
इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) दाखिल करते समय छोटी-बड़ी गलतियां होना आम बात है। कई बार करदाता किसी बैंक खाते से मिले ब्याज को दिखाना भूल जाते हैं, गलत डिडक्शन क्लेम कर लेते हैं या गलत आईटीआर फॉर्म चुन लेते हैं। अच्छी बात यह है कि ऐसी गलतियों को सुधारने का कानूनी प्रावधान मौजूद है। आयकर अधिनियम की धारा 139(5) के तहत करदाता अपनी पहले से दाखिल रिटर्न में संशोधन कर सकते हैं। इसे रिवाइज्ड रिटर्न कहा जाता है और यह करदाताओं को बिना नई रिटर्न दाखिल किए अपनी गलतियां सुधारने का अवसर देता है।
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अगर किसी करदाता ने अपनी मूल रिटर्न समय पर या विलंबित रिटर्न के रूप में दाखिल की है और बाद में कोई त्रुटि सामने आती है, तो वह संशोधित रिटर्न दाखिल कर सकता है। इसके जरिए छूटी हुई आय को जोड़ा जा सकता है, गलत आय विवरण को सुधारा जा सकता है, डिडक्शन में संशोधन किया जा सकता है, टैक्स गणना की त्रुटियां ठीक की जा सकती हैं और जरूरत पड़ने पर गलत चुने गए आईटीआर फॉर्म को भी बदला जा सकता है। संशोधित रिटर्न दाखिल होने के बाद वही अंतिम और वैध रिटर्न मानी जाती है तथा पहले दाखिल रिटर्न स्वतः निरस्त हो जाती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, रिवाइज्ड रिटर्न दाखिल करते समय समयसीमा का विशेष ध्यान रखना जरूरी है। करदाता केवल निर्धारित अवधि के भीतर ही अपनी रिटर्न में बदलाव कर सकते हैं। यदि आयकर विभाग संबंधित मामले का असेसमेंट पूरा कर देता है, तो संशोधित रिटर्न दाखिल करने का विकल्प समाप्त हो जाता है। ऐसे मामलों में बाद में केवल अपडेटेड रिटर्न यानी आईटीआर-यू दाखिल करने का रास्ता बचता है, जिसमें अतिरिक्त टैक्स और ब्याज का भुगतान करना पड़ सकता है।
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रिवाइज्ड रिटर्न का सबसे बड़ा लाभ यह है कि केवल गलती सुधारने के लिए अलग से कोई जुर्माना नहीं लगाया जाता। हालांकि यदि मूल रिटर्न निर्धारित समयसीमा के बाद दाखिल की गई थी, तो उस पर लागू लेट फीस और अन्य शुल्क जारी रह सकते हैं। यही वजह है कि विशेषज्ञ समय पर रिटर्न दाखिल करने की सलाह देते हैं।
करदाताओं के लिए एक और राहत यह है कि निर्धारित समय सीमा के भीतर वे एक से अधिक बार भी रिवाइज्ड रिटर्न दाखिल कर सकते हैं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि सभी जरूरी सुधार एक साथ करके एक ही बार संशोधित रिटर्न दाखिल करना अधिक सुविधाजनक और सुरक्षित रहता है। यहां तक कि यदि किसी व्यक्ति को रिफंड मिलने के बाद भी रिटर्न में गलती का पता चलता है, तो वह समयसीमा के भीतर संशोधित रिटर्न दाखिल कर सकता है। हालांकि यदि संशोधन के बाद टैक्स देनदारी बढ़ती है तो अतिरिक्त टैक्स जमा करना पड़ सकता है या पहले मिले रिफंड में समायोजन किया जा सकता है।
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अगर रिवाइज्ड रिटर्न दाखिल करने की समयसीमा समाप्त हो चुकी है, तो करदाता आयकर अधिनियम की धारा 139(8ए) के तहत अपडेटेड रिटर्न यानी ITR-U दाखिल कर सकते हैं। यह सुविधा उन लोगों के लिए है जिन्होंने रिटर्न दाखिल नहीं की हो, कुछ आय छिपा दी हो या बाद में कोई बड़ी त्रुटि सामने आई हो। ITR-U के जरिए संबंधित असेसमेंट वर्ष के अंत से 48 महीने तक रिटर्न अपडेट की जा सकती है, लेकिन इसके साथ अतिरिक्त टैक्स और ब्याज देना अनिवार्य होता है।
हालांकि ITR-U के कुछ महत्वपूर्ण प्रतिबंध भी हैं। इसके जरिए रिफंड बढ़ाने या टैक्स देनदारी कम करने का दावा नहीं किया जा सकता। इसके अलावा यदि किसी मामले में आयकर विभाग की जांच या स्क्रूटनी चल रही हो, तो अपडेटेड रिटर्न दाखिल करने की अनुमति नहीं होती। साथ ही एक असेसमेंट वर्ष में केवल एक बार ही ITR-U दाखिल की जा सकती है।
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आयकर विभाग के ई-फाइलिंग पोर्टल पर लॉगिन कर करदाता आसानी से रिवाइज्ड रिटर्न दाखिल कर सकते हैं। इसके लिए रिवाइज्ड रिटर्न का विकल्प चुनना होता है। इसके बाद मूल रिटर्न का एक्नॉलेजमेंट नंबर और रिटर्न दाखिल करने की तारीख दर्ज करनी होती है। आवश्यक सुधार करने के बाद रिटर्न दोबारा सबमिट कर ई-वेरिफिकेशन पूरा करना जरूरी होता है। ई-वेरिफिकेशन के बिना संशोधित रिटर्न वैध नहीं मानी जाती।
कर विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल और डेटा आधारित टैक्स व्यवस्था में सही और पारदर्शी जानकारी देना पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। ऐसे में यदि किसी करदाता से अनजाने में कोई गलती हो जाती है, तो रिवाइज्ड रिटर्न एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच की तरह काम करती है। समय पर आईटीआर दाखिल करना, सभी जानकारियों की सावधानीपूर्वक जांच करना और जरूरत पड़ने पर निर्धारित समयसीमा के भीतर संशोधित रिटर्न दाखिल करना भविष्य में नोटिस, जुर्माने और अन्य कानूनी परेशानियों से बचने का सबसे बेहतर तरीका माना जाता है।
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