बंगाल में लेफ्ट का किला गिराकर सत्ता हासिल किया।
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देश में केरल और पश्चिम बंगाल के बाद त्रिपुरा में लेफ्ट की सरकार आई। साल 1978 में त्रिपुरा में पहली बार नृपेन चतुर्वेदी के नेतृत्व में सीपीएम की सरकार बनी। 1993 में इसी पार्टी के माणिक सरकार सीएम बने जो 2018 तक लगातार सत्ता में बने रहे। लगभग 25 साल तक त्रिपुरा वामपंथ का अभेद्य गढ़ बना रहा। लेकिन साल 2018 में बीजेपी ने उसके वर्चस्व को न सिर्फ चुनौती दी बल्कि पहली बार सरकार बनाकर राज्य से सीपीएम की विदाई कर दी। इस प्रकार 1977 में बंगाल की सत्ता से लेकर 2018 में त्रिपुरा की सरकार गिरने तक लगातार वामपंथी पार्टी देश के किसी न किसी राज्य में सत्ता में बनी रही।
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केरल बना रहा मजबूत गढ़
पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में सरकार जाने के बाद भी पूरे देश से वामपंथी सरकार का सूपड़ा साफ नहीं हुआ। केरल में 2016 में कांग्रेस को हराकर सीपीएम के नेतृत्व वाली एलडीएफ की सरकार आई। पिनाराई विजयन सीएम बने। केरल में बदलाव वाली परंपरा में थोड़ा चौंकाते हुए साल 2021 में विजयन के नेतृत्व में लेफ्ट ने दोबारा चुनाव जीता। 2026 तक तो ये सरकार अबाध रूप केरल में बनी रही।
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लेकिन इस बार विजयन अपना जादू कायम रखने में चूक गए और सत्ताविरोधी लहर के कारण एलडीएफ की सत्ता से विदाई हो गई। इस बार वहां एलडीएफ सिर्फ 35 सीट पर सिमटती दिख रही है। वहीं कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूडीएफ 99 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है। इन नतीजों से केरल में कांग्रेस की वापसी का रास्ता साफ हो गया है। हालांकि, केरल में इस सत्ता परिवर्तन के साथ ही देश में वामपंथ का आखिरी गढ़ भी ढह गया है।
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मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) के राज्य सचिव एम वी गोविंदन ने सोमवार को कहा कि एलडीएफ केरल विधानसभा चुनाव में मिली हार के कारणों की समीक्षा करेगा और आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाएगा। चुनाव परिणाम आने के बाद गोविंदन ने कहा कि हार के सभी पहलुओं का विश्लेषण किया जाएगा। उन्होंने एलडीएफ कार्यकर्ताओं और वोट देने वाले लोगों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा, “एलडीएफ अपनी हार की समीक्षा करेगी, जिसके बाद आवश्यक सुधार किए जाएंगे। हमें जनता का समर्थन प्राप्त होने की उम्मीद है।”
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