विज्ञान

9/11 के 20 साल: 'वॉर ऑन टेरर' तो फुस्स हो गया, लेकिन 'वॉर' और 'टेरर' दोनों अब भी दुनिया के लिए हैं चुनौती

अमेरिका को युद्ध में शामिल रहना अच्छा लगता है। लेकिन साथ ही वह आतंकी गुटों और अलकायदा से निकले अन्य आतंकी समूहों के साथ बातचीत भी करता रहता है। जाहिर है 'वॉर ऑन टेरर' का नारा देकर उसने खुद अपनी ही खिल्ली उड़वाई है क्योंकि तालिबान की वापसी 9/11 के बाद और मजबूती से हुई है।

सोशल मीडिया
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अफगानिस्तान पर अमेरिकी हमले के शुरुआती दिनों में तालिबान किसी भी तरह सुलह के लिए बेताब था। लेकिन तब अमेरिका अपने देश के लोगों के सामने बड़ा तमाशा खड़ा करना चाहता था। अमेरिका और उसके नाटो सहयोगियों के हमले ने 2001-02 में तालिबान की कमर तोड़कर रख दी और जो बच गए, उन्होंने या तो समर्पण कर दिया या चुपचाप आम नागरिक की तरह जीने लगे। पाकिस्तान की तब की सरकार एक के बाद एक अलकायदा लड़ाकों को अमेरिका को सौंपती जा रही थी। इस तरह 2005 तक अलकायदा का खेल पूरे क्षेत्र में खत्म हो गया था।

लेकिन अफगानिस्तान के ग्रामीण इलाकों में जारी अमेरिकी अभियान ने न केवल तालिबान को एक नया जीवन दिया बल्कि तालिबान से तंग आ चुके आम अफगान के मन में अमेरिका और काबुल में बैठी उसकी कठपुतली सरकार के प्रति दुराव ला दिया। 2010 तक यह दिखने लगा था कि अफगानिस्तान में अमेरिकी नीतियों ने तालिबान को इस तरह जिंदा कर दिया था कि अमेरिका के लिए अफगानिस्तान पर बहुत दिन तक पकड़ बनाए रखना संभव नहीं रहने वाला था।

और इस बात को अमेरिका बहुत अच्छी तरह समझ रहा था। इसी वजह से उसने तालिबान के साथ बातचीत का एक बैक-चैनल खोला ताकि अंततः सुरक्षित वापसी की राह निकाली जा सके। ऐसा लगता था कि इस दुस्साहस ने अमेरिकी सुरक्षा प्रतिष्ठान को सबक सिखाया होगा। लेकिन ऐसा नहीं था। अफगानिस्तान के बाद पहले इराक और फिर 2011-2012 में उसे सीरिया में भी सबक लेने का मौका मिला। सलाफी/वहाबी चरमपंथियों ने फिर से सिर उठाना शुरू किया जिसे क्षेत्र में अमेरिकी सहयोगियों कतर और तुर्की से ही मदद मिली। सऊदी अरब और यूएई जैसे अन्य अमेरिकी सहयोगी भी जल्द ही इस जमात में शामिल हो गए। यह बहुत साफ था कि इसमें अलकायदा शामिल था लेकिन अपने सहयोगियों पर लगाम लगाने के बजाय अमेरिका ने इन चरमपंथियों के संगठित होने में मदद ही की।

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पहले तो जोर-शोर से यह दुष्प्रचार अभियान चलाया गया कि सीरियाई सरकार के उत्पीड़न के खिलाफ लड़ रहे चरमपंथी दरअसल विद्रोही हैं। लेकिन कुछ ही साल बाद जब अलकायदा के साथ सहयोग को छिपाना मुश्किल हो गया तो एक नई कहानी गढ़ी गई जिसमें कहा गया कि विरोध पहले तो ‘शांतिपूर्ण’ और ‘स्थानीय’ था जिसे सरकारी दमन ने हिंसक बना दिया और उसके बाद अल कायदा-जैसे तत्वों को बीच में कूदने का मौका मिल गया।

कहते हैं न कि सच्चाई ज्यादा देर तक नहीं छिप सकती। यह संवाददाता उन शुरुआती दिनों में भी सीरिया से व्यापक तौर पर रिपोर्टिंग कर रहा था और मैं आपको आश्वस्त कर सकता हूं कि उस समय विरोध शांतिपूर्णतो नहीं ही था; इसमें शुरू से ही अलकायदा की सक्रिय भागीदारी थी। सीरिया में ईसाइयों को लेबनान और अलावियों को उनकी कब्रों में चले जाने के बैनर के साथ उन शुरुआती ‘शांतिपूर्ण’ विरोधों के सबूत के तौर पर तमाम वीडियो मौजूद हैं। कई वीडियो में प्रदर्शनकारियों को ओसामा बिन लादेन का गुणगान करते हुए नशीद (अरबी में स्तुतिगान) गाते हुए दिखाया गया है।

