
ईरान ने युद्ध को जारी रखने और अमेरिका के साथ सीधी बातचीत से इनकार कर दिया है। इस घटनाक्रम का असर तेल की कीमतों पर पड़ रहा है। गुरुवार को वैश्विक तेल कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गईं।
ब्रेंट क्रूड वायदा 1.21 प्रतिशत बढ़कर 103.46 डॉलर प्रति बैरल हो गया, जबकि अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) क्रूड 1.35 प्रतिशत उछलकर 91.54 डॉलर प्रति बैरल हो गया। इसका कारण मध्य पूर्व में लगातार तनाव बढ़ना है।
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची के अनुसार, तेहरान और वाशिंगटन के बीच मध्यस्थों के जरिए होने वाले संपर्क को बातचीत के तौर पर नहीं समझा जाना चाहिए। तेहरान की ओर से अमेरिका समर्थित संघर्ष-विराम प्रस्ताव को भी खारिज किए जाने की संभावना थी।
इससे पहले, बुधवार को पश्चिम एशिया क्षेत्र में संघर्ष-विराम की बढ़ती उम्मीदों के बीच अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट देखी गई थी।
विशेषज्ञों के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतों में हालिया गिरावट से भारत के महंगाई और चालू खाता घाटा (सीएडी) जैसे मैक्रोइकोनॉमिक संकेतकों को कुछ राहत मिल सकती है, हालांकि तकनीकी संकेतक बताते हैं कि प्रमुख समर्थन स्तरों की जांच की जा रही है।
भारत के लिए कच्चे तेल की कीमत में 10 डॉलर प्रति बैरल का हर बदलाव आमतौर पर जीडीपी के 0.3–0.5 प्रतिशत अंकों तक चालू खाता घाटे को प्रभावित करता है और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) मुद्रास्फीति को 20–30 आधार अंकों तक बढ़ाता है, जो कि कीमतों के आगे बढ़ने पर निर्भर करता है।
इसी बीच, ईरान ने घोषणा की है कि वह भारत समेत पांच 'मित्र' देशों के जहाजों पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाएगा, जिससे उन्हें रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलमार्ग से गुजरने की अनुमति होगी, जबकि दूसरों के लिए पहुंच सीमित रहेगी।
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भारत की आर्थिक वृद्धि दर (जीडीपी) चालू वित्त वर्ष में 7.6 प्रतिशत रहने की उम्मीद है। आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) ने बृहस्पतिवार को जारी अपनी रिपोर्ट में यह अनुमान जताया है।
हालांकि, ओईसीडी ने अगले वित्त वर्ष (2026-27) में भारत की वृद्धि दर 6.1 प्रतिशत रहने की बात कही है।
ओईसीडी ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट में आगाह किया है कि पश्चिम एशिया में जारी विवाद का सीधा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
रिपोर्ट के मुताबिक, होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही रुकने और ऊर्जा बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचने से ईंधन की कीमतें बढ़ी हैं। इससे दुनिया भर में ऊर्जा और खाद जैसी जरूरी चीजों की आपूर्ति प्रभावित हुई हैं।
ओईसीडी का कहना है कि अमेरिका द्वारा आयात शुल्क में की गई कटौती से भारत की प्रगति को सहारा मिलेगा। हालांकि, गैस की किल्लत के कारण कुछ उत्पादन गतिविधियों में रुकावट आने और सरकारी वित्तीय सहायता में कमी आने से वृद्धि की रफ्तार आने वाले वर्षों में थोड़ी धीमी हो सकती है।
महंगाई के मोर्चे पर रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक स्तर पर ईंधन की कीमतों में आए उछाल से भारत में भी मुद्रास्फीति बढ़ सकती है। अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026-27 में महंगाई दर बढ़कर 5.1 प्रतिशत तक पहुंच सकती है।
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पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण यदि ऊर्जा बाजार (ईंधन आपूर्ति) में रुकावटें एक साल से अधिक समय तक बनी रहती हैं, तो वर्ष 2026-27 के दौरान एशिया-प्रशांत क्षेत्र की आर्थिक वृद्धि दर में 1.3 प्रतिशत अंक तक की गिरावट आ सकती है।
एशियाई विकास बैंक (एडीबी) के एक शोध में यह अंदेशा जताया गया है कि ऐसी स्थिति में महंगाई दर में भी 3.2 प्रतिशत अंक तक की बढ़ोतरी हो सकती है।
एडीबी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि यह संघर्ष ऊंची ईंधन कीमतों, सामान की आवाजाही और व्यापार में बाधाओं के माध्यम से इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित करता है।
इससे पर्यटन और विदेशों में काम करने वाले नागरिकों द्वारा घर भेजे जाने वाले धन (रेमिटेंस) पर भी बुरा असर पड़ सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, आर्थिक वृद्धि में सबसे गंभीर असर दक्षिण-पूर्व एशिया पर पड़ेगा, जबकि दक्षिण एशियाई देशों में महंगाई सबसे ज्यादा बढ़ने की आशंका है।
एडीबी के मुख्य अर्थशास्त्री अल्बर्ट पार्क ने कहा कि ईंधन की आपूर्ति में लंबे समय तक रहने वाली बाधाएं विकासशील देशों के सामने 'धीमी प्रगति' और 'उच्च महंगाई' के बीच एक कठिन स्थिति पैदा कर सकती हैं।
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