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तमाम अमेरिकी दूतावासों के लीक प्रपत्रों से साफ पता चलता है कि कैसे अमेरिका के सहयोगी देशों ने सीरिया में खुलेआम अलकायदा को मदद दी। एक ऐसे ही दस्तावेज में कहा गया हैः ‘हमें आईएसआईएस और अन्य चरमपंथी गुटों को चोरी-छिपे पैसे और अन्य तरीके से मदद पहुंचाने वाली कतर और सऊदी अरब की सरकारों पर दवाब बनाने के लिए अपने राजनयिक और पारंपरिक खुफिया सूत्रों को इस्तेमाल करना होगा।’

लेकिन अगर आप यह सोचते हैं कि केवल अमेरिका के सहयोगी ही अलकायदा से पींगे बढ़ाते रहे हैं तो आप गलत हैं। हिलेरी क्लिंटन के बारे में विकीलीक्स के खुलासे से साफ होता है कि कैसे डीसी ब्लॉब ने अमेरिकी सहयोगियों को अलकायदा और इस्लामिक स्टेट की मदद करने दी। डोनाल्ड ट्रंप की आप हजार चीजों के लिए बुराई कर लें लेकिन इतना तो है कि उन्होंने दूसरे राष्ट्रपतियों के उलट ब्लॉब-जैसों की मुश्कें कसने की ईमानदार कोशिश की। हालांकि वह बौद्धिक रूप से इतने तेज नहीं थे कि देख पाते कि उसके बाद भी ब्लॉब कैसे तमाम मामलों में अपनी मर्जी चला रहे थे। माइक पॉम्पियो और बोल्टन दो आतंकवादी गुटों मुजाहिदीन-ए- खल्क और ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट को आतंकी संगठनों की अमेरिकी सूची से हटवाने में कामयाब रहे। हालांकि बिडेन की वापसी से ब्लॉब फिर मजबूत हो गए हैं। बिडेन सोच-समझकर लड़ाई के मोर्चे खोल रहे हैं। वह जानते हैं कि अफगानिस्तान एक मरा हुआ घोड़ा है और वहां से वापसी ही एकमात्र विकल्प है। शायद वह ब्लॉब को इसके बदले चीन और सीरिया के मामलों में कुछ छूट दे दें।

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बिडेन के चुनाव जीतने के चंद हफ्तों बाद ही अमेरिकी प्रशासन में जमकर अभियान चला कि हयात तहरीर के छद्म नाम से चल रहे सीरिया अलकायदा को एक नरम संगठन के तौर पर स्वीकार किया जाए और इसके नेता मोहम्मद अल जुलानी को आधुनिक रॉबिन हुड। मुख्यधारा की अमेरिकी मीडिया ने जुलानी के तमाम इंटरव्यू किए और इसके पीछे काम कर रहे थिंक टैंक ने ‘दि मॉडरेट फेस ऑफ अलकायदा’ जैसे लेख प्रकाशित कराए। इस मेकओवर अभियान में इस आतंकवादी संगठन का तीन सदस्यीय दल पश्चिमी खुफिया एजेंसियों के साथ मिलकर काम कर रहा था। लेकिन रूसी ड्रोन का शिकार होकर इन तीनों आतंकवादियों के मारे जाने से यह अभियान कुछ समय के लिए ठंडा पड़ गया लगता है।

अब अमेरिकी युद्ध चीन की ओर शिफ्ट हो रहा है और नए गठजोड़ बन रहे हैं। महज दो साल पहले अमेरिका अलकायदा से जुड़े ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट से अफगानिस्तान में लड़ाई लड़ रहा था। अब उसे आतंकवादी संगठनों की अमेरिकी सूची से हटा दिया गया है। इसी का संस्करण तुर्किस्तान इस्लामिक पार्टी (टीआईपी) आज भी सीरिया में अलकायदा की निकट सहयोगी है। टीआईपी के सेंट्रल एशिया और चीन के झिंगझियांग में करीब 30 हजार आतंकवादी हैं।

यह है अमेरिका के आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई का असली चेहरा। भरोसा कीजिए, वह दिन दूर नहीं जब अमेरिका एक और दुश्मन और एक और युद्ध के साथ सामने होगा।

